म अणिमा आदि सिद्धिमयी किरणोँसे आवृत भवानीका ध्यान करता हूं ।
उनके शरीरका रंग लाल है, नेत्रम करुणा लहरा रही है तथा हाथमे पाश,
अंकुश, बाण और धनुष शोभा पाते हैं।
ऋषि कहते हैं--॥१॥ चण्ड ओर मुण्ड नामक दैत्योके मारे
जाने तथा बहुत-सी सेनाका संहार हो जानेपर दैत्योके राजा प्रतापी शुम्भके मनमें
बड़ा क्रोध हुआ और उसने दैत्योको सम्पूर्णं सेनाको युद्धके लिये कूच करनेकौ
आज्ञा दी॥ २-३॥ वह बोला--' आज उदायुध नामके छियासी दैत्य- सेनापति
अपनी सेनाओंके साथ युद्धके लिये प्रस्थान करें । कम्बु नामवाले दैत्योके चौरासी
पचास कोरिवीर्य-कुलके और सौ धोग्र-कुलके असुरसेनापति मेरी आज्ञासे
सेनासहित कूच करं ॥ ५॥ कालक, दौर्हद, मौर्य ओर कालकेय असुर भी युद्धके
लिये तैयार हो मेरी आज्ञासे तुरंत प्रस्थान करें ' ॥ ६॥ भयानक शासन करनेवाला
असुरराज शुम्भ इस प्रकार आज्ञा दे सहस्रं बड़ी-बड़ी सेनाओंके साथ युद्धके लिये
प्रस्थित हुजआ॥ ७॥ उसकी अत्यन्त भयंकर सेना आती देख चण्डिकाने अपने
धनुषकी टंकारसे पृथ्वी ओर आकाशके बीचका भाग गुंजा दिया ॥ ८ ॥ राजन्!
तदनन्तर देवीके सिंहने भी बड़ जोर-जोरसे दहाड्ना आरम्भ किया, फिर अम्बिकाने
घण्टेके शब्दसे उस ध्वनिको और भी बढ़ा दिया ॥ ९॥ धनुषको टकार, सिंहकी
दहाड ओर घण्टेकी ध्वनिसे सम्पूर्णं दिशां गंज उटीं । उस भयंकर शब्दसे कालीन
थीं, उनके शरीरोंसे निकलकर उन्दीके रूपमे चण्डिकादेवीके पास गयीं ॥ १२-
१३॥ जिस देवताका जैसा रूप, जैसी वेश-भूषा ओर जैसा वाहन है, ठीक वैसे
ब्रह्माजीको शक्ति उपस्थित हुई, जिसे "ब्रह्माणी ' कहते हैं ॥ १५॥ महादेवजीकौ
शक्ति वृषभपर आरूढ हो हाथोंमें श्रेष्ठ त्रिशूल धारण किये महानागका
शार्ड्रधनुष तथा खड्ग हाथमे लिये वहाँ आयी ॥ १८ ॥ अनुपम यज्ञवाराहका रूप
धारण करनेवाले श्रीहरिकौ जो शक्ति है, वह भी वाराह-शरीर धारण करके वहाँ
उपस्थित हुई ॥ १९॥ नारसिंही शक्ति भी नृसिंहके समान शरीर धारण करके वहाँ
पास दूत बनकर जाइये ॥ २४॥ और उन अत्यन्त गर्वीले दानव शुम्भ एवं निशुम्भ
दोनोंसे कहिये। साथ ही उनके अतिरिक्त भी जो दानव युद्धके लिये वहाँ उपस्थित
हों उनको भी यह संदेश दीजिये-- ॥ २५॥ ' दैत्यो ! यदि तुम जीवित रहना चाहते
हो तो पातालको लौट जाओ। इन्द्रको त्रिलोकौका राज्य मिल जाय और देवता
यज्ञभागका उपभोग करं ॥ २६ ॥ यदि बलके घमंडमें आकर तुम युद्धकौ अभिलाषा
चूँकि उस देवीने भगवान् शिवको दूतके कार्यमें नियुक्त किया था, इसलिये वह
शिवदूती ' के नामसे संसारम विख्यात हुई ॥ २८॥ वे महादैत्य भी भगवान् शिवके
महसे देवीके वचन सुनकर क्रोधमें भर गये और जहाँ कात्यायनी विराजमान
थीं, उस ओर बे ॥ २९॥ तदनन्तर वे दैत्य अमर्षमें भरकर पहले ही देवीके
ऊपर बाण, शक्ति ओर ऋष्टि आदि अस्त्रौको वृष्टि करने लगे ॥३०॥ तब
देवीने भी खेल-खेलमें ही धनुषकौ टंकार कौ और उससे छोड़े हुए बड़े-बड़े
फिर काली उनके आगे होकर शत्रुओंको शूलके प्रहारसे विदीर्ण करने लगी
ब्रह्माणी भी जिस-जिस ओर दौड़ती, उसी-उसी ओर अपने कमण्डलुका जल
छिड़ककर शत्रुओंके ओज और पराक्रमको नष्ट कर देती थी ॥ ३३ ॥ माहेश्वरीने
त्रिशूलसे तथा वैष्णवीने चक्रसे और अत्यन्त क्रोधमें भरी हुई कुमार कार्तिकेयकी
शक्तिने शक्तिसे देत्योका संहार आरम्भ किया ॥ ३४॥ इन्द्रशक्तिके वज्रप्रहारसे
वाराही शक्तिने कितनोंको अपनी थूथुनकी मारसे नष्ट किया, दाढ़ोंके अग्रभागसे
