ॐ
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कबीर कहते हैं कि हे मनुष्य! जीवन के ये थोड़े-से दिन रूपी नौबत (बाजे) को बजा ले, अर्थात इस अल्प जीवन का सदुपयोग कर ले। यह नगर, यह बस्ती और यह गली—इन्हें फिर लौटकर देखने को नहीं मिलेंगे। यह दोहा जीवन की क्षणभंगुरता और समय के सदुपयोग की प्रेरणा देता है।