सुरथ और वैश्यक्रो देवीका वरदान
ध्यानम्
जो उदयकालके सूर्यमण्डलकौ-सी कान्ति धारण करनेवाली हैं, जिनके
चार भुजाएँ ओर तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथमे पाश, अंकुश, वर एवं
अभयकी मुद्रा धारण किये रहती हैं, उन शिवादेवीका मैं ध्यान करता हूँ।
ऋषि कहते है--॥ १॥ राजन्! इस प्रकार मैंने तुमसे देवीके उत्तम
माहात्म्यका वर्णन किया। जो इस जगत्को धारण करती हैं, उन देवीका
ऐसा ही प्रभाव है॥२॥ वे ही विद्या (ज्ञान) उत्पन्न करती हैं। भगवान्
विष्णुकौ मायास्वरूपा उन भगवतीके द्वारा ही तुम, ये वैश्य तथा अन्यान्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं--॥ ६॥ क्रोष्टुकिजी ! मेधामुनिके ये वचन सुनकर
राजा सुरथने उत्तम त्रतका पालन करनेवाले उन महाभाग महर्षिको प्रणाम
किया। वे अत्यन्त ममता ओर राज्यापहरणसे बहुत खिन्न हो चुके थे॥ ७-८॥
महामुने! इसलिये विरक्त होकर वे राजा तथा वैश्य तत्काल तपस्याको चले
गये और वे जगदम्बाके दर्शनके लिये नदीके तटपर रहकर तपस्या करने
लगे ॥ ९॥ वे वैश्य उत्तम देवीसूक्तका जप करते हुए तपस्यामें प्रवृत्त हुए । वे दोनों
नदीके तटपर देवीकौ मिट्टीकी मूर्तिं बनाकर पुष्प, धूप ओर हवन आदिके
द्वारा उनकी आराधना करने लगे । उन्होने पहले तो आहारको धीरे-धीरे कम किया;
फिर बिलकुल निराहार रहकर देवीम ही मन लगाये एकाग्रतापूर्वक उनका चिन्तन
आरम्भ किया॥ १०-११॥ वे दोनों अपने शरीरके रक्तसे प्रोक्षित बलि देते हुए
लगातार तीन वर्षतक संयमपूर्वक आराधना करते रहे ॥ १२॥ इसपर प्रसन्न होकर
देवी बोलीं--॥ १४॥ राजन्! तथा अपने कुलको आनन्दित करनेवाले
वैश्य तुमलोग जिस वस्तुको अभिलाषा रखते हो, वह मुझसे मागो । मैं संतुष्ट
मार्कण्डेयजी कहते हैं--॥ १६॥ तब राजाने दूसरे जन्ममें नष्ट न
होनेवाला राज्य माँगा तथा इस जन्ममे भी शत्रुओंकी सेनाको बलपूर्वक
नष्ट करके पुनः अपना राज्य प्राप्त कर लेनेका वरदान माँगा॥ १७॥ वैश्यका
चित्त संसारकी ओरसे खिन एवं विरक्त हो चुका था और वे बड़े बुद्धिमान्
थे; अत: उस समय उन्होने तो ममता और अहंतारूप आसक्तिका नाश
देवी बोलीं--॥ १९॥ राजन्! तुम थोड़े ही दिनोंमें शत्रुओंको मारकर
अपना राज्य प्राप्त कर लोगे। अब वहाँ तुम्हारा राज्य स्थिर रहेगा॥ २०-२१॥
फिर मृत्युके पश्चात् तुम भगवान् विवस्वान् (सूर्य) -के अंशसे जन्म लेकर
इस पृथ्वीपर सावर्णिक मनुके नामसे विख्यात होओगे॥ २२-२३॥
देती हूँ। तुम्हें मोक्षके लिये ज्ञान प्राप्त होगा॥ २४-२५॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं--॥२६॥ इस प्रकार उन दोनोंको
मनोवांछित वरदान देकर तथा उनके द्वारा भक्तिपूर्वक अपनी स्तुति सुनकर
देवी अम्बिका तत्काल अन्तर्धान हो गयीं। इस तरह देवीसे वरदान पाकर
क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ सुरथ सूर्यसे जन्म ले सावर्णिं नामक मनु होगे ॥ २७-- २९॥
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत
देवीमाहात्स्यमे सुरथ और वैश्यको वरदान” नामक