रूपकी प्रशंसा सुनकर शुम्भका उनके पास दूत
भेजना ओर दूतका निराश लौटना
विनियोगः
ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य सुद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप्
छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरूपम् ,
महासरस्वती प्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।
ध्यानम्
ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
प्रसन्नताके लिये उत्तरचरित्रके पाठमें इसका विनियोग किया जाता है।
जो अपने करकमलोंमें घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और
बाण धारण करती हैं, शरदऋतुके शोभासम्पन्न चन्द्रमाके समान जिनको मनोहर
कान्ति है, जो तीनों लोकोंकी आधारभूता ओर शुम्भ आदि दैत्योँका
नाश करनेवाली हैं तथा गौरीके शरीरसे जिनका प्राकट्य हुआ है, उन
ऋषि कहते हें --॥ १॥ पूर्वकालमें शुम्भ ओर निशुम्भ नामक असुरोने
अपने बलके घमंडमें आकर शचीपति इनद्रके हाथसे तीनों लोकोंका राज्य और
यज्ञभाग छीन लिये ॥२॥ वे ही दोनों सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, यम और वरुणके
अधिकारका भी उपयोग करने लगे। वायु ओर अग्निका कार्य भी वे ही करने
लगे। उन दोनोने सब देवताओंको अपमानित, राज्यभ्रष्ट, पराजित तथा
अधिकारहीन करके स्वर्गसे निकाल दिया। उन दोनों महान् असुरोंसे तिरस्कृत
देवताओंने अपराजितादेवीका स्मरण किया ओर सोचा-* जगदम्बाने हम-
लोगोँको वर दिया था कि आपत्तिकालमें स्मरण करनेपर मैं तुम्हारी सब
आपत्तियोका तत्काल नाश कर दूँगी ' ॥ ३--६॥ यह विचारकर देवता गिरिराज
देवता बोले--॥ ८॥ देवीको नमस्कार है, महादेवी शिवाको सर्वदा
नमस्कार करते हे ॥ ९॥ रौद्राको नमस्कार है । नित्या, गौरी एवं धात्रीको बारंबार
नमस्कार है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवीको सतत प्रणाम
हे ॥ १०॥ शरणागतोका कल्याण करनेवाली वृद्धि एवं सिद्धिरूपा देवीको हम
बारंबार नमस्कार करते हैं। नैऋती (राक्षसोंकी लक्ष्मी), राजाओंकी लक्ष्मी
सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रादेवीको सर्वदा नमस्कार है ॥ १२॥ अत्यन्त
सौम्य तथा अत्यन्त रौद्ररूपा देवीको हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा बारंबार
प्रणाम है। जगत्की आधारभूता कृतिदेवीको बारंबार नमस्कार है ॥ १३॥ जो
देवी सब प्राणियोमें विष्णुमायाके नामसे कही जाती हैं, उनको नमस्कार, उनको
नमस्कार उनको बारंबार नमस्कार है॥१४-१६॥ ]_
प्रणन्तः, तेषां प्रणतामिति षष्ठीबहुवचनान्तं बोध्यम्। इति शान्तनव्यां टीकायां स्पष्टम्,
अपने अभीष्टकी प्राप्ति होनेसे देवताओंने जिनकी स्तुति की तथा देवराज इन्द्रन
बहुत दिनोंतक जिनका सेवन किया, वह कल्याणक साधनभूता ईश्वरी हमारा
