इसके बाद प्रथम चरित्रका विनियोग और ध्यान करके “मार्कण्डेय उवाच!
से सप्तशतीका पाठ आरम्भ करे । प्रत्येक चरित्रका विनियोग मूल सप्तशतीके
साथ ही दिया गया है तथा प्रत्येक अध्यायके आरम्भमें अर्थसहित ध्यान भी
दे दिया गया है। पाठ प्रेमपूर्वक भगवतीका ध्यान करते हुए करे। मीठा स्वर,
अक्षरौका स्पष्ट उच्चारण, पदोँका विभाग, उत्तम स्वर, धीरता, एक लयके
साथ बोलना-ये सब पाठकोंके गुण हैं।* जो पाठ करते समय रागपूर्वक
गाता, उच्चारणमे जल्दबाजी करता, सिर हिलाता, अपनी हाथसे लिखी हुई
पुस्तकपर पाठ करता, अर्थकौ जानकारी नहीं रखता और अधूरा ही मन्त्र
कण्ठस्थ करता है, वह पाठ करनेवालोमे अधम माना गया हे।२ जबतक
अध्यायकी पूर्तिं न हो, तबतक बीचमें पाठ बंद न करे। यदि प्रमादवश अध्यायके
बीचमे पाठका विराम हो जाय तो पुनः प्रति बार पूरे अध्यायका पाठ करे।४
१.इसका अर्थ बारहवें अध्यायके आरम्भ (पृष्ठ १७१) -मे हे ।
२.माधुर्यमक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः।
धर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः॥
३.गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः।
अनर्थज्ञोऽल्पकण्टश्च षडेते पाठकाधमाः॥
४.यावनन पूर्यतेऽध्यायस्तावनन विरमेत्पठन्।
यदि प्रमादादध्याये विरामो भवति प्रिये।
पुनरध्यायमारभ्य पठेत्सर्व॑ मुहुर्महुः॥
अज्ञानवश पुस्तक हाथमे लेकर पाठ करनेका फल आधा ही होता है।
स्तोत्रका पाठ मानसिक नहीं, वाचिक होना चाहिये। वाणीसे उसका स्पष्ट
उच्चारण ही उत्तम माना गया है।* बहुत जोर-जोरसे बोलना तथा पाठमें उतावली
करना वर्जित है। यत्नपूर्वक शुद्ध एवं स्थिरचित्तसे पाठ करना चाहिये।' यदि
पाठ कण्ठस्थ न हो तो पुस्तकसे करे। अपने हाथसे लिखे हुए अथवा ब्राह्मणेतर
पुरुषके लिखे हुए स्तोत्रका पाठ न करे।' यदि एक सहस्रसे अधिक श्लोकोंका
या मन्त्रोंका ग्रन्थ हो तो पुस्तक देखकर ही पाठ करे; इससे कम श्लोक हों
तो उन्हें कण्ठस्थ करके बिना पुस्तकके भी पाठ किया जा सकता है। अध्याय
समाप्त होनेपर "इति", * वध", 'अध्याय' तथा 'समाप्त' शब्दका उच्चारण नहीं
करना चाहिये।'
न मानसे पठेत्स्तोत्रं वाचिकं तु प्रशस्यते॥
शुद्धेनाचलचित्तेन पठितव्यं प्रयत्नत: ॥
न स्वयं लिखितं स्तोत्रं नाब्राह्यणलिपिं पठेत्॥
ततो न्यूनस्य तु भवेद् वाचनं पुस्तकं विना॥
मन्वन्तरे देवीमाहात्म्ये प्रथमः ॐ तत्सत्।' इसी प्रकार ! द्वितीयः, ‹ तृतीयः' आदि
कहकर समाप्त करना चाहिये।