जीवित्पुत्रिका — जिसे जितिया भी कहते हैं — एक ऐसा व्रत है जो माताएं अपने पुत्रों की दीर्घायु के लिए करती हैं। इस व्रत की कथा जीमूतवाहन की अपूर्व वीरता की है।
जीमूतवाहन एक परम उदार और धर्मनिष्ठ गंधर्व राजकुमार था। एक दिन वह पर्वत पर बैठा था कि एक वृद्ध नाग माता को रोते देखा। उसने कारण पूछा तो पता चला — गरुड़ (दिव्य गरुड़) प्रतिदिन एक नाग को खाता था, और आज उसके एकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी थी।
जीमूतवाहन का हृदय करुणा से भर गया। उसने उस नाग युवक से कहा, "तुम मत जाओ। मैं स्वयं गरुड़ के सामने लेट जाता हूं।" शंखचूड़ बहुत विनती करता रहा, परन्तु जीमूतवाहन नहीं माना।
वह लाल वस्त्र पहनकर उस स्थान पर लेट गया जहां गरुड़ आता था। गरुड़ ने उसे उठाया और खाने लगा। परन्तु जीमूतवाहन ने कोई शब्द नहीं कहा, न रोया, न चिल्लाया।
गरुड़ रुक गया। इतना धैर्य और निर्भयता उसने कभी नहीं देखी थी। जीमूतवाहन ने सारी बात बताई। गरुड़ का हृदय पिघल गया।
इसी समय भगवान विष्णु वहां प्रकट हुए। उन्होंने जीमूतवाहन की उदारता और निःस्वार्थ बलिदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने गरुड़ को नागों को न खाने का आदेश दिया और जीमूतवाहन को अमर कर दिया।
नाग माता जो रो रही थी, उसे सांत्वना मिली। जो माताएं जितिया व्रत करती हैं, उनके पुत्रों की रक्षा जीमूतवाहन के आशीर्वाद से होती है। जय जीमूतवाहन! जय माता!