अध्याय 1 — दुर्गा द्वारा महिषासुर वध
त्रेतायुग में महिषासुर नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। उसने ब्रह्माजी की घोर तपस्या करके वर मांगा कि कोई भी पुरुष उसे न मार सके। इस वर के मद में चूर होकर उसने स्वर्गलोक पर आक्रमण किया। देवराज इंद्र की सेना को परास्त करके उसने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया। सभी देवता स्वर्ग से भागकर पृथ्वी पर आ गए।
देवताओं ने ब्रह्माजी, भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास जाकर सहायता की गुहार लगाई। महिषासुर के अत्याचारों से तीनों लोक त्राहिमाम कर रहे थे। तब तीनों देवों के तेज से, तथा सभी देवताओं की शक्तियों के संयोजन से एक अद्भुत दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ। उस प्रकाश से देवी दुर्गा का प्रादुर्भाव हुआ।
देवी दुर्गा को सभी देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। भगवान शिव ने त्रिशूल दिया, विष्णु ने सुदर्शन चक्र, इंद्र ने वज्र और सिंह को उनका वाहन बनाया।
देवी दुर्गा और महिषासुर के बीच नौ दिन और नौ रात भयंकर युद्ध हुआ। महिषासुर की सेना एक-एक कर परास्त होती गई। दसवें दिन — जिसे हम विजयादशमी कहते हैं — माता दुर्गा ने महिषासुर का वध किया। समस्त देवताओं ने माता की जय-जयकार की। स्वर्ग पुनः देवताओं को मिला।
तब से नौ दिन नवरात्रि के रूप में मनाए जाते हैं और दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव होता है। जो इन नौ दिनों में माता का व्रत करता है, उसे माता की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जय माता दी!
अध्याय 2 — नव दुर्गा — माँ के नौ स्वरूप
नवरात्रि के नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ दिव्य स्वरूपों की आराधना की जाती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। प्रत्येक स्वरूप की अपनी विशेष शक्ति है और प्रत्येक दिन विशेष रंग, फूल और भोग का विधान है।
प्रथम दिन — माँ शैलपुत्री: पर्वतराज हिमालय की पुत्री, पार्वती का प्रथम रूप। वृषभ (नंदी) पर सवार, दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं में कमल। सफेद रंग प्रिय। यह मूलाधार चक्र की अधिष्ठात्री हैं। इनकी उपासना से शक्ति और स्थिरता मिलती है।
द्वितीय दिन — माँ ब्रह्मचारिणी: तप की देवी। पैदल चलती हैं, श्वेत वस्त्र, दाएं हाथ में जपमाला और बाएं में कमंडल। सहस्र वर्षों की कठोर तपस्या से शिव को पति रूप में प्राप्त किया। लाल रंग प्रिय। तप, त्याग और वैराग्य की शक्ति प्रदान करती हैं।
तृतीय दिन — माँ चंद्रघंटा: मस्तक पर अर्धचंद्र घंटे के आकार में। सिंह पर सवार, दस भुजाएं — सात हाथों में अस्त्र-शस्त्र, दो में कमल और वरद-अभय मुद्रा। स्वर्णिम आभा। राजसिक शक्ति और साहस की प्रतीक। घंटे की ध्वनि से असुर भागते हैं।
चतुर्थ दिन — माँ कूष्मांडा: अपनी दिव्य हँसी से ब्रह्मांड को उत्पन्न करने वाली — इसीलिए "कू ष्म अंडा" अर्थात् ब्रह्मांड में स्मित-रूपी माँ। सूर्यमंडल में निवास। आठ भुजाओं में अमृत-कलश, कमल, धनुष-बाण, चक्र, गदा, जपमाला। नारंगी रंग प्रिय।
पंचम दिन — माँ स्कंदमाता: भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता। गोद में बाल-स्कंद को लिए सिंह पर विराजती हैं। श्वेत वर्ण, चार भुजाएं। मातृत्व और ममता की प्रतीक। हिमालय पर कमल-पुष्पों के बीच विराजती हैं।
षष्ठ दिन — माँ कात्यायनी: महर्षि कात्यायन के यज्ञ से प्रकट, महिषासुर-संहारिणी। सिंह-वाहना, चार भुजाएं। लाल वस्त्र। वैवाहिक बाधाएं दूर करती हैं। व्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा करके कृष्ण को पति रूप में प्राप्त किया था।
सप्तम दिन — माँ कालरात्रि: काले वर्ण, रौद्र रूप। बिखरे बाल, तीन नेत्र, अग्नि-श्वास। गर्दभ (गधे) पर सवार। बाएं हाथ में वज्र और खड्ग, दाएं हाथ में अभय और वरद मुद्रा। अंधकार, पाप और अज्ञान का नाश। नाम स्मरण मात्र से भय दूर होता है।
अष्टम दिन — माँ महागौरी: सौम्य, शुद्ध-श्वेत वर्ण। वृषभ पर सवार। सफेद वस्त्र, सफेद आभूषण। पार्वती ने घोर तपस्या से यह गौर वर्ण प्राप्त किया। सभी पापों का नाश, भक्तों को शुद्धि और पवित्रता प्रदान करती हैं।
नवम दिन — माँ सिद्धिदात्री: सर्वसिद्धि की दात्री। कमल पर विराजती हैं। चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और कमल। भगवान शिव को भी इन्हीं से अणिमा, महिमा, गरिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ प्राप्त हुईं। इनकी उपासना से साधक को नौ प्रकार की सिद्धियाँ और नव निधियाँ प्राप्त होती हैं।
नवरात्रि में नौ दिन माँ के इन नौ रूपों की भक्तिपूर्वक आराधना से भक्त को बल, बुद्धि, यश, धन, स्वास्थ्य और अंत में मोक्ष प्राप्त होता है। जय माँ शैलपुत्री! जय माँ दुर्गा! जय माँ नवदुर्गा!