ॐ
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कबीर कहते हैं कि घर में रहकर भी सच्चे भाव से प्रभु को भजे वही असली भक्त है, जबकि केवल बाहर साधु का वेश धारण कर लेना दिखावा मात्र है। यदि मन माया के पीछे भागता रहे तो वेश बदलने से कोई साधु नहीं बन जाता। यह दोहा बाहरी वेश से अधिक मन की वृत्ति को महत्व देता है।