दीपावली से कुछ दिन पहले की बात है। एक महिला मिट्टी लेने जंगल गई। वह दीपावली के लिए घर की लिपाई-पुताई करना चाहती थी। जंगल में खुदाई करते समय उसकी कुदाल से एक साही (कंटीला जानवर) का बच्चा अनजाने में मारा गया। महिला को बहुत दुख हुआ, परन्तु वह वापस आ गई।
उस वर्ष के भीतर उसके सातों पुत्र एक-एक करके मर गए। महिला शोक से विह्वल हो गई। उसे लगा यह उस साही के बच्चे की हत्या का फल है।
उसने गांव की स्त्रियों को अपनी गलती बताई और प्रायश्चित करने का निश्चय किया। उन्होंने उसे अहोई अष्टमी का व्रत बताया — कार्तिक कृष्ण अष्टमी को, दीपावली से आठ दिन पहले।
महिला ने विधिपूर्वक व्रत किया। दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाया — साही और उसके बच्चों के साथ। संध्याकाल में तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोला। उसे दृष्टि में अहोई माता के दर्शन हुए। माता ने कहा, "तुमने सच्चे मन से प्रायश्चित किया। तुम्हारे सात पुत्र वापस आएंगे।"
उसी रात एक-एक करके उसके सातों पुत्र जीवित हो उठे। परिवार में आनंद छा गया।
अहोई अष्टमी का व्रत माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु और कल्याण के लिए करती हैं। जो भी इस व्रत को श्रद्धा से करती हैं, अहोई माता उनके पुत्रों की रक्षा करती हैं। जय अहोई माता!