भगवती महालक्ष्मीका भजन करता हूँ, जो अपने हाथोंमें अक्षमाला, फरसा,
गदा, बाण, वज्र, पद्म, धनुष, कुण्डिका, दण्ड, शक्ति, खड्ग, ढाल, शंख, घण्ट,
ऋषि कहते हैं--॥१॥ पूर्वकालमें देवताओं और असुरोमे पूरे सौ
वर्षोतक घोर संग्राम हुआ था। उसमें असुरोका स्वामी महिषासुर था और
देवताओंके नायक इन्द्र॒ थे। उस युद्धमें देवताओंकी सेना महाबली असुरोसे
परास्त हो गयी । सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर महिषासुर इन्द्र बन बेटा ॥ २-३॥
तन पराजित देवता प्रजापति ब्रह्माजीको आगे करके उस स्थानपर गये, जहाँ
भगवान् शंकर और विष्णु विराजमान थे॥ ४॥ देवताओंने महिषासुरके पराक्रम
तथा अपनी पराजयका यथावत् वृत्तान्त उन दोनों देवेश्वरोसे विस्तारपूर्वक कह
सुनाया ॥ ५॥ वे बोले--' भगवन्! महिषासुर सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा,
यम, वरुण तथा अन्य देवताओंके भी अधिकार छीनकर स्वयं ही सबका
अधिष्ठाता बना बैठा है॥६॥ उस दुरात्मा महिषने समस्त देवताओंको
इस प्रकार देवताओंके वचन सुनकर भगवान् विष्णु और शिवने दैत्योपर
बड़ा क्रोध किया। उनकी भौंहें तन गयीं ओर मुँह टेढा हो गया॥ ९॥ तब
अत्यन्त कोपमें भरे हुए चक्रपाणि श्रीविष्णुके मुखसे एक महान् तेज प्रकट
हुआ। इसी प्रकार ब्रह्मा, शंकर तथा इन्द्र आदि अन्यान्य देवताओंके शरीरसे
भी बड़ा भारी तेज निकला। वह सब मिलकर एक हो गया ॥ १०-११॥ महान्
तेजका वह पुंज जाज्वल्यमान पर्वत-सा जान पड़ा। देवताओंने देखा, वहाँ
उसकी ज्वालाएँ सम्पूर्ण दिशाओंमें व्याप्त हो रही थं ॥ १२॥ सम्पूर्ण देवताओंके
शरीरसे प्रकट हुए उस तेजकी कहीं तुलना नहीं थी। एकत्रित होनेपर वह एक
नारीके रूपमें परिणत हो गया और अपने प्रकाशसे तीनों लोकोंमें व्याप्त जान
चन्द्रमाके तेजसे दोनों स्तनौका और इनद्रके तेजसे मध्यभाग
(कयिप्रदेश)-का प्रादुर्भाव हुआ। वरुणके तेजसे जंघा और पिंडली तथा
पुथ्वीके तेजसे नितम्बभाग प्रकट हुआ॥ १५॥ ब्रह्याके तेजसे दोनों चरण और
सूर्यके तेजसे उसकी अँगुलियाँ हुई । वसुओंके तेजसे हाथोंकी अँगुलियाँ और
कुबेरके तेजसे नासिका प्रकट हुई ॥ १६॥ उस देवीके दाँत प्रजापतिके तेजसे
और तीनों नेत्र अग्निके तेजसे प्रकट हुए थे॥ १७॥ उसकी भौंहें संध्याके ओर
कान वायुके तेजसे उत्पन्न हुए थे। इसी प्रकार अन्यान्य देवताओंके तेजसे भी
पिनाकधारी भगवान् शंकरने अपने शूलसे एक शूल निकालकर उन्हें दिया; फिर
वरुणने भी शंख भेंट किया, अग्निने उन्हें शक्ति दी ओर वायुने धनुष तथा बाणसे
भरे हुए दो तरकस प्रदान किये ॥ २१॥ सहस नेत्रोंवाले देवराज इन्द्रने अपनेवञ्रसे
व्र उत्पन्न करके दिया और एेरावत हाथीसे उतारकर एक घण्टया भी
प्रदान किया॥ २२॥ यमराजने कालदण्डसे दण्ड, वरुणने पाश, प्रजापतिने
स्फटिकाक्षकौ माला तथा ब्रह्ाजीने कमण्डलु भेंट किया॥ २३॥ सूर्यने
देवीके समस्त रोम-कूपोमें अपनी किरणोंका तेज भर दिया। कालने उन्हें
चमकती हुई ढाल और तलवार दी॥ २४॥ क्षीरसमुद्रने उज्ज्वल हार तथा
कभी जीर्णं न होनेवाले दो दिव्य वस्त्र भेंट किये। साथ ही उन्होने दिव्य
