लिये जपमें इनका विनियोग होता है।
मैं आपके चरणोंमें पड़ा हूँ। मुझे देवीके जिस स्वरूपकौ और जिस विधिसे
ऋषि कहते है- राजन्! यह रहस्य परम गोपनीय हे । इसे किसीसे कहने-
योग्य नहीं बतलाया गया है; किंतु तुम मेरे भक्त हो, इसलिये तुमसे न कहने-
योग्य मेरे पास कुछ भी नहीं है ॥३॥ त्रिगुणमयी परमेश्वरी महालक्ष्मी ही
सबका आदि कारण हैँ । वे ही दृश्य और अदृश्यरूपसे सम्पूर्णं विश्वको व्याप्त
राजन्! वे अपनी चार भुजाओंमें मातुलुंग (बिजौरेका फल), गदा, खेट
(ढाल) एवं पानपात्र और मस्तकपर नाग, लिंग तथा योनि- इन वस्तुओंको
धारण करती हैँ ॥ ५॥ तपाये हुए सुवर्णके समान उनकी कान्ति है, तपाये हुए
सुवर्णके ही उनके भूषण हैँ । उन्होने अपने तेजसे इस शून्य जगत्को परिपूर्ण
किया हे ॥ ६॥ परमेश्वरी महालक्ष्मीने इस सम्पूर्ण जगत्को शून्य देखकर केवल
तमोगुणरूप उपाधिके द्वारा एक अन्य उत्कृष्ट रूप धारण किया ॥७॥ वह रूप
एक नारीके रूपमें प्रकट हुआ, जिसके शरीरकी कान्ति निखरे हुए काजलकी
भोति काले रंगकौ थी, उसका श्रेष्ठ मुख दाढ़ोंसे सुशोभित था। नेत्र बड़े-बड़े
ओर कमर पतली थी ॥ ८॥ उसकी चार भुजाएँ ढाल, तलवार, प्याले और कटे
हुए मस्तकसे सुशोभित थीं। वह वक्षःस्थलपर कबन्ध (धड्)-की तथा
मस्तकपर मुण्डोंकी माला धारण किये हुए थी॥९॥ इस प्रकार प्रकट हुई
मुझे मेरा नाम और कर्म बताइये ' ॥ १०॥ तब महालक्ष्मीने स्त्रियोंमें श्रेष्ठ उस
तामसीदेवीसे कहा--'मैं तुम्हे नाम प्रदान करती हूँ ओर तुम्हारे जो-जो कर्म हैं,
उनको भी बतलाती हूं, ॥ ११॥ महामाया, महाकाली, महामारी, क्षुधा, तृषा,
निद्रा, तृष्णा, एकवीरा, कालरात्रि तथा दुरत्यया-- ॥ १२॥ ये तुम्हारे नाम हैं, जो
कर्मोके द्वारा लोकमें चरितार्थ होंगे। इन नामोंके द्वारा तुम्हरे कर्मोको जानकर
जो उनका पाठ करता है, वह सुख भोगता हे ' ॥ १३॥ राजन्! महाकालीसे यों
कहकर महालक्ष्मीने अत्यन्त शुद्ध सत्त्वगुणके द्वारा दूसरा रूप धारण किया, जो
चन्द्रमाके समान गौरवर्ण था ॥ १४॥ वह श्रेष्ठ नारी अपने हाथोंमें अक्षमाला,
अंकुश, वीणा तथा पुस्तक धारण किये हुए थी। महालक्ष्मीने उसे भी नाम प्रदान
किये ॥ १५॥ महाविद्या, महावाणी, भारती, वाक्, सरस्वती, आर्या, ब्राह्मी,
तथा कमलके आसनपर विराजमान थे। उनमेंसे एक स्त्री थी और दूसरा
पुरुष ॥ १८॥ तत्पश्चात् माता महालक्ष्मीने पुरुषको ब्रह्मन्! विधे! विरिंच ।
तथा धातः! इस प्रकार सम्बोधित किया और स्त्रीको श्री! पद्या! कमला!
