सी देवांगनाओंने अपने कर-कमलोंद्वारा भक्तिपूर्वक इसे सब ओरसे धो-पोंछकर
करते हैँ । अपनी कान्तिसे दमकते हुए राशि-राशि सुवर्णसे इसका निर्माण किया
गया है । यह अपनी मनोहर प्रभासे सदा प्रकाशमान रहता है । इसके सिवा, यह
चम्पा और केतकीकी सुगन्धसे पूर्ण अत्यन्त निर्मल तेल और सुगन्धयुक्त उबटन
है, जिसे दिव्य युवतियाँ आदरपूर्वक तुम्हारी सेवामें प्रस्तुत कर रही
कंघीसे झाड़ लो और गंगाजीको पवित्र धारामें नहाओ। तदनन्तर यह दिव्य
कस्तूरी ग्रहण करो । इसे स्वयं देवराज इन्द्रकौ पत्नी महारानी शची अपने कर-
कमलोमें लेकर सेवामें खड़ी है । इसमें चन्दन, कुंकुम तथा अगुरुका मेल होनेसे
ओर भी इसकी शोभा बढ़ गयी है। इससे बहुत अधिक गन्ध निकलनेके
सुन्दरियाँ अपने फैलाये हुए कर-कमलोंमें धारण किये खड़ी हैं। यह
केसरमें रँगा हुआ पीताम्बर है। इससे परम प्रकाशमान सूर्यमण्डलकी
शोभामयी दिव्य कान्ति निकल रही है, जिसके कारण यह बहुत ही सुशोभित
सुहाये, दोनों चरणोंमें मंजीर मुखरित होता रहे, वक्षःस्थलमें हार सुशोभित हो
और दोनों कलाइयोंमें कंकन खनखनाते रहें। तुम्हारे मस्तकपर रखा हुआ दिव्य
पापोँका नाश करनेवाली सम्पत्तिदायिनी त्रिपुरसुन्दरि! अपने मुखकौ शोभा
निहारनेके लिये यह दर्पण ग्रहण करो । इसे साक्षात् रति रानी अपने कर-कमलोंमें
लेकर सेवामे उपस्थित हैं। इस दर्पणके चारों ओर मूँगे जडे हैं। प्रचण्ड वेगसे
घूमनेवाले मन्दराचलकौ मथानीसे जब क्षीरसमुद्र मथा गया, उस समय यह दर्पण
निवासस्थान है, रखा हुआ है; यह तुम्हें सन्तोष प्रदान करे । इसमें जटामांसी,
गुग्गुल, चन्दन, अगुरु-चूर्ण, कपूर, शिलाजीत, मधु, कुंकुम तथा घी मिलाकर
जातीसौरभनिर्भरं रुचिकरं शाल्योदनं निर्मलं
देवी त्रिपुरसुन्दरि! तुम्हारी प्रसन्नताके लिये यहाँ यह दीप प्रकाशित हो रहा
है। यह घीसे जलता है; इसकी दीयटमें सुन्दर रत्नका डंडा लगा है, इसे
देवांगनाओंने बनाया हे । यह दीपक सुवर्णके चषक (पात्र) -मे जलाया गया
हे । इसमें कपूरके साथ वत्ती रखी हे । यह भारी-से-भारी अन्धकारका भी नाश
और चमेलीकौ सुगन्धसे वासित है। साथ ही हींग, मिर्च और जीरा आदि
सुगन्धित द्रव्योसे छौक-बघारकर बनाये हुए नाना प्रकारके व्यंजन भी हैं, इसमें
माँ! सुन्दर रत्मय पात्रमें सजाकर रखा हुआ यह दिव्य ताम्बूल अपने मुखमें
ग्रहण करो। लवंगकी कली चुभोकर इसके बीडे लगाये गये हैं, अतः बहुत
सुन्दर जान पड़ते हैं, इसमें बहुत-से पानके पत्तोंका उपयोग किया गया हे । इन
सब बीड़ोंमें कोमल जावित्री, कपूर और सोपारी पड़े हें । यह ताम्बूल सुधाके
जो चन्द्रमा और कुन्दके समान उज्ज्वल तथा पसीनेके कष्टको दूर करनेवाला
है, तुम्हारे हर्षको बढ़ावे। इसके सिवा महर्षिं अगस्त्य, वसिष्ठ, नारद,
शुक, व्यास आदि तथा वाल्मीकि मुनि अपने-अपने चित्तम जो वेदमन्त्रोंके
उच्वारणका विचार करते हैं, उनकी वह मनःसंकल्पित वेदध्वनि तुम्हारे
जो संगीत होता है तथा जिसमें अनेक प्रकारके कोलाहलका शब्द व्याप्त
रहता है, वह विद्याधरीद्रारा प्रदर्शित नृत्य-कला तुम्हारे सुखकी वृद्धि
लिये चित्तम जो आकुलता होती है, वही एकमात्र जीवनका फल है, वह
कोटि-कोटि जन्म धारण करनेपर भी इस संसारमें तुम्हारी कृपाके बिना सुलभ