एक ब्राह्मण का छोटा पुत्र था जिसके पिता का देहांत हो गया था। बालक निराश्रित और अनाथ हो गया। वह वन की ओर चला गया और एक दिन एक वन-निवासी गरीब महिला के घर पहुंचा। उस महिला ने उसे आश्रय दिया।
वह महिला प्रत्येक मास की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत करती थी। प्रदोष का अर्थ है — चंद्र पक्ष की तेरहवीं तिथि की संध्या। इस समय भगवान शिव और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर विश्राम करते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं।
महिला ने बालक को बताया कि इस दिन संध्याकाल में शिवजी की पूजा करनी चाहिए, दीप जलाना चाहिए, बेलपत्र, फूल और जल चढ़ाना चाहिए। बालक ने श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत करना शुरू किया।
एक प्रदोष के दिन संध्याकाल में भगवान शिव और माता पार्वती अपने नंदी पर सवार होकर उस वन से गुजर रहे थे। उन्होंने उस बालक को एकाग्रता से पूजा करते देखा। शिवजी अत्यंत प्रसन्न हुए।
शिवजी ने बालक को आशीर्वाद दिया, "वत्स, तुम एक धर्मनिष्ठ राजा के पुत्र को मिलोगे जिसका राज्य छिन गया है। तुम उसका मार्गदर्शन करोगे और उसे राज्य वापस दिलाओगे।" बालक ने यह कार्य सफलतापूर्वक पूरा किया।
प्रदोष व्रत करने से दीर्घायु, स्वास्थ्य, पुत्र-प्राप्ति और समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। जय शिव शंकर!