माँ! मैं न मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र; अहो! मुझे स्तुतिका भी ज्ञान नहीं हे ।
न आवाहनका पता है, न ध्यानका। स्तोत्र ओर कथाकी भी जानकारी नहीं है। न
तो तुम्हारी मुद्रां जानता हूँ ओर न मुझे व्याकुल होकर विलाप करना ही आता
है; परंतु एक बात जानता हूँ, केवल तुम्हारा अनुसरण-- तुम्हारे पीछे चलना। जो
सबका उद्धार करनेवाली कल्याणमयी माता! मैं पूजाकौ विधि नहीं जानता,
मेरे पास धनका भी अभाव है, मैं स्वभावसे भी आलसी हूँ तथा मुझसे ठीक-
ठीक पूजाका सम्पादन हो भी नहीं सकता; इन सब कारणोंसे तुम्हारे चरणोंकी
सेवामें जो त्रुटि हो गयी है, उसे क्षमा करना; क्योकि कुपुत्रका होना सम्भव
शिवे! मेरा जो यह त्याग हुआ है, यह तुम्हारे लिये कदापि उचित नहीं है; क्योकि
तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपमं यत्प्रकुरुषे
जगदम्ब! मातः! मैंने तुम्हारे चरणोंकी सेवा कभी नहीं कौ, देवि! तुम्हें
अधिक धन भी समर्पित नहीं किया; तथापि मुझ-जैसे अधमपर जो तुम
अनुपम स्नेह करती हो, इसका कारण यही है कि संसारमें कुपुत्र पैदा हो
करते समय] मुझे नाना प्रकारकी सेवाओंमें व्यग्र रहना पड़ता था, इसलिये
पचासी वर्षसे अधिक अवस्था बीत जानेपर मैंने देवताओंको छोड़ दिया है,
अब उनकी सेवा-पूजा मुझसे नहीं हो पाती; अतएव उनसे कुछ भी सहायता
मिलनेको आशा नहीं है। इस समय यदि तुम्हारी कृपा नहीं होगी तो मैं
फल यह होता है कि मूर्ख चाण्डाल भी मधुपाकके समान मधुर वाणीका
उच्चारण करनेवाला उत्तम वक्ता हो जाता है, दीन मनुष्य भी करोड़ों स्वर्ण-मुद्राओंसे
सम्पन्न हो चिरकालतक निर्भय विहार करता रहता हे । जब मन्त्रके एक अक्षरके
श्रवणका ऐसा फल है तो जो लोग विधिपूर्वक जपमें लगे रहते हैं, उनके जपसे
भवानी ! जो अपने अंगोंमें चिताकी राख-भभूत लपेटे रहते हैँ, जिनका विष
ही भोजन है, जो दिगम्बरधारी (नग्न रहनेवाले) हैँ, मस्तकपर जटा ओर कण्ठमें
नागराज वासुकिको हारके रूपमे धारण करते हैं तथा जिनके हाथमे कपाल
(भिक्षापात्र) शोभा पाता है, ऐसे भूतनाथ पशुपति भी जो एकमात्र ' जगदीश
की पदवी धारण करते हैं, इसका क्या कारण है? यह महत्त्व उन्हें केसे
मिला; यह केवल तुम्हारे पाणिग्रहणकी परिपाटीका फल है; तुम्हारे साथ विवाह
मुखमें चन्द्रमाकौ शोभा धारण करनेवाली माँ! मुझे मोक्षकी इच्छा नहीं है,
संसारके वैभवकौ भी अभिलाषा नहीं है; न विज्ञानकौ अपेक्षा है, न सुखकी
आकांक्षा; अतः तुमसे मेरी यही याचना है कि मेरा जन्म ' मृडानी, रुद्राणी, शिव,
कौन-सा अपराध नहीं किया है! फिर भी तुम स्वयं ही प्रयत्न करके मुझ
स्मरण करता हूँ [पहले कभी नहीं करता रहा] इसे मेरी शठता न मान लेना;
सी नात है, पुत्र अपराध पर-अपराध क्यों न करता जाता हो, फिर भी माता
महादेवि! मेरे समान कोई पातकी नहीं है ओर तुम्हारे समान दूसरी कोई