अध्याय 1 — राजा जीमूतवाहन का बलिदान (मुख्य कथा)
जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया या जिउतिया भी कहते हैं, आश्विन कृष्ण अष्टमी को माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु और कुशलता के लिए निर्जला रखती हैं। इस व्रत में दो कथाएँ सुनी जाती हैं — राजा जीमूतवाहन की कथा और चील-सियारिन की कथा। पहली कथा भविष्य पुराण और स्कन्द पुराण में आती है।
विद्याधरों के राजकुमार जीमूतवाहन बड़े दयालु और परोपकारी थे। राज-पाट में उनका मन नहीं लगता था, इसलिए राज्य का भार भाइयों को सौंपकर वे पिता की सेवा के लिए वन में रहने लगे। एक दिन वे अपने साले मित्रावसु के साथ समुद्र-तट के वनों में घूम रहे थे। तभी उन्होंने एक घबराए हुए युवक को आते देखा, जिसके पीछे एक बूढ़ी स्त्री "हाय मेरा बेटा, हाय मेरा बेटा" कहकर रो रही थी। एक सैनिक जैसा पुरुष उस युवक को एक ऊँची चट्टान के पास छोड़कर चला गया।
जीमूतवाहन ने युवक से पूछा — "तुम कौन हो, और तुम्हारी माँ तुम्हारे लिए क्यों विलाप कर रही है?" युवक बोला — "मेरा नाम शंखचूड़ है, मैं नाग हूँ। पक्षीराज गरुड़ नागों को खाते थे, जिससे पूरा नागलोक भय से व्याकुल था। तब नागराज वासुकि ने गरुड़ से यह नियम बाँध लिया कि हर दिन एक नाग समुद्र-तट के इस पर्वत पर उनके भोजन के लिए भेजा जाएगा। आज मेरी बारी है। इसी वध्य-शिला पर गरुड़ मुझे खाने आएँगे, इसलिए मेरी माँ रो रही है।" (गरुड़ नागों को क्यों खाते थे, यह पूर्वकथा अगले अध्याय में है।)
शंखचूड़ का दुःख सुनकर जीमूतवाहन का हृदय करुणा से भर गया। वे बोले — "जो राजा अपनी ही प्रजा को शत्रु का भोजन बना दे, उसका राज कैसा? आज मैं अपना शरीर देकर तुम्हारी रक्षा करूँगा। तुम शोक मत करो।" शंखचूड़ ने धैर्य से मना किया — "हे महात्मा, ऐसा मत कहिए। काँच के लिए मोती खोना ठीक नहीं। मैं अपने कुल का कलंक नहीं बनना चाहता।" यह कहकर वह गरुड़ के आने से पहले समुद्र-तट पर विराजमान गोकर्ण शिव को अंतिम प्रणाम करने चला गया।
यही अवसर था। जीमूतवाहन ने किसी काम के बहाने मित्रावसु को वहाँ से भेज दिया और लाल वस्त्र ओढ़कर स्वयं वध्य-शिला पर लेट गए। कुछ ही देर में गरुड़ आ पहुँचे। उनके पंखों की हवा से धरती काँप उठी और उनके विशाल पंखों की छाया से आकाश ढक गया। गरुड़ ने जीमूतवाहन को चोंच में उठाया और पर्वत की चोटी पर ले जाकर खाने लगे। उसी समय आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, जिसे देखकर गरुड़ भी चकित रह गए।
उधर शंखचूड़ शिव को प्रणाम करके लौटा तो वध्य-शिला को रक्त से भीगा पाया। वह समझ गया कि उस महात्मा ने उसके लिए प्राण दे दिए हैं, और रक्त की धारा के पीछे-पीछे उन्हें खोजने चल पड़ा।
इधर गरुड़ ने देखा कि जिसे वे खा रहे हैं, वह न रोता है, न छटपटाता है, बल्कि प्रसन्न है। वे रुक गए। जीमूतवाहन बोले — "हे पक्षीराज, मेरे शरीर में अभी मांस और रक्त बाकी है। आप तृप्त हुए बिना क्यों रुक गए? जो काम शुरू किया है, उसे पूरा कीजिए।" गरुड़ ने पूछा — "तुम नाग नहीं हो। बताओ, तुम कौन हो?" तभी दूर से शंखचूड़ चिल्लाया — "हे गरुड़, इन्हें मत खाइए! ये नाग नहीं हैं, आपका भोजन मैं हूँ!"