कल्याण ओर मंगल करे तथा सारी आपत्तियोका नाश कर डाले ॥ ८१॥ उदण्ड
देत्योंसे सताये हुए हम सभी देवता जिन परमेश्वरीको इस समय नमस्कार करते
हैं तथा जो भक्तिसे विनम्र पुरुषोद्रारा स्मरण की जानेपर तत्काल ही सम्पूर्ण
ऋषि कहते हैं--॥ ८३॥ राजन्! इस प्रकार जब देवता स्तुति कर रहे
थे, उस समय पार्वतीदेवी गंगाजीके जलमें स्नान करनेके लिये वहाँ
उन सुन्दर भौंहोंबाली भगवतीने देवताओंसे पूषछछा-"आपलोग यहाँ
किसकी स्तुति करते हैं?” तब उन्हींके शरीरकोशसे प्रकट हुई शिवादेवी
बोलीं-- ॥ ८५ ॥ ' शुम्भ दैत्यसे तिरस्कृत और युद्धमें निशुम्भसे पराजित हो यहाँ
एकत्रित हुए ये समस्त देवता यह मेरी ही स्तुति कर रहे हैँ ' ॥ ८६॥ पार्वतीजीके
शरीरकोशसे अम्बिकाका प्रादुर्भाव हुआ था, इसलिये वे समस्त लोकों ' कौशिकौ '
कही जाती हैं ॥ ८७॥ कौशिकीके प्रकट होनेके बाद पार्वतीदेवीका शरीर काले
रंगका हो गया, अतः वे हिमालयपर रहनेवाली कालिकादेवीके नामसे विख्यात
हुईं॥ ८८ ॥ तदनन्तर शुम्भ-निशुम्भके भृत्य चण्ड-मुण्ड वहाँ आये और उन्होने
परम मनोहर रूप धारण करनेवाली अम्बिकादेवीको देखा ॥८९॥ फिर वे
शुम्भके पास जाकर बोले-' महाराज ! एक अत्यन्त मनोहर स्त्री है, जो अपनी
वैसा उत्तम रूप कहीं किसीने भी नहीं देखा होगा। असुरेश्वर !
पता लगाये, वह देवी कोन है और उसे ले लीजिये॥ ९१॥ स्त्रियोंमें तो
वह रत्न है, उसका प्रत्येक अंग बहुत ही सुन्दर है तथा वह अपने श्रीअंगोंकी
प्रभासे सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रकाश फैला रही हे । दैत्यराज! अभी वह हिमालय-
पर ही मौजूद है, आप उसे देख सकते हे ॥ ९२॥ प्रभो! तीनों लोकोंमें मणि,
हाथी ओर घोडे आदि जितने भी रत्न हैं, वे सब इस समय आपके घरमें
शोभा पाते हैं॥९३॥ हाथियोंमें रत्नभूत एेरावत, यह पारिजातका वृक्ष ओर
यह उच्चैःश्रवा घोड़ा- यह सब आपने इन्द्रसे ले लिया है॥९४॥ हंसोंसे
जुता हुआ यह विमान भी आपके आँगनमें शोभा पाता है। यह रत्नभूत
अद्भुत विमान, जो पहले ब्रह्माजीके पास था, अब आपके यहाँ लाया गया
हे ॥ ९५॥ यह महापद्म नामक निधि आप कुबेरसे छीन लाये हँ । समुद्रने भी
आपको किंजल्किनी नामकी माला भेंट की है, जो केसरोसे सुशोभित है और
जिसके कमल कभी कुम्हलाते नहीं हैँ ॥ ९६ ॥ सुवर्णकी वर्षा करनेवाला
पाश और समुद्रमें होनेवाले सब प्रकारके रत्न आपके भाई निशुम्भके अधिकारमें
है । अग्निने भी स्वतः शुद्ध किये हुए दो वस्त्र आपकी सेवामें अर्पित किये
हैं ॥ ९८-९९॥ दैत्यराज! इस प्रकार सभी रत्न आपने एकत्र कर लिये हैँ । फिर
जो यह स्त्रियों रत्नरूप कल्याणमयी देवी है, इसे आप क्यों नहीं अपने
ऋषि कहते हैं--॥ १०१॥ चण्ड-मुण्डका यह वचन सुनकर शुम्भने
महादेत्य सुग्रीवको दूत बनाकर देवीके पास भेजा ओर कहा--' तुम मेरी
