चिन्तन करता हूँ। वे नागराजके आसनपर बैठी हैं, नागोके फणोमें सुशोभित
होनेवाली मणियोंकी विशाल मालासे उनकी देहलता उद्धासित हो रही है।
सूर्यके समान उनका तेज है, तीन नेत्र उनकी शोभा बढ़ा रहे हैँ । वे हाथोंमें
माला, कुम्भ, कपाल ओर कमल लिये हुए हैं तथा उनके मस्तके अर्धचन्द्रका
मुकुट सुशोभित है।
ऋषि कहते हैं--॥ १॥ देवीका यह कथन सुनकर दूतको बड़ा अमर्ष
हुआ ओर उसने दैत्यराजके पास जाकर सब समाचार विस्तारपूर्वक कह
सुनाया ॥ २॥ दूतके उस वचनको सुनकर दैत्यराज कुपित हो उठा और
“ धूम्रलोचन ! तुम शीघ्र अपनी सेना साथ लेकर जाओ और उस दुष्टाके
केश पकड़कर घसीटते हुए उसे बलपूर्वक यहाँ ले आओ॥ ४॥ उसकी रक्षा
करनेके लिये यदि कोई दूसरा खड़ा हो तो वह देवता, यक्ष अथवा गन्धर्व ही
ऋषि कहते हैं--॥ ६ ॥ शुम्भके इस प्रकार आज्ञा देनेपर वह धूम्रलोचन दैत्य
साठ हजार असुरोंकी सेनाको साथ लेकर वहसे तुरंत चल दिया ॥ ७ ॥ वहाँ पहुंचकर
उसने हिमालयपर रहनेवाली देवीको देखा ओर ललकारकर कहा-'अरी! तू
शुम्भ-निशुम्भके पास चल । यदि इस समय प्रसन्नतापूर्वक मेरे स्वामीके समीप नहीं
चलेगी तो मैं बलपूर्वक झोंट पकड़कर घसीटते हुए तुझे ले चलूँगा'॥ ८-९॥
देवी बोलीं--॥ १० ॥ तुम्हें दैत्योंके राजाने भेजा है, तुम स्वयं भी बलवान्
हो और तुम्हारे साथ विशाल सेना भी है; ऐसी दशामें यदि मुझे बलपूर्वक ले
ऋषि कहते हैं--॥ १२॥ देवीके यों कहनेपर असुर धूप्रलोचन उनकी
ओर दौड़ा, तब अम्बिकाने "हुं" शब्दके उच्वारणमात्रसे उसे भस्म कर
दिया ॥ १३॥ फिर तो क्रोधे भरी हुई देत्योको विशाल सेना और अग्बिकाने
दैत्योंको पंजोंकी मारसे, कितनोंको अपने जबड़ोंसे और कितने ही महादैत्योंको
पटककर ओठकी दाढोसे घायल करके मार डाला॥ १६॥ उस सिंहने अपने
नखोंसे कितनोंके पेट फाड़ डाले और थप्पड़ मारकर कितनोंके सिर धड़से
कितनोंकी भुजाएँ ओर मस्तक काट डाले तथा अपनी गर्दनके बाल हिलाते
हुए उसने दूसरे दैत्योके पेट फाड़कर उनका रक्त चूस लिया ॥ १८ ॥ अत्यन्त
क्रोधमें भरे हुए देवीके वाहन उस महाबली सिंहने क्षणभरमें ही असुरोंकी सारी
दी-- ॥ २०-२१॥ ' हे चण्ड! ओर हे मुण्ड! तुमलोग बहुत बड़ी सेना लेकर वहाँ
जाओ, उस देवीके झोंटे पकड़कर अथवा उसे बोधकर शीघ्र यहाँ ले आओ।
यदि इस प्रकार उसको लानेमें संदेह हो तो युद्धे सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों
तथा समस्त आसुरी सेनाका प्रयोग करके उसकी हत्या कर डालना ॥ २२-२३॥
उस दुष्टाकी हत्या होने तथा सिंहके भी मारे जानेपर उस अम्बिकाको बोधकर
कथाके अन्तर्गत देवीयाहात्म्यमें 'धूत्रलोचन-वध