एक नगर में राजा चंद्रसेन भगवान शिव के परम भक्त थे। वे प्रतिदिन अपने महल में एक शिव लिंग की पूजा करते थे। एक दिन एक गरीब महिला का छोटा पुत्र राजमहल के पास खेलते हुए राजा को शिव पूजा करते देख रहा था। बालक के मन में भी भक्ति जागी।
वह घर गया और एक पत्थर उठाकर उसे गणेशजी की मूर्ति मानकर पूजने लगा। चतुर्थी की शाम को, जब चंद्रमा उगने का समय था, बालक पूजा में लीन हो गया। उसने मिट्टी से दीपक बनाया, घास के फूल चढ़ाए और सच्चे मन से गणेशजी की स्तुति की।
बालक की माता ने उसे खाने के लिए बुलाया। बालक ने कहा, "माँ, जब तक चंद्रमा नहीं उगता और गणेशजी को अर्घ्य नहीं देता, मैं नहीं उठूंगा।" माता ने बहुत समझाया, यहां तक कि डांटा भी, परन्तु बालक टस से मस नहीं हुआ।
मध्यरात्रि को अचानक आकाश में रथों की गड़गड़ाहट सुनाई दी। राजा के शत्रु, जो नगर पर आक्रमण करने आए थे, रहस्यमय रूप से भाग गए। राजा के दरबार में खबर पहुंची। राजा खुद उस स्थान पर आए जहां बालक पूजा कर रहा था।
गणेशजी की कृपा से उस पत्थर से दिव्य प्रकाश निकल रहा था। बालक को दिव्य वस्त्र, आभूषण और आशीर्वाद प्राप्त हुए। राजा ने उसे अपने पास रख लिया। संकष्टी चतुर्थी पर गणेशजी निर्मल हृदय की भक्ति से प्रसन्न होते हैं। जय गणेश!