जो सिंहकौ पीठपर विराजमान हैं, जिनके मस्तकपर चनद्रमाका मुकुट है,
जो मरकतमणिके समान कान्तिवाली अपनी चार भुजाओंमें शंख, चक्र, धनुष
और बाण धारण करती हैं, तीन नेत्रसे सुशोभित होती हैं, जिनके भिन्न-भिन्न
अंग बधि हुए बाजूबंद, हार, कंकण, खनखनाती हुई करधनी ओर रुनझुन करते
हुए नूपुरोंसे विभूषित हैं तथा जिनके कानोंमें रत्नजटित कुण्डल झिलमिलाते रहते
हैं, वे भगवती दुर्गा हमारी दुर्गति दूर करनेवाली हों।
[महर्षि अम्भृणकौ कन्याका नाम वाक् था। वह बड़ी ब्रह्मज्ञानिनी थी।
उसने देवीके साथ अभिन्नता प्राप्त कर ली थी। उसीके ये उद्गार हैं-- ] मैं
सच्विदानन्दमयी सर्वात्मा देवी रुद्र, वसु, आदित्य तथा विश्वेदेवगणोंके रूपमें
विचरती हूँ। मैं ही मित्र और वरुण दोनोंको, इन्द्र॒ ओर अग्निको तथा दोनों
तथा पूषा ओर भगको भी धारण करती हूँ। जो हविष्यसे सम्पन्न हो
देवताओंको उत्तम हविष्यकौ प्राप्ति कराता है तथा उन्हें सोमरसके द्वारा तृप्त
करता है, उस यजमानके लिये मैं ही उत्तम यज्ञका फल और धन प्रदान करती
हूँ॥२॥ मैं सम्पूर्ण जगत्की अधीश्वरी, अपने उपासकोंको धनकौ प्राप्ति
करानेवाली, साक्षात्कार करनेयोग्य परब्रह्मको अपनेसे अभिन्न रूपमे जाननेवाली
तथा पूजनीय देवताओंमें प्रधान हूँ। मैं प्रपंचरूपसे अनेक भावोंमें स्थित हूँ।
सम्पूर्ण भूतोंमें मेरा प्रवेश है। अनेक स्थानोमे रहनेवाले देवता जहाँ-कहीं
जो कुछ भी करते हैं, वह सब मेरे लिये करते हैं॥३॥ जो अन खाता है,
वह मेरी शक्तिसे ही खाता है [क्योंकि मैं ही भोक्त-शक्ति हूँ]; इसी
प्रकार जो देखता है, जो साँस लेता है तथा जो कही हुई बात सुनता है,
वह मेरी ही सहायतासे उक्त सब कर्म करनेमें समर्थ होता है। जो मुझे
इस रूपमें नहीं जानते, वे न जाननेके कारण ही दीन-दशाको प्राप्त होते जाते
हैं। हे बहुश्रुत! मैं तुम्हें श्रद्धासे प्राप्त होनेवाले ब्रह्मतत्तवका उपदेश करती
हूँ, सुनो-- ॥४॥ मैं स्वयं ही देवताओं और मनुष्योद्रारा सेवित इस दुर्लभ
तत्त्वका वर्णन करती हूँ। मैं जिस-जिस पुरुषकी रक्षा करना चाहती हूँ, उस-
यं काम्ये तं तमुग्रं कृणोमि
मै ही शरणागतजनोंकी रक्षाके लिये शत्रुओंसे युद्ध करती हूँ तथा अन्तर्यामीरूपसे
पृथ्वी ओर आकाशके भीतर व्याप्त रहती हँ॥६॥ मैं ही इस जगत्के
पितारूप आकाशको सर्वाधिष्ठानस्वरूप परमात्माके ऊपर उत्पन्न करती हूँ।
समुद्र (सम्पूर्ण भूतोंके उत्पत्तिस्थान परमात्मा) में तथा जल (बुद्धिकौ
व्यापक वृत्तियों)-में मेरे कारण (कारणस्वरूप चैतन्य ब्रह्म)-की स्थिति है;
अतएव मैं समस्त भुवनमें व्याप्त रहती हूँ तथा उस स्वर्गलोकका भी अपने
शरीरसे स्पर्शं करती हूं ॥७॥ मैं कारणरूपसे जब समस्त विश्वकौ रचना
आरम्भ करती हूँ, तब दूसरोंकी प्रेरणाके बिना स्वयं ही वायुकी भांति चलती