ऋषि कहते है- राजन्! नन्दा नामक देवी जो नन्दसे उत्पन्न होनेवाली
हैं, उनकी यदि भक्तिपूर्वक स्तुति और पूजा की जाय तो वे तीनों लोकोंको
अथवा नौ शक्तियों सहित रुद्र-विनायककी ही पूजा करे; सबका एक साथ नहीं, किंतु ऐसी
धारणाके लिये भी कोई प्रबल प्रमाण नहीं हे । नीचे कोष्ठकोंसे समण्टि-उपासना और व्यष्टि-
उपासनाका क्रम स्पष्ट किया जाता है
(समष्टि-उपासना)
रुद्र-गोरी ब्रह्मा-सरस्वती विष्णु-लक्ष्मी
(व्यष्टि-उपासना)
अष्टादशभुजा-पूजा दशानना-पूजा अष्टभुजा-पूजा
अष्टादशभुजा अष्टभुजा
काल | देवी |मृत्यु|काल दशानना | मृत्यु क्र देवी मृत्यु
देवी विनायक
भ्रामरी। ये देवियोंकी साक्षात् मूर्तियाँ हैं, इनके स्वरूपका प्रतिपादन होनेसे इस प्रकरणको
उनके श्रीअंगोंको कान्ति कनकके समान उत्तम है। वे सुनहरे रंगके सुन्दर
वस्त्र धारण करती हैँ । उनकी आभा सुवर्णके तुल्य है तथा वे सुवर्णके ही उत्तम
आभूषण धारण करती है ॥ २॥ उनकी चार भुजाएँ कमल, अंकुश, पाश और
शंखसे सुशोभित हैँ । वे इन्दिरा, कमला, लक्ष्मी, श्री तथा रुक्माम्बुजासना
उनके स्वरूपका वर्णन करूँगा; सुनो । वह सब प्रकारके भयोंको दूर करनेवाली
हैं ॥४॥ वे लाल रंगके वस्त्र धारण करती हैँ । उनके शरीरका रंग भी लाल
ही है और अंगौके समस्त आभूषण भी लाल रंगके हैँ । उनके अस्त्र शस्त्र,
नेत्र, सिरके बाल, तीखे नख और दाँत सभी रक्तवर्णके हैं; इसलिये वे
रक्तदन्तिका कहलाती और अत्यन्त भयानक दिखायी देती हैँ । जैसे स्त्री पतिके
प्रति अनुराग रखती है, उसी प्रकार देवी अपने भक्तपर (माताको भाँति) स्नेह
रखते हुए उसकी सेवा करती हैँ ॥ ५-६॥
( भुक्त्वा भोगान् यथाकामं देवीसायुज्यमाप्नुयात्। )
कठोर होते हुए भी अत्यन्त कमनीय हैं तथा पूर्णं आनन्दके समुद्र है । सम्पूर्ण
कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले ये दोनों स्तन देवी अपने भक्तोंको पिलाती
हैं ॥ ७-८ ॥ वे अपनी चार भुजाओंमें खड्ग, पानपात्र, मुसल ओर हल धारण करती
है । ये ही रक्तचामुण्डा और योगेश्वरीदेवी कहलाती हैँ ॥ ९॥ इनके द्वारा सम्पूर्ण
चराचर जगत् व्याप्त है । जो इन रक्तदन्तिकादेवीका भक्तिपूर्वक पूजन करता है, वह
भी चराचर जगतूमें व्याप्त होता हे ॥ १०॥ (वह यथेष्ट भोगोको भोगकर अन्तमें
देवीके साथ सायुज्य प्राप्त कर लेता है ।) जो प्रतिदिन रक्तदन्तिकादेवीके शरीरका
यह स्तवन करता है, उसकी वे देवी प्रेमपूर्वक संरक्षणरूप सेवा करती हैं-- ठीक
शाकम्भरीदेवीके शरीरकी कान्ति नीले रंगकी है। उनके नेत्र नीलकमलके
उनके दोनों स्तन अत्यन्त कठोर, सब ओरसे बराबर, ऊँचे, गोल, स्थूल तथा
परस्पर सटे हुए हैँ । वे परमेश्वरी कमलमें निवास करनेवाली हैं ओर हाथमे बाणोंसे
भरी मुष्टि, कमल, शाकसमूह तथा प्रकाशमान धनुष धारण करती हैं। वह
शाक समूह अनन्त मनोवांछित रसोंसे युक्त तथा क्षुधा, तृषा और मृत्युके भयको
नष्ट करनेवाला तथा फूल, पल्लव, मूल आदि एवं फलोंसे सम्पन्न है। वे ही
शाकम्भरी, शताक्षी तथा दुर्गा कही गयी दँ ॥ १२-- १५॥ वे शोकसे रहित,
दुष्टोका दमन करनेवाली तथा पाप और विपत्तिको शान्त करनेवाली हैँ । उमा,
गोरी, सती, चण्डी, कालिका और पार्वती भी वे ही हैं॥१६॥ जो मनुष्य
शाकम्भरीदेवीक स्तुति, ध्यान, जप, पूजा ओर वन्दन करता है, वह शीघ्र ही अन्न,
उनके नेत्र बड़े-बड़े हैं, स्वरूप स्त्रीका हे, स्तन गोल-गोल और स्थूल हैं। वे
अपने हाथमे चन्द्रहास नामक खड्ग, डमरू, मस्तक और पानपात्र धारण
करती हैं। वे ही एकवीरा, कालरात्रि तथा कामदा कहलाती ओर इन नामोंसे
प्रशंसित होती हैं॥ १८-१९॥
भ्रामरीदेवीकौ कान्ति विचित्र (अनेक रंगकी) है। वे अपने तेजोमण्डलके
कारण दुर्धर्ष दिखायी देती हैँ । उनका अंगराग भी अनेक रंगका है तथा वे चित्र
विचित्र आभूषणोँसे विभूषित हैं॥२०॥ चित्रभ्रमरपाणि ओर महामारी
आदि नामोंसे उनकी महिमाका गान किया जाता हे । राजन्! इस प्रकार जगन्माता
चण्डिकादेवीको ये मूर्तियाँ बतलायी गयी हैँ ॥२१॥ जो कीर्तन करनेपर
कामधेनुके समान सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करती हैँ । यह परम गोपनीय
रहस्य है। इसे तुम्हे दूसरे किसीको नहीं बतलाना चाहिये ॥ २२॥ दिव्य
मूर्तियोंका यह आख्यान मनोवांछित फल देनेवाला है, इसलिये पूर्ण प्रयत्न
करके तुम निरन्तर देवीके जप (आराधन) -में लगे रहो ॥ २३॥ सप्तशतीके
मन्त्रके पाठमात्रसे मनुष्य सात जन्मोमें उपार्जित ब्रह्महत्यासदृश घोर पातको
इसलिये मैंने पूर्ण प्रयत्न करके देवीके गोपनीयसे भी अत्यन्त गोपनीय
ध्यानका वर्णन किया है, जो सब प्रकारके मनोवांछित फलोंको देनेवाला
है॥ २५॥ (उनके प्रसादसे तुम सर्वमान्य हो जाओगे। देवी सर्वरूपमयी हैं
तथा सम्पूर्ण जगत् देवीमय है। अतः मैं उन विश्वरूपा परमेश्वरीको
नमस्कार करता हूँ।)
अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करे।