ऋषि कहते हैं--राजन्! पहले जिन सत्त्वप्रधाना त्रिगुणमयी महालक्ष्मीके
तामसी आदि भेदसे तीन स्वरूप बतलाये गये, वे ही शर्वा, चण्डिका, दुर्गा,
भद्रा ओर भगवती आदि अनेक नामोँसे कही जाती हैँ ॥ १॥ तमोगुणमयी
महाकाली भगवान् विष्णुकी योगनिद्रा कही गयी हैँ । मधु ओर कैटभका नाश
हाथमे पानपात्र हे । चतुर्भुजा महालक्ष्मीने क्रमशः तमोगुण और सत्त्वगुणरूप उपाधिके द्वारा
अपने दो रूप ओर प्रकट किये, जिनकी क्रमशः महाकाली ओर महासरस्वतीके नामसे प्रसिद्धि
हुई। ये दोनों सप्तशतीके प्रथम चरित्र और उत्तर चरित्रमे वर्णित महाकाली ओर महासरस्वतीसे
भिन हैं; क्योकि ये दोनों ही चतुर्भुजा है ओर उक्त चरित्रोमें वर्णित महाकालीके दस तथा
महासरस्वतीके आठ भुजाएँ हैं। चतुर्भुजा महाकालीके हाथोमे खड्ग, पानपात्र, मस्तक और
ढाल हैं; इनका क्रम भी पूर्ववत् ही है। चतुर्भुजा सरस्वतीके हाथोंमें अक्षमाला, अंकुश, वीणा
और पुस्तक शोभा पाते हैँ । इनका भी पहले-जैसा ही क्रम है । फिर इन तीनों देवियोंने स्त्री-
पुरुषका एक-एक जोडा उत्पन्न किया। महाकालीसे शंकर और सरस्वती, महालक्ष्मीसे ब्रह्मा
और लक्ष्मी तथा महासरस्वतीसे विष्णु और गौरीका प्रादुर्भाव हुआ। इनमें लक्ष्मी विष्णुको, गौरी
शंकरको तथा सरस्वती ब्रह्माजीको प्राप्त हुई । पत्नीसहित ब्रह्माने सृष्टि, विष्णुने पालन और
उनके दस मुख, दस भुजाएँ और दस पैर हैं। वे काजलके समान काले
उनके दाँत और दाढ़ें चमकती रहती हैं। यद्यपि उनका रूप भयंकर है, तथापि
वे अपने हाथोमे खड्ग, बाण, गदा, शूल, चक्र, शंख, भुशुण्डि, परिघ, धनुष
जगत्को अपने उपासकके अधीन कर देती हैँ ॥ ६॥ सम्पूर्ण देवताओंके अंगोंसे
जिनका प्रादुर्भाव हुआ था, वे अनन्त कान्तिसे युक्त साक्षात् महालक्ष्मी है । उन्हें
उनका मुख गोरा, भुजाएँ श्याम, स्तनमण्डल अत्यन्त श्वेत, कटिभाग और चरण
लाल तथा जंघा ओर पिंडली नीले रंगकी हैँ । अजेय होनेके कारण उनको अपने
शोर्यका अभिमान है॥८॥ कटिके आगेका भाग बहुरंगे वस्त्रसे आच्छादित
होनेके कारण अत्यन्त सुन्दर एवं विचित्र दिखायी देता है । उनकी माला, वस्त्र,
आभूषण तथा अंगराग सभी विचित्र हैं। वे कान्ति, रूप और सौभाग्यसे
सुशोभित हैं॥९॥ यद्यपि उनकी हजारों भुजाएँ हैं, तथापि उन्हें अठारह
भुजाओंसे युक्त मानकर उनकी पूजा करनी चाहिये । अब उनके दाहिनी ओरके
निचले हाथोंसे लेकर बायीं ओरके निचले हाथोतकमें क्रमशः जो अस्त्र है,
उनका वर्णन किया जाता है ॥ १०॥ अक्षमाला, कमल, बाण, खड्ग, वज्र, गदा,
पानपात्र ओर कमण्डलु-- इन आयुधोसे उनकी भुजाएँ विभूषित हैँ । वे कमलके
आसनपर विराजमान हैं, सर्वदेवमयी हैं तथा सबकी ईश्वरी हँ । राजन्! जो
