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कबीर कहते हैं कि बचपन हँसी-खेल में बीत गया और जवानी आलस्य व प्रमाद की नींद में चली गई। अब बुढ़ापे को आता देख मनुष्य खड़ा होकर पछताता है (कि भक्ति का समय गँवा दिया)। यह दोहा जीवन के हर चरण में समय के सदुपयोग की सीख देता है।