परमेश्वरि ! मेरे द्वारा रात-दिन सहस्रं अपराध होते रहते हैँ । ' यह मेरा दास
परमेश्वरि! मै आवाहन नहीं जानता, विसर्जन करना नहीं जानता तथा पूजा
करनेका ठंग भी नहीं जानता। क्षमा करो॥२॥ देवि! सुरेश्वरि! मैंने जो
मन्त्रहीन, क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है, वह सब आपकी कृपासे
पूर्ण हो॥३॥ सैकड़ों अपराध करके भी जो तुम्हारी शरणमे जा जगदम्ब!
कहकर पुकारता है, उसे वह गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मादि देवताओंके
लिये भी सुलभ नहीं है ॥४॥ जगदम्बिके! मैं अपराधी हूँ, किंतु तुम्हारी
देवि! परमेश्वरि! अज्ञानसे, भूलसे अथवा बुद्धि भ्रान्त होनेके कारण मैंने
पूजा स्वीकार करो और मुझपर प्रसन्न रहो ॥ ७॥ देवि ! सुरेश्वरि! तुम गोपनीयसे
भी गोपनीय वस्तुको रक्षा करनेवाली हो। मेरे निवेदन किये हुए इस जपको