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कबीर कहते हैं कि सत्य के समान कोई तप नहीं और झूठ के समान कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सत्य का वास है, उसी के हृदय में स्वयं ईश्वर निवास करते हैं। यह दोहा सत्य को सर्वोच्च तप और ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग बताता है।