इन महालक्ष्मीदेवीका पूजन करता है, वह सब लोकों तथा देवताओंका भी
स्वामी होता है ॥ ११-- १३॥
जो एकमात्र सत्वगुणके आश्रित हो पार्वतीजीके शरीरसे प्रकट हुई थीं तथा
जिन्होंने शुम्भ नामक दैत्यका संहार किया था, वे साक्षात् सरस्वती कही
गयी हैँ ॥ १४॥ पृथ्वीपते! उनके आठ भुजाएँ हैं तथा वे अपने हाथोंमें क्रमश:
जब महालक्ष्मीकी पूजा करनी हो, तब उन्हें मध्यमे स्थापित करके उनके
दक्षिण और वामभागमें क्रमशः महाकाली और महासरस्वतीका पूजन करना
महालक्ष्मीके दीक पीछे मध्यभागमें सरस्वतीके साथ ब्रह्माका पूजन करे । उनके
दक्षिणभागमें गौरीके साथ रुद्रकी पूजा करे तथा वामभागमें लक्ष्मीसहित
विष्णुका पूजन करे। महालक्ष्मी आदि तीनों देवियोंके सामने निम्नांकित तीन
देवियोंको भी पूजा करनी चाहिये ॥ १९॥ मध्यस्थ महालक्ष्मीके आगे मध्यभागमें
अठारह भुजाओंवाली महालक्ष्मीका पूजन करे। उनके वामभागमें दस
मुखोवाली महाकालीका तथा दक्षिणभागमें आठ भुजाओंवाली महासरस्वतीका
पूजन करे ॥ २०॥ राजन्! जब केवल अठारह भुजाओंवाली महालक्ष्मीका अथवा
दशमुखी कालीका या अष्टभुजा सरस्वतीका पूजन करना हो, तब सब अरिष्टोंकी
शान्तिके लिये इनके दक्षिणभागमें कालकी ओर वामभागमें मृत्युकी भी भलीभाँति
पूजा करनी चाहिये। जब शुम्भासुरका संहार करनेवाली अष्टभुजादेवीकौ पूजा
करनी हो, तब उनके साथ उनकी नौ शक्तियोका और दक्षिणभागमें रुद्र एवं
वामभागमें गणेशजीका भी पूजन करना चाहिये (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी,
अर्ध्यादिभिरलङ्करर्गन्धपुष्पैस्तथाक्षतः
उनके तीन अवतारोंकौ पूजाके समय उनके चरित्रोंमें जो स्तोत्र और मन्त्र
आये हैं, उन्हींका उपयोग करना चाहिये। अठारह भुजाओंवाली महिषासुर-
मर्दिनी महालक्ष्मी ही विशेषरूपसे पूजनीय हैं; क्योकि वे ही महालक्ष्मी,
महाकाली तथा महासरस्वती कहलाती हैं। वे ही पुण्य-पापोंकी अधीश्वरी
तथा सम्पूर्णं लोकोंकौ महेश्वरी हँ ॥ २४-२५॥ जिसने महिषासुरका अन्त
करनेवाली महालक्ष्मीकी भक्तिपूर्वक आराधना की है, वही संसारका स्वामी
है । अतः जगतूको धारण करनेवाली भक्तवत्सला भगवती चण्डिकाकौ अवश्य
भी देवीका पूजन होता हे ।* (राजन्! बलि ओर मांस आदिसे की जानेवाली
पूजा ब्राह्मणको छोडकर बतायी गयी है । उनके लिये मांस और मदिरासे कहीं
भी पूजाका विधान नहीं है ।) प्रणाम, आचमनके योग्य जल, सुगन्धित चन्दन,
कपूर तथा ताम्बूल आदि सामग्रियोंको भक्तिभावसे निवेदन करके देवीकौ
पूजा करनी चाहिये। देवीके सामने बायें भागमें कटे मस्तकवाले महादैत्य
महिषासुरका पूजन करना चाहिये, जिसने भगवतीके साथ सायुज्य प्राप्त कर
लिया। इसी प्रकार देवीके सामने दक्षिण भागमें उनके वाहन सिंहका पूजन