लक्ष्मी ! इत्यादि नामोंसे पुकारा ॥ १९॥ इसके बाद महाकाली और महासरस्वतीने
भी एक-एक जोड़ा उत्पन्न किया। इनके भी रूप और नाम मैं तुम्हें बतलाता
हूँ॥ २०॥ महाकालीने कण्ठमें नील चिहनसे युक्त, लाल भुजा, श्वेत शरीर
और मस्तकपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करनेवाले पुरुषको तथा गोरे रंगकौ
स्त्रीको जन्म दिया ॥ २१॥ वह पुरुष रुद्र, शंकर, स्थाणु, कपदीं और त्रिलोचनके
नामसे प्रसिद्ध हुआ तथा स्त्रीके त्रयी, विद्या, कामधेनु, भाषा, अक्षरा और स्वरा-
ये नाम हुए॥ २२॥ राजन्! महासरस्वतीने गोरे रंगक स्त्री ओर श्याम रंगके
स्त्री उमा, गौरी, सती, चण्डी, सुन्दरी, सुभगा और शिवा- इन नामोंसे प्रसिद्ध
हुई ॥ २४॥ इस प्रकार तीनों युवतिर्या ही तत्काल पुरुषरूपको प्राप्त हुईं।
इस बातको ज्ञाननेत्रवाले लोग ही समझ सकते हैं। दूसरे अज्ञानीजन इस
रहस्यको नहीं जान सकते ॥ २५॥ राजन्! महालक्ष्मीने त्रयीविद्यारूपा सरस्वतीको
ब्रह्माके लिये पत्नीरूपमें समर्पित किया, रुद्रको वरदायिनी गौरी तथा भगवान्
वासुदेवको लक्ष्मी दे दी॥ २६॥ इस प्रकार सरस्वतीके साथ संयुक्त होकर
ब्रह्माजीने ब्रह्माण्डको उत्पन्न किया और परम पराक्रमी भगवान् रुद्रने गौरीके
साथ मिलकर उसका भेदन किया॥ २७॥ राजन्! उस ब्रह्माण्डमें प्रधान
(महत्तत्त्व) आदि कार्यसमूह-- पंचमहाभूतात्मक समस्त॒स्थावर-जंगमरूप
जगत्की उत्पत्ति हुई ॥ २८॥ फिर लक्ष्मीके साथ भगवान् विष्णुने उस जगत्का
पालन-पोषण किया ओर प्रलयकालमें गौरीके साथ महेश्वरने उस सम्पूर्ण
वे ही निराकार और साकाररूपमें रहकर नाना प्रकारके नाम धारण करती
हैं ॥ ३०॥ सगुणवाचक सत्य, ज्ञान, चित्, महामाया आदि नामान्तरोसे इन
महालक्ष्मीका निरूपण करना चाहिये । केवल एक नाम (महालक्ष्मीमात्र) -से
या प्राधानिक रहस्य कहते हे । इसके अनुसार महालक्ष्मी ही सब प्रपंच तथा सम्पूर्ण अवतारोंका
आदि कारण हैँ । तीनों गुणोंकी साम्यावस्थारूपा प्रकृति भी उनसे भिन नहीं हे । स्थूल- सूक्ष्म,
दृश्य-अदृश्य अथवा व्यक्त-अव्यक्त--सब उन्हींके स्वरूप हैं। वे सर्वत्र व्यापक हैँ । अस्ति,
भाति, प्रिय, नाम और रूप--सब वे ही हैँ । वे सच्विदानन्दमयी परमेश्वरी सूक्ष्मरूपसे सर्वत्र
व्याप्त होती हुई भी भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये परम दिव्य चिन्मय सगुणरूपसे भी सदा
विराजमान रहती हैं । उनके उस श्रीविग्रहकौ कान्ति तपाये हुए सुवर्णकौ भाँति है । वे अपने चार
हाथोमें मातुलुंग (बिजौरा), गदा, खेट (ढाल) ओर पानपात्र धारण करती हैं तथा मस्तकपर
नाग, लिंग और योनि धारण किये रहती हैं | भुवनेश्वरी- संहिताके अनुसार मातुलुंग कर्मराशिका,
गदा क्रियाशक्तिका, खेट ज्ञानशक्तिका और पानपात्र तुरीय वृत्ति (अपने सच्िदानन्दमय स्वरूपमें
स्थिति )-का सूचक है । इसी प्रकार नागसे कालका, योनिसे प्रकृतिका और लिंगसे पुरुषका
ग्रहण होता है। तात्पर्य यह कि प्रकृति, पुरुष ओर काल-- तीनोंका अधिष्ठान परमेश्वरी महालक्ष्मी
ही हैं। उक्त चतुर्भुजा महालक्ष्मीके किस हाथमे कौन-से आयुध हैं, इसमें भी मतभेद है ।