स्वामी विवेकानंद के बारे में
स्वामी विवेकानंद (1863–1902) श्री रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे, जिन्होंने 1893 में शिकागो की विश्व धर्म महासभा में वेदांत का संदेश दुनिया तक पहुँचाया। उनका जन्मदिन, 12 जनवरी, राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनके विचार बार-बार शक्ति, निर्भयता और सेवा की ओर लौटते हैं।
1. उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।
मूल:उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। — कठोपनिषद् 1.3.14
2. खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है।
3. ब्रह्मांड की सारी शक्तियाँ पहले से हमारी हैं। वो हम ही हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है।
4. जो तुम सोचते हो, वो तुम बन जाते हो। यदि तुम खुद को कमजोर सोचते हो, तुम कमजोर बनते हो; यदि खुद को शक्तिशाली, तुम शक्तिशाली बन जाते हो।
5. जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते।
6. एक विचार लो। उस विचार को अपनी जिंदगी बना लो — उसके बारे में सोचो, उसके सपने देखो, उस विचार पर जियो।
7. किसी की निंदा न करो। अगर तुम सच में मदद करना चाहते हो तो मदद करो। यदि नहीं कर सकते, तो हाथ जोड़ो और उन्हें उनके रास्ते पर जाने दो।
8. एक समय में एक काम करो, और ऐसा करते समय अपनी पूरी आत्मा उसमें डाल दो, बाकी सब कुछ भूल जाओ।
9. हर आत्मा संभावित रूप से दिव्य है। लक्ष्य है इस दिव्यता को अंदर और बाहर से प्रकट करना।
10. सेवा ही पूजा है। शुद्धतम पूजा वह है जिसमें हम मनुष्यों में ईश्वर की सेवा करते हैं।
11. जो अग्नि हमें गर्मी देती है, वो हमें नष्ट भी कर सकती है। यह अग्नि का दोष नहीं — यह हमारे उपयोग का प्रश्न है।
12. सच्ची सफलता का सबसे बड़ा रहस्य यह है — वह व्यक्ति जो बदले में कुछ नहीं माँगता, पूर्णतः निःस्वार्थ व्यक्ति, सबसे सफल है।
13. सबसे बड़ा धर्म है — अपनी प्रकृति के प्रति सच्चे रहना। स्वयं पर विश्वास रखो।
14. जब तक जीना, तब तक सीखना। अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।
15. दिल और दिमाग के टकराव में, दिल की सुनो।
यहाँ केवल वही विचार दिए गए हैं जिनका स्रोत स्वामी विवेकानंद तक पहुँचता है। उनके नाम से प्रचलित कई उद्धरण किसी और के हैं — वे जानबूझकर शामिल नहीं किए गए।