करना चाहिये, जो सम्पूर्णं धर्मका प्रतीक एवं षड्विध एेश्वर्यसे युक्त है । उसीने
इस चराचर जगतूको धारण कर रखा है ।
तदनन्तर बुद्धिमान् पुरुष एकाग्रचित्त हो देवीकी स्तुति करे। फिर
हाथ जोड़कर तीनों पूर्वोक्त चरित्रोद्रारा भगवतीका स्तवन करे। यदि
कोई एक ही चरित्रसे स्तुति करना चाहे तो केवल मध्यम चरित्रके पाठसे
कर ले; किंतु प्रथम और उत्तर चरित्रोंमंसे एकका पाठ न करे। आधे
चरित्रका भी पाठ करना मना है। जो आधे चरित्रका पाठ करता है,
उसका पाठ सफल नहीं होता। पाठ-समाप्तिके बाद साधक प्रदक्षिणा और
जोड़े और उनसे बारंबार त्रुटियों या अपराधोंके लिये क्षमा-प्रार्थना करे।
सप्तशतीका प्रत्येक श्लोक मन्त्ररूप है, उससे तिल और घृत मिली हुई
खीरकी आहुति दे ॥ २७-- ३४॥ अथवा सप्तशतीमें जो स्तोत्र आये हैं, उन्हींके
मन्त्रोंसे चण्डिकाके लिये पवित्र हविष्यका हवन करे। होमके पश्चात्
एकाग्रचित्त हो महालक्ष्मीदेवीके नाम-मन्त्रोंकी उच्चारण करते हुए पुनः
उनकी पूजा करे॥ ३५॥ तत्पश्चात् मन और इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए
हाथ जोड़ विनीतभावसे देवीको प्रणाम करे और अन्तःकरणमें स्थापित
करके उन सर्वेश्वरी चण्डिकादेवीका देरतक चिन्तन करे। चिन्तन करते-करते
उन्हींमें तन्मय हो जाय॥ ३६॥ इस प्रकार जो मनुष्य प्रतिदिन भक्तिपूर्वक
परमेश्वरीका पूजन करता है, वह मनोवांछित भोगोंको भोगकर अन्तमें देवीका
जो भक्तवत्सला चण्डीका प्रतिदिन पूजन नहीं करता, भगवती परमेश्वरी
उसके पुण्योँको जलाकर भस्म कर देती दँ ॥ ३८ ॥ इसलिये राजन्! तुम
सर्वलोकमहेश्वरी चण्डिकाका शास्त्रोक्त विधिसे पूजन करो। उससे तुम्हें सुख
इसे वेकृतिक रहस्य कहते हे । इसमें पहले सप्तशतीके तीन चरितरोमे वर्णित महाकाली,
महालक्ष्मी तथा महासरस्वतीके ध्यानका वर्णन है; यहाँ महाकाली दशभुजा, महालक्ष्मी
अष्टादशभुजा तथा महासरस्वती अष्टभुजा हैँ । इनके आयुधोंका क्रम पहले बताये अनुसार
दाहिने भागके निचले हाथसे लेकर क्रमशः ऊपरवाले हाथमे, फिर वामभागके ऊपरवाले
हाथसे लेकर नीचेवाले हाथतक समझना चाहिये। जैसे महाकालीके दस हाथोंमें पाँच
दाहिने और पाँच बायें हें । दाहिनेवाले हाथोंमें क्रमशः नीचेसे ऊपरतक खड्ग, बाण, गदा,
शूल और चक्र हैं; तथा बायें हाथोमे ऊपरसे नीचेतक क्रमशः शंख, भुशुण्डि, परिघ, धनुष
ओर मस्तक हैँ । इसी तरह अष्टादशभुजा महालक्ष्मीके नौ दाहिने हाथोंमें नीचेकी ओरसे
क्रमशः अक्षमाला, कमल, बाण, खड्ग, वज्र, गदा, चक्र, त्रिशूल ओर परशु हैं तथा
नाये हाथोंमें ऊपरसे नीचेतक शंख, घण्टा, पाश, शक्ति, दण्ड, ढाल, धनुष, पानपात्र ओर
कमण्डलु हैँ । अष्टभुजा महासरस्वतीके भी चार दाहिने हाथमे पूर्वोक्त क्रमसे बाण, मुसल,