आज्ञासे उसके सामने ये-ये बातें कहना और ऐसा उपाय करना, जिससे
वह दूत पर्वतके अत्यन्त रमणीय प्रदेशमें, जहाँ देवी मौजूद थीं, गया और मधुर
परमेश्वर हैं। मैं उन्दीका भेजा हुआ दूत हूँ ओर यहाँ तुम्हारे ही पास आया
हूँ॥ १०६ ॥ उनकी आज्ञा सदा सब देवता एक स्वरसे मानते हैँ । कोई उसका
उल्लंघन नहीं कर सकता। वे सम्पूर्णं देवताओंको परास्त कर चुके हैँ । उन्होंने
तुम्हारे लिये जो संदेश दिया है, उसे सुनो-- ॥ १०७॥ “सम्पूर्ण त्रिलोकी मेरे
अधिकारमें है । देवता भी मेरी आज्ञाके अधीन चलते हें । सम्पूर्ण यज्ञोके भागोंको
मै ही पृथक्-पृथक् भोगता हूं ॥ १०८॥ तीनों लोकोंमें जितने श्रेष्ठ रत्न हैं, वे सब
मेरे अधिकारमें हैँ । देवराज इन्द्रका वाहन ऐरावत, जो हाथियोंमें रत्नके समान है,
मैने छीन लिया है ॥ १०९ ॥ क्षीरसागरका मन्थन करनेसे जो अश्वरत्न उच्चैःश्रवा
सुन्दरी! उनके सिवा और भी जितने रत्नभूत पदार्थ देवताओं, गन्धर्वो ओर
नागोंके पास थे, वे सब मेरे ही पास आ गये हैं ॥ १११॥ देवि! हमलोग तुम्हें
संसारक स्त्रियोंमें रत्न मानते हैं, अत: तुम हमारे पास आ जाओ; क्योकि रत्नोंका
उपभोग करनेवाले हम ही हैँ ॥ ११२॥ चंचल कटाक्षोंवाली सुन्दरी! तुम मेरी
या मेरे भाई महापराक्रमी निशुम्भको सेवामें आ जाओ; क्योकि तुम रत्नस्वरूपा
ऋषि कहते हैं--॥११५॥ दूतके यों कहनेपर कल्याणमयी भगवती
दुगदिवी, जो इस जगतूको धारण करती हैं, मन-ही-मन गम्भीरभावसे
नहीं है। शुम्भ तीनों लोकोंका स्वामी है ओर निशुम्भ भी उसीके समान
पराक्रमी हे ॥ ११८ ॥ किंतु इस विषयमे मैंने जो प्रतिज्ञा कर ली है, उसे मिथ्या
कैसे करूँ? मैंने अपनी अल्पबुद्धिके कारण पहलेसे जो प्रतिज्ञा कर रखी है,
उसे सुनो-- ॥ ११९॥ "जो मुझे संग्राममे जीत लेगा, जो मेरे अभिमानको चूर्ण
कर देगा तथा संसारमें जो मेरे समान बलवान् होगा, वही मेरा स्वामी
होगा" ॥ १२०॥ इसलिये शुम्भ अथवा महादैत्य निशुम्भ स्वयं ही यहाँ पधार
और मुझे जीतकर शीघ्र ही मेरा पाणिग्रहण कर ले, इसमें विलम्बकी क्या
हो सके ॥ १२३॥ देवि! अन्य दैत्योके सामने भी सारे देवता युद्धमें नहीं
जिन शुम्भ आदि दैत्योके सामने इन्द्र॒ आदि सब देवता भी युद्धमें खड़े नहीं हुए,
उनके सामने तुम स्त्री होकर कैसे जाओगी ॥ १२५॥ इसलिये तुम मेरे ही कहनेसे
शुम्भ-निशुम्भके पास चली चलो ऐसा करनेसे तुम्हारे गौरवकी रक्षा होगी; अन्यथा
देवीने कहा--॥ १२७॥ तुम्हारा कहना ठीक है, शुम्भ बलवान् हैं और
निशुम्भ भी बड़े पराक्रमी हैं; किंतु क्या करूँ ? मैंने पहले बिना सोचे-समझे प्रतिज्ञा
कर ली है॥ १२८॥ अतः अब तुम जाओ; मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सब
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके
अन्तर्गत देवीगाहात्म्यमें 'देवी-दूत-संवाद ” नामक