चूडामणि, दो कुण्डल, कड़े, उज्ज्वल अर्धचन्द्र, सब बाहुओंके लिये केयूर,
दोनों चरणोंके लिये निर्मल नूपुर, गलेकौ सुन्दर हंसली ओर सब अँगुलियोंमें
पहननेके लिये रत्नोंकी बनी अँगूठियाँ भी दीं । विश्वकर्मानि उन्हें अत्यन्त निर्मल
फरसा भेंट किया ॥ २५-- २७॥ साथ ही अनेक प्रकारके अस्त्र ओर अभेद्य कवच
दिये; इनके सिवा मस्तक और वक्षःस्थलपर धारण करनेके लिये कभी न कुम्हलानेवाले
पृथ्वीको धारण करते हैं, उन्हें बहुमूल्य मणियोंसे विभूषित नागहार भेंट दिया । इसी
प्रकार अन्य देवताओंने भी आभूषण और अस्त्र-शस्त्र देकर देवीका सम्मान किया।
तत्पश्चात् उन्होंने बारंबार अट्टहासपूर्वक उच्वस्वरसे गर्जना की । उनके भयंकर नादसे
सम्पूर्ण आकाश गंज उठा ॥ ३०-- ३२ ॥ देवीका वह अत्यन्त उच्वस्वरसे किया हुआ
सिंहनाद करीं समा न सका, आकाश उसके सामने लघु प्रतीत होने लगा। उससे
बड़े जोरकी प्रतिध्वनि हुई, जिससे सम्पूर्णं विश्वमे हलचल मच गयी ओर समुद्र
कोपि उठे ॥ ३३ ॥ पृथ्वी डोलने लगी ओर समस्त पर्वत हिलने लगे। उस समय
देवताओंने अत्यन्त प्रसन्नताके साथ सिंहवाहिनी भवानीसे कहा--' देवि ! तुम्हारी
जय हो ' ॥ ३४॥ साथ ही महर्षियोने भक्तिभावसे विनम्र होकर उनका स्तवन किया।
सम्पूर्ण त्रिलोकीको क्षोभग्रस्त देख ॒दैत्यगण अपनी समस्त सेनाको
कवच आदिसे सुसज्जित कर, हाथमे हथियार ले सहसा उठकर खड़े हो
गये। उस समय महिषासुरने बड़े क्रोधमें आकर कहा-- “आः! यह क्या हो
रहा है?” फिर वह सम्पूर्ण असुरोंस घिरकर उस सिंहनादकौ ओर लक्ष्य
करके दौड़ा और आगे पहुँचकर उसने देवीको देखा, जो अपनी प्रभासे
तीनों लोकोंको प्रकाशित कर रही थीं॥ ३५-- ३७॥ उनके चरणोंके भारसे पृथ्वी
दबी जा रही थी। माथेके मुकुटसे आकाशमें रेखा-सी खिंच रही थी तथा
देवी अपनी हजारों भुजाओंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करके खड़ी थीं।
तदनन्तर उनके साथ देत्योका युद्ध छिड़ गया॥ ३९॥ नाना प्रकारके अस्त्र
शस्त्रौके प्रहारसे सम्पूर्ण दिशाएँ उद्धासित होने लगीं । चिक्षुर नामक महान् असुर
राक्षस हाथीसवार ओर घुडसवारोके अनेक दलों तथा एक करोड़ रथियोंकी
केचिच्च चिक्षिपुः शक्तीः केचित्पाशांस्तथापरे।। ४८ ॥
धिरकर लोहा लेने लगा। इनके अतिरिक्त और भी हजारों महादैत्य रथ,
हाथी और घोड़ोंकी सेना साथ लेकर वहाँ देवीके साथ युद्ध करने लगे।
स्वयं महिषासुर उस रणभूमिमें कोटि-कोटि सहस्र रथ, हाथी और
घोडोंकी सेनासे घिरा हुआ खड़ा था। वे दैत्य देवीके साथ तोमर, भिन्दिपाल,
शक्ति, मूसल, खड्ग, परशु और पट्टिश आदि अस्त्र-शस्त्रौका प्रहार करते
हुए युद्ध कर रहे थे। कुछ दैत्योंने उनपर शक्तिका प्रहार किया, कुछ लोगोने
पाश फेंके ॥ ४३--४८॥ तथा कुछ दूसरे दैत्योने खड्गप्रहार करके देवीको
मार डालनेका उद्योग किया। देवीने भी क्रोधे भरकर खेल-खेलमें ही
अपने अस्त्र-शस्त्रौको वर्षा करके दैत्योके वे समस्त अस्त्र-शस्त्र काट
डाले। उनके मुखपर परिश्रम या थकावटका रंचमात्र भी चिहन नहीं था, देवता
ओर ऋषि उनको स्तुति करते थे ओर वे भगवती परमेश्वरी दैत्योके शरीरोंपर
अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करती रहीं।