शूल और चक्र हैं तथा बायें हाथोमे शंख, घण्टा, हल और धनुष हैं। इन तीनोंके ध्यानके
विषयमे कही हुई अन्य सारी बातें स्पष्ट हैँ । तत्पश्चात् इन सबकी उपासनाका क्रम यों
नतलाया गया है--बीचमें चतुर्भुजा महालक्ष्मीको स्थापित करके उनके दक्षिण भागमें चतुर्भुजा
महाकाली तथा वामभागमें चतुर्भुजा महासरस्वतीकी स्थापना करे। महाकालीके पृष्ठभागमें
रुद्र-गौरी, महालक्ष्मीके पृष्ठभागमें ब्रह्मा- सरस्वती तथा महासरस्वतीके पृष्ठभागमें विष्णु
लक्ष्मीकौ पूजा करे । फिर चतुर्भुजा महालक्ष्मीके सामने मध्यभागे अष्टादशभुजाको स्थापित
करे। इनका मुख चतुर्भुजा महालक्ष्मीको ओर होगा। अष्टादशभुजाके दक्षिणभागमें अष्टभुजा
महासरस्वती और वामभागमें दशानना महाकाली रहेंगी । यदि केवल अष्टादशभुजा या दशानना
अथवा अष्टभुजाका पूजन करना हो तो इनमेसे किसी एक अभीष्ट देवीको स्थापित करके
उनके दक्षिणभागे काल और वामभागमें मृत्युको स्थापना करनी चाहिये। अष्टभुजाकी
पूजामें कुछ विशेषता है। यदि केवल अष्टभुजाकौ पूजा करनी हो तो उनके साथ उनकी
ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, नारसिंही, एन्द्री, शिवदूती और चामुण्डा- इन
नौ शक्तियोंकी भी पूजा करनी चाहिये। साथ ही दाहिने भागम रुद्र ओर वामभागमें विनायकका
पूजन भी आवश्यक हे । काल और मृत्युकी पूजा भी, जो पहले बतायी गयी है,होनी चाहिये।
कुछ लोग शैलपुत्री आदि नवदुर्गाओंको नौ शक्तियोंमें ग्रहण करते है, किन्तु यह ठीक
नहीं है; क्योकि उन्हें अष्टभुजाकौ शक्तिरूपसे कहीं नहीं बताया गया है । ये ब्राह्मी आदि
शक्तियाँ ही महासरस्वतीके अंगसे प्रकट हुई थीं; अतः ये ही उनकी नौ शक्तियाँ हैं।
अष्टादशभुजादेवीके सामने दक्षिणभागमें सिंह ओर वामभागमें महिषकौ पूजा करे। कुछ
लोगोंका कथन है कि जब अष्टादशभुजादेवीकी पूजा करनी हो, तब उनके दक्षिणभागमें
दशानना और वामभागमें अष्टभुजाकौ भी पूजा करे। जब केवल दशाननाकौ पूजा करनी
हो, तब उनके साथ दक्षिणभागमें कालकौ ओर वामभागे मृत्युकी पूजा करे तथा जब
केवल अष्टभुजाकी पूजा करनी हो, तब उनके साथ पूर्वोक्त नौ शक्तियों ओर रुद्र-विनायककौ
भी पूजा करनी चाहिये। यह क्रम-विभाग देखनेमे सुन्दर होनेपर भी मूलपाठके प्रतिकूल
हे। कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि अष्टादशभुजा आदिमेंसे जिसकी प्रधानतासे पूजा करनी
हो, उसे मध्यमे स्थापित करके दाहिने और वामभागमें शेष दो देवियोंकी स्थापना करे
ओर मध्यमे स्थित देवीके दक्षिण-वाम-पा्वोमिं रुद्र-विनायकको स्थापित करके सबका
पूजन करे। यह बात भी मूलसे सिद्ध नहीं होती । कोई-कोई अष्टभुजाके पूजनमें विकल्प
मानते हें । उनका कहना है कि अष्टभुजाके साथ या तो काल एवं मृत्युकौ ही पूजा करे