सत्यवती का विवाह बीरजू से हुआ था। ससुराल में उसकी जेठानियां उसे बहुत तंग करती थीं, काम करवाती थीं और जलाती थीं। एक दिन बीरजू को काम के लिए दूर परदेस जाना पड़ा। सत्यवती और भी अकेली हो गई।
एक बुजुर्ग स्त्री ने सत्यवती को संतोषी माता के व्रत के बारे में बताया। सत्यवती ने श्रद्धा से सोलह शुक्रवार व्रत करने का संकल्प लिया। व्रत के नियम थे — गुड़-चने का प्रसाद, किसी भी खट्टी चीज का सेवन नहीं।
पहले व्रत से ही माता की कृपा दिखने लगी। जेठानियों का व्यवहार कुछ नरम हुआ। बीरजू को परदेस में अच्छा काम मिला।
एक बार व्रत के दौरान एक गरीब बच्चे ने सत्यवती के भोजन में से इमली (खट्टी) खा ली। व्रत टूट गया। सत्यवती को फिर से शुरू करना पड़ा। जेठानियां खुश हुईं।
सत्यवती ने हार नहीं मानी और फिर से सोलह शुक्रवार करने लगी। इस बार उसने और भी सावधानी रखी। जब सोलहवां शुक्रवार पूरा हुआ और उद्यापन का समय आया, तो बीरजू बहुत धन कमाकर घर लौट आया।
जेठानियों ने ईर्ष्यावश सत्यवती को खट्टा खाने पर मजबूर करने की कोशिश की, परन्तु सत्यवती ने मना कर दिया। संतोषी माता ने उसे पुत्र और सुख का आशीर्वाद दिया। जेठानियों को पश्चाताप हुआ।
जो भी सच्चे मन से, बिना खट्टा खाए, संतोषी माता का व्रत पूर्ण करता है, माता उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। जय संतोषी माता!