एक गरीब घर में सत्यवती नाम की एक सुंदर और धर्मपरायण स्त्री रहती थी। उसका पति काम की तलाश में बहुत दूर देश चला गया था। सत्यवती की जेठानियां उसे बहुत सताती थीं, घर में काम करवातीं और ताने देती थीं। सत्यवती का जीवन बहुