एक बार भगवान शिव ने माता पार्वती को यह रहस्य बताया कि शिवरात्रि व्रत की महिमा क्या है। उन्होंने कहा, "देवी, एक बहुत पुरानी कथा है।"
गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी था। वह अत्यंत क्रूर था और पशुओं का शिकार करके जीवन यापन करता था। एक बार वह शिकार की खोज में जंगल में दूर तक चला गया। महाशिवरात्रि का दिन था, परन्तु उसे इसका कोई ज्ञान नहीं था।
दिन भर कुछ नहीं मिला। रात हो गई। शिकारी भूखा-प्यासा एक बिल्व (बेल) वृक्ष पर चढ़ गया और वहीं बैठ गया। उस वृक्ष के नीचे एक शिव लिंग था जो बिल्व के पत्तों से ढका हुआ था। शिकारी को पता नहीं था।
रात को जब पशु आते थे तो शिकारी उन्हें भगाने के लिए बिल्व की पत्तियां तोड़कर फेंकता था। वे पत्तियां शिव लिंग पर गिरती रहीं। इस प्रकार अनजाने में ही शिवरात्रि की पूरी रात उसने शिव लिंग पर बेलपत्र चढ़ाए, भूखे-प्यासे रहे यानी व्रत किया, और रात्रि जागरण किया।
प्रातःकाल शिकारी की मृत्यु हुई। यमदूतों के बजाय शिवजी के गण आए। शिकारी को सीधे शिवलोक ले जाया गया।
पार्वती ने पूछा, "प्रभु, वह तो पापी था!" शिव बोले, "देवी, शिवरात्रि की रात बेलपत्र अर्पण, उपवास और जागरण — चाहे जानकर हो या अनजाने में — मुक्ति देता है। जो सचेतन मन से यह व्रत करता है, उसकी तो जन्म-जन्मांतर से मुक्ति हो जाती है।" जय शिव शंकर!