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11 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
"काल करे सो आज कर" — कबीर के समय पर दोहे हमें समय के मूल्य और सदुपयोग की प्रेरणा देते हैं। ये दोहे आलस्य त्यागकर आज और अभी कर्म करने का संदेश देते हैं। नीचे समय पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित दिए गए हैं।
कबीर समझाते हैं कि हे मन! धैर्य रखो, संसार में हर काम अपने उचित समय पर ही होता है। जैसे माली चाहे सौ घड़े पानी से पेड़ को सींच ले, फल तो ऋतु आने पर ही लगते हैं। इसलिए जल्दबाज़ी छोड़कर धैर्य और निरंतर प्रयास में विश्वास रखना चाहिए।
कबीर कहते हैं कि कल का काम आज कर लो और आज का काम अभी कर लो, क्योंकि पल भर में प्रलय (मृत्यु या विनाश) आ सकती है। यदि समय रहते काम न किया तो फिर कब करोगे? यह दोहा हमें आलस्य त्यागकर समय का सदुपयोग करने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि यदि लूट सकते हो तो राम-नाम के सुमिरन रूपी धन को लूट लो, अर्थात भरपूर भक्ति कर लो। नहीं तो बाद में पछताओगे जब प्राण शरीर छोड़कर चले जाएँगे। यह दोहा जीवित रहते ही प्रभु-भक्ति में लीन होने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि रखवाले के बिना चिड़ियों ने खेत चुग लिया; अब आधा-अधूरा ही बचा है। हे मनुष्य! जितना अभी बचा है, उसी में सचेत होकर सँभल जा। यह दोहा जीवन रूपी अवसर के नष्ट होने से पहले सजग होने की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि ज्ञान रूपी रत्न को सँभालकर रखो, क्योंकि यह संसार तो मिट्टी के समान नश्वर है। हाय! यह दुर्लभ मानव जन्म व्यर्थ ही बीता जा रहा है। यह दोहा अमूल्य मानव जीवन में ज्ञान-अर्जन का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि राम-नाम के स्मरण रूपी अमूल्य धन को जितना लूट सको, लूट लो (भरपूर भक्ति कर लो)। नहीं तो अंत समय में पछताओगे, जब प्राण शरीर छोड़कर चले जाएँगे। यह दोहा जीवित रहते ही प्रभु-भक्ति की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य ने रातें सोने में और दिन खाने-पीने में गँवा दिए। यह मानव जन्म तो हीरे के समान अनमोल था, पर वह उसे कौड़ी के मोल व्यर्थ गँवा रहा है। यह दोहा दुर्लभ मानव जीवन को व्यर्थ न करने की चेतावनी देता है।
कबीर कहते हैं कि जो भी उत्पन्न होता है वह नष्ट होता ही है—वृक्ष, फूल, फल और पत्ते सभी। रात-दिन काल निरंतर आगे बढ़ता रहता है (और सबको अपने साथ ले जाता है)—इस सत्य को भली-भाँति समझ लो। यह दोहा संसार की अनित्यता का बोध कराता है।
कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! जीवन के ये थोड़े-से दिन रूपी नौबत (बाजे) को बजा ले, अर्थात इस अल्प जीवन का सदुपयोग कर ले। यह नगर, यह बस्ती और यह गली—इन्हें फिर लौटकर देखने को नहीं मिलेंगे। यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और समय के सदुपयोग की प्रेरणा देता है।
कबीर कहते हैं कि बचपन हँसी-खेल में बीत गया और जवानी आलस्य व प्रमाद की नींद में चली गई। अब बुढ़ापे को आता देख मनुष्य खड़ा होकर पछताता है (कि भक्ति का समय गँवा दिया)। यह दोहा जीवन के हर चरण में समय के सदुपयोग की सीख देता है।
कबीर कहते हैं कि पल भर में प्रलय (मृत्यु) आ सकती है, फिर तू अपना काम कब करेगा? इसलिए कल का काम आज और आज का काम अभी कर ले। यह दोहा आलस्य त्यागकर तुरंत सत्कर्म और भक्ति में लग जाने की प्रेरणा देता है।