ॐ
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कबीर कहते हैं कि चलती हुई चक्की को देखकर वे रो पड़े, क्योंकि उसके दो पाटों के बीच कोई दाना साबुत नहीं बचता। इसी प्रकार संसार रूपी चक्की (काल और माया) के बीच कोई जीव नहीं बचता। (संत यह भी कहते हैं कि जो कील रूपी सच्चे आश्रय—प्रभु—से चिपका रहे, वही बचता है।) यह दोहा संसार की नश्वरता का गहन बोध कराता है।