शिवजी बोले--
देवी! सुनो। मैं उत्तम कुंजिकास्तोत्रका उपदेश करूँगा, जिस मन्त्रके प्रभावसे
कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास यहाँतक कि अर्चन भी
केवल कुंजिकाके पाठसे दुर्गापाठका फल प्राप्त हो जाता है। (यह कुंजिका)
(मन्त्रम आये बीजोंका अर्थ जानना न सम्भव है, न आवश्यक और न
वांछनीय। केवल जप पर्याप्त है।)
हे रुद्रस्वरूपिणी! तुम्हें नमस्कार। हे मधु दैत्यको मारनेवाली! तुम्हें
नमस्कार है। कैटभविनाशिनीको नमस्कार। महिषासुरको मारनेवाली देवी!
नहीं देना चाहिये। हे पार्वती! इसे गुप्त रखो। हे देवी! जो बिना कुंजिकाके
सप्तशतीका पाठ करता है उसे उसी प्रकार सिद्धि नहीं मिलती जिस प्रकार
वनमें रोना निरर्थक होता है।
इस प्रकार श्रीरुद्रयायलके यौरीतन्त्रमें शिव-पार्वती-संवादमें
सिद्धकुंजिकास्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।
हो जाते हैं। इस कुंजिकास्तोत्र तथा देवीसूक्तके सहित सप्तशती पाठसे परम सिद्धि प्राप्त
होती है।। मारण--काम-क्रोधनाश, मोहन--इष्टदेव-मोहन, वशीकरण--मनका वशीकरण,
स्तम्भन--इन्द्रियोंकी विषयोंके प्रति उपरति और उच्चाटन--मोक्षप्राप्तिके लिये
छटपटाहट-- ये सभी इस स्तोत्रका इस उद्देश्यसे सेवन करनेसे सफल होते हैं।