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ऑकलैंड · श्री जगन्नाथ (कृष्ण)
रथ यात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को उड़ीसा के पुरी में विश्व की सबसे भव्य रथ शोभायात्राओं में से एक है। इस दिन भगवान जगन्नाथ (जगत के स्वामी — भगवान विष्णु/कृष्ण का रूप), उनके बड़े भ्राता बलभद्र और बहन सुभद्रा तीन विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं।
गुंडिचा मंदिर को मासी माँ का घर (मौसी का घर) कहते हैं। यह यात्रा भगवान जगन्नाथ की वार्षिक मौसी के घर की भेंट का प्रतीक है। नौ दिन वहाँ विश्राम के बाद उल्टा रथ यात्रा (वापसी यात्रा) होती है। यह पर्व यह भी संदेश देता है कि भगवान मंदिर की सीमाओं से निकलकर सभी भक्तों के पास आते हैं।
नंदीघोष (जगन्नाथजी का रथ) — 45 फीट ऊँचा, 16 पहिए। तालध्वज (बलभद्र का रथ) — 44 फीट। दर्पदलन/पद्मध्वज (सुभद्रा का रथ) — 43 फीट। लाखों भक्त रथ की रस्सी खींचते हैं — इसे परम पुण्य माना जाता है।
स्कंद पुराण के अनुसार रथ यात्रा में दर्शन और रथ-रस्सी खींचने से सौ यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। पुरी में जाति-भेद निषिद्ध है — सभी वर्गों के लोग एक साथ प्रसाद पाते हैं और रथ खींचते हैं। यह हिंदू धर्म की समतावादी भावना का सुंदर उदाहरण है।
भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों को तीन विशाल रथों पर बैठाकर जगन्नाथ मंदिर से गुंडीचा मंदिर तक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। लाखों भक्त रथ की रस्सी खींचने में भाग लेते हैं। पुरी में यह विश्व प्रसिद्ध उत्सव है।
नौवें दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की वापसी यात्रा गुंडीचा मंदिर से जगन्नाथ मंदिर तक होती है। इसे बहुदा यात्रा कहते हैं। लौटते समय रथ मौसी माँ मंदिर (अर्धसरनी) में रुकता है जहाँ भगवान को पोड़ पीठा (विशेष पकवान) का भोग लगाया जाता है।
⏱ समय ऑकलैंड के अनुसार · तिथि व नक्षत्र सम्पूर्ण भारत में समान
⏰ समय ऑकलैंड के स्थानीय समयानुसार (Pacific/Auckland)
रथ यात्रा भगवान जगन्नाथ (श्रीकृष्ण), बलराम और सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा है। यह ओडिशा के पुरी में भव्य रूप से मनाई जाती है। भगवान जगन्नाथ का रथ खींचना मोक्षदायक माना जाता है। यह महोत्सव आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को होता है।