जब गरुड़ को पता चला कि उन्होंने भूल से विद्याधरों के राजा को खाया है, जो दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राण दे रहे थे, तो वे पश्चाताप से भर गए और अग्नि में जलकर प्राण त्यागने का विचार करने लगे। तब जीमूतवाहन ने कहा — "हे पक्षीराज, दुःखी मत होइए। यदि सचमुच पाप से डरते हैं, तो आज से नागों को खाना छोड़ दीजिए, और जिन्हें अब तक खा चुके हैं, उनके लिए पश्चाताप कीजिए। यही सच्चा प्रायश्चित है।"
गरुड़ ने इस वचन को गुरु की आज्ञा के समान माना और मरे हुए नागों को जीवित करने के लिए अमृत लेने चले गए। उधर जीमूतवाहन की पत्नी मलयवती की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं माता गौरी ने उनके घायल शरीर पर अमृत छिड़का। जीमूतवाहन पहले से भी अधिक सुंदर और स्वस्थ होकर उठ खड़े हुए, और देवता गाने-बजाने लगे। गरुड़ ने पूरे समुद्र-तट पर अमृत बरसाया, जिससे वहाँ बिखरे सभी नागों के कंकाल फिर से जीवित हो उठे। नागों को सदा के लिए गरुड़ के भय से मुक्ति मिल गई।
शंखचूड़ अपनी माँ के पास रसातल लौट गया — एक माँ का बेटा जीवित लौट आया। जीमूतवाहन के जो संबंधी पहले उनके विरोधी थे, वे भी माता पार्वती की कृपा से आकर उन्हें प्रणाम करने लगे। उनके आग्रह पर जीमूतवाहन पत्नी मलयवती और मित्र मित्रावसु के साथ हिमालय पर अपनी पुरानी राजधानी लौटे और बहुत समय तक विद्याधरों के चक्रवर्ती राजा बनकर राज किया।
मान्यता है कि तभी से माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु और रक्षा के लिए जितिया व्रत रखती हैं और इस दिन जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। जो माता श्रद्धा से यह व्रत करती है, जीमूतवाहन की कृपा से उसकी संतान सुखी और दीर्घायु होती है।
अध्याय 2 — गरुड़ और नागों की पूर्वकथा
गरुड़ नागों को क्यों खाते थे और वासुकि ने हर दिन एक नाग भेजने का नियम क्यों बाँधा — यह कथा शंखचूड़ ने जीमूतवाहन को सुनाई थी।
प्राचीन काल में महर्षि कश्यप की दो पत्नियाँ थीं — विनता और कद्रू। एक बार बातों-बातों में दोनों में विवाद हो गया। कद्रू ने कहा कि सूर्य के घोड़े काले हैं, विनता ने कहा कि सफेद हैं। दोनों ने शर्त लगाई कि जिसकी बात झूठी निकलेगी, वह दूसरी की दासी बनेगी। जीतने के लिए कद्रू ने अपने पुत्रों — नागों — से कहा कि वे अपनी विषैली फुफकार से सूर्य के घोड़ों को काला कर दें। इस छल से कद्रू जीत गई और विनता को उसकी दासी बनना पड़ा।
विनता के पुत्र गरुड़ को जब यह पता चला, तो उन्होंने शांति से कद्रू से अपनी माता को दासता से मुक्त करने की विनती की। नागों ने आपस में सलाह करके कहा — "हे गरुड़, देवता इस समय क्षीरसागर का मंथन कर रहे हैं। तुम बहुत बलवान हो। वहाँ से अमृत लाकर हमें दो, तो तुम्हारी माता मुक्त हो जाएगी।"
गरुड़ क्षीरसागर गए और अमृत के लिए अद्भुत पराक्रम दिखाया। उनके बल से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा — "मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ, कोई वर माँगो।" माता के अपमान से क्रोधित गरुड़ ने वर माँगा — "नाग मेरा भोजन हों।" भगवान ने "तथास्तु" कहा।
जब गरुड़ अमृत लेकर चलने लगे, तो देवराज इन्द्र ने उनसे कहा — "हे पक्षीराज, ऐसा उपाय करो कि दुष्ट नाग अमृत पी न सकें। मैं उनसे अमृत छीन लूँगा।" गरुड़ मान गए और अमृत-कलश लेकर नागों के पास पहुँचे। वर के कारण नाग उनसे डरे हुए थे। गरुड़ ने कहा — "मैं अमृत ले आया हूँ। मेरी माता को मुक्त करो और यह अमृत ले लो। यदि मुझसे डरते हो, तो मैं इसे कुशा के आसन पर रख देता हूँ।"
नाग मान गए। गरुड़ ने अमृत-कलश पवित्र कुशा पर रख दिया और नागों ने विनता को मुक्त कर दिया। माता को लेकर गरुड़ चले गए। जैसे ही नाग निडर होकर अमृत पीने के लिए इकट्ठा हुए, इन्द्र ने अपनी शक्ति से वह कलश उठा लिया।
निराश नागों ने सोचा कि शायद कुछ अमृत कुशा पर गिर गया हो, और वे कुशा को चाटने लगे। कुशा की धार से उनकी जीभ के दो भाग हो गए — यह उनके लोभ का फल था। इसीलिए आज भी साँपों की जीभ दो भागों में बँटी होती है।
अमृत से वंचित नागों पर अब गरुड़ विष्णु के वरदान के बल से बार-बार आक्रमण करने लगे। पूरा पाताल भय से व्याकुल हो गया। डर के मारे नाग निर्जीव-से हो गए, गर्भवती नागिनों के गर्भ गिरने लगे और बहुत-से नाग केवल भय से ही मर गए।
यह देखकर नागराज वासुकि ने सोचा कि इस तरह तो पूरा नागलोक नष्ट हो जाएगा, और गरुड़ को कोई जीत भी नहीं सकता। उन्होंने गरुड़ से कहा — "आप पाताल में आकर आतंक मत फैलाइए। यदि सारे नाग एक साथ मर गए, तो आपका भी भोजन नहीं बचेगा। हम हर दिन समुद्र-तट के पर्वत पर आपके भोजन के लिए एक नाग भेज देंगे।" गरुड़ ने यह बात मान ली और वासुकि का भेजा एक-एक नाग रोज़ खाने लगे।
इसी क्रम में एक दिन शंखचूड़ की बारी आई — और उसी दिन जीमूतवाहन ने उसके स्थान पर अपना शरीर अर्पित किया।
अध्याय 3 — चील और सियारिन की कथा (दूसरी कथा)
जितिया व्रत में दूसरी कथा चील और सियारिन की सुनी जाती है।
बहुत पहले नर्मदा नदी के पास एक जंगल में एक चील और एक सियारिन रहती थीं। एक बार उन्होंने कुछ स्त्रियों को जितिया व्रत की पूजा करते और उपवास रखते देखा। दोनों के मन में भी यह व्रत करने की इच्छा जागी, और उन्होंने साथ-साथ व्रत रखने का निश्चय किया।
व्रत के दिन सियारिन भूख सहन नहीं कर सकी। भूख से उसका बुरा हाल हो गया और उसने छिपकर भोजन कर लिया। चील ने पूरी निष्ठा और श्रद्धा से, भूख-प्यास सहकर व्रत का पालन किया और नियम से उसे पूरा किया।
इसका फल दोनों को मिला। सियारिन से जन्मे सभी बच्चे जन्म के कुछ ही दिनों में मर जाते थे, जबकि चील की संतान को लंबी आयु का आशीर्वाद मिला।
इसीलिए कहा जाता है कि जितिया का व्रत पूरी श्रद्धा और धैर्य से, नियम तोड़े बिना करना चाहिए। माताएँ व्रत के दिन यह कथा सुनती हैं और पूजा में चील और सियारिन की प्रतिमा भी बनाती हैं।