देवीका वाहन सिंह भी क्रोधमें भरकर गर्दनके बालोंको हिलाता हुआ
असुरोंकी सेनामें इस प्रकार विचरने लगा, मानो वनोमे दावानल फैल रहा
हो। रणभूमिमें दैत्योंक साथ युद्ध करती हुई अम्बिकादेवीने जितने निःश्वास
छोड़े, वे सभी तत्काल सैकड़ों-हजारों गणोंके रूपमें प्रकट हो गये और परशु,
भिन्दिपाल, खड्ग तथा पट्टिश आदि अस्त्रद्रारा असुरोंका सामना करने
लगे॥ ४९--५३॥ देवीकी शक्तिसे बढ़े हुए वे गण असुरोंका नाश करते
हुए नगाड़ा और शंख आदि बाजे बजाने लगे॥ ५४॥ उस संग्राम-महोत्सवमें
कितने ही गण मृदंग बजा रहे थे। तदनन्तर देवीने त्रिशूलसे, गदासे,
शक्तिकी वर्षसि ओर खड्ग आदिसे सैकड़ों महादैत्योंका संहार कर डाला।
कितनोंको घण्टेके भयंकर नादसे मूर्च्छित करके मार गिराया॥ ५५-५६॥
असुरान् भुवि पाशेन बद्ध्वा चान्यानकर्षयत् |
केचिद् द्विधा कृतास्तीक्ष्ण: खड्गपातैस्तथापरे।। ५७॥
बहुतेरे दैत्योको पाशसे बोधकर धरतीपर घसीटा। कितने ही दैत्य उनकी तीखी
तलवारकी मारसे दो-दो टुकड़े हो गये ॥ ५७॥ कितने ही गदाकी चोटसे घायल
हो धरतीपर सो गये। कितने ही मूसलकौ मारसे अत्यन्त आहत होकर रक्त
वमन करने लगे। कुछ दैत्य शूलसे छाती फट जानेके कारण पृथ्वीपर ढेर हो
गये। उस रणांगणमें बाणसमूहोंकी वृष्टिसे कितने ही असुरोकौ कमर टूट
गयी ॥ ५८-५९ ॥ बाजक तरह इपटनेवाले देवपीडक दैत्यगण अपने प्राणोंसे
हाथ धोने लगे। किन्हीकौ बहि छिनन-भिन हो गयीं । कितनोंकी गर्दन कट
गयीं । कितने ही दैत्योके मस्तक कट-कटकर गिरने लगे। कुछ लोगोंके
शरीर मध्यभागे ही विदीर्ण हो गये। कितने ही महादैत्य जाँघें कट जानेसे
पृथ्वीपर गिर पड़े। कितनोंको ही देवीने एक बाँह, एक पैर और एक
नेत्रवाले करके दो टुकड़े चीर डाला। कितने ही दैत्य मस्तक कट जानेपर
कबन्धा युयुधुर्देव्या गृहीतपरमायुधाः |
भी गिरकर फिर उठ जाते ओर केवल धड़के ही रूपमे अच्छे-अच्छे हथियार
हाथमें ले देवीके साथ युद्ध करने लगते थे। दूसरे कबन्ध युद्धके बाजोंको लयपर
नाचते थे ॥ ६०-- ६३ ॥ कितने ही बिना सिरके धड़ हाथोमें खड्ग, शक्ति और
ऋष्टि लिये दौड़ते थे तथा दूसरे दूसरे महादैत्य 'ठहरो! ठहरो !!* यह कहते
हुए देवीको युद्धके लिये ललकारते थे। जहाँ वह घोर संग्राम हुआ था, वहाँकी
धरती देवीके गिराये हुए रथ, हाथी, घोडे ओर असुरोंकी लाशोंसे ऐसी पट गयी
थी कि वहाँ चलना-फिरना असम्भव हो गया था॥ ६४-६५॥ दैत्योंकी सेनामें
हाथी, घोडे और असुरोके शरीरोसे इतनी अधिक मात्रामें रक्तपात हुआ था कि
थोड़ी ही देरमे वहाँ खूनकौ बड़ी-बड़ी नदियाँ बहने लगीं ॥ ६६ ॥ जगदम्नाने
असुरोंकौ विशाल सेनाको क्षणभरमें नष्ट कर दिया- ठीक उसी तरह, जैसे
ओर वह सिंह भी गर्दनके बालोंको हिला-हिलाकर जोर-जोरसे गर्जना करता
हुआ दैत्योंके शरीरोसे मानो उनके प्राण चुने लेता था॥ ६८ ॥ वहाँ देवीके गणोने
भी उन महादेत्योके साथ ऐसा युद्ध किया, जिससे आकाशमें खड़े हुए देवतागण
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमे सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके
अन्तर्गत देवीगाहात्म्यमें 'महिषासुरकी सेनाका वथ”