कितनोंकी छाती छेद डाली तथा कितने ही दैत्य उसके चक्रकौ चोटसे विदीर्ण
होकर गिर पड़ ॥ ३६॥ नारसिंही भी दूसरे दूसरे महादैत्योको अपने नखोंसे
विदीर्ण करके खाती और सिंहनादसे दिशाओं एवं आकाशको गुँजाती हुई
युद्धक्षेत्रमें विचरने लगी ॥ ३७॥ कितने ही असुर शिवदूतीके प्रचण्ड अद हाससे
अत्यन्त भयभीत हो पृथ्वीपर गिर पड़े और गिरनेपर उन्हें शिवदूतीने उस
बड़े असुरोंका मर्दन करते देख देत्यसैनिक भाग खड़े हुए ॥ ३९ ॥ मातृगणोंसे पीड़ित
देत्योको युद्धसे भागते देख रक्तबीज नामक महादैत्य क्रोधमें भरकर युद्ध करनेके
लिये आया ॥ ४०॥ उसके शरीरसे जन रक्तकौ बूँद पृथ्वीपर गिरती, तब उसीके
तब ऐन्द्रीने अपने वच्रसे रक्तबीजको मारा॥४२॥ वच्रसे घायल होनेपर
उसके शरीरसे बहुत-सा रक्त चूने लगा और उससे उसीके समान रूप तथा
पराक्रमवाले योद्धा उत्पन्न होने लगे ॥ ४३॥ उसके शरीरसे रक्तक जितनी वृदे
गिरीं, उतने ही पुरुष उत्पन्न हो गये। वे सब रक्तबीजके समान ही वीर्यवान्,
बलवान् तथा पराक्रमी थे॥ ४४॥ वे रक्तसे उत्पन्न होनेवाले पुरुष भी अत्यन्त
भयंकर अस्त्र शस्त्रौका प्रहार करते हुए वहाँ मातृगणोके साथ घोर युद्ध करने
लगे ॥ ४५ ॥ पुनः वज्रके प्रहारसे जब उसका मस्तक घायल हुआ, तब रक्त बहने
लगा और उससे हजारों पुरुष उत्पन्न हो गये ॥ ४६ ॥ वैष्णवीने युद्धमें रक्तबीजपर
वैष्णवीके चक्रसे घायल होनेपर उसके शरीरसे जो रक्त बहा और उससे जो
उसीके बराबर आकारवाले सहस्रं महादैत्य प्रकट हुए, उनके द्वारा सम्पूर्ण जगत्
व्याप्त हो गया ॥ ४८॥ कोमारीने शक्तिसे, वाराहीने खड्गसे और माहेश्वरीने
त्रिशूलसे महादैत्य रक्तबीजको घायल किया ॥ ४९ ॥ क्रोधमें भरे हुए उस महादैत्य
रक्तबीजने भी गदासे सभी मातृ-शक्तियोपर पृथक्-पृथक् प्रहार किया ॥ ५० ॥ शक्ति
और शूल आदिसे अनेक बार घायल होनेपर जो उसके शरीरसे रक्तकी धारा पृथ्वीपर
गिरी, उससे भी निश्चय ही सैकड़ों असुर उत्पन्न हुए ॥ ५१॥ इस प्रकार उस
महादेत्यके रक्तसे प्रकट हुए असुरोद्रारा सम्पूर्णं जगत् व्याप्त हो गया। इससे
उन देवताओंको बड़ा भय हुआ॥ ५२॥ देवताओंको उदास देख चण्डिकाने
तथा मेरे शस्त्रपातसे गिरनेवाले रक्तबिन्दुओं ओर उनसे उत्पन्न होनेवाले
महादेत्योको तुम अपने इस उतावले मुखसे खा जाओ ॥५४॥ इस प्रकार
रक्तसे उत्पन्न होनेवाले महादैत्योका भक्षण करती हुई तुम रणमें विचरती
रहो । ऐसा करनेसे उस दैत्यका सारा रक्त क्षीण हो जानेपर वह स्वयं भी नष्ट
हो जायगा ॥ ५५॥ उन भयंकर दैत्योंको जब तुम खा जाओगी, तब दूसरे
नये दैत्य उत्पन्न नहीं हो सकेगे।' कालीसे यों कहकर चण्डिकादेवीने
शूलसे रक्तबीजको मारा॥५६॥ ओर कालीने अपने मुखमें उसका रक्त ले
लिया। तब उसने वहाँ चण्डिकापर गदासे प्रहार किया॥५७॥ किंतु उस
गदापातने देवीको तनिक भी वेदना नहीं पहुंचायी । रक्तबीजके घायल शरीरसे
बहुत-सा रक्त गिरा॥ ५८ ॥ किंतु ज्यों ही वह गिरा त्यों ही चामुण्डाने उसे अपने
मुखमे ले लिया। रक्त गिरनेसे कालीके मुखमें जो महादैत्य उत्पन्न हुए, उन्हे
रक्तबीजको, जिसका रक्त चामुण्डाने पी लिया था, वज्र, बाण, खड्ग तथा ऋष्ट
आदिसे मार डाला। राजन्! इस प्रकार शस्तरौके समुदायसे आहत एवं रक्तहीन
हुआ महादैत्य रक्तबीज पृथ्वीपर गिर पड़ा । नरेश्वर ! इससे देवताओंको अनुपम
हर्षकी प्राप्ति हुई॥ ५९--६२॥ ओर मातृगण उन असुरोंके रक्तपानके मदसे
इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके
अन्तर्गत देवीमाहात्स्यमे (रक्तबीज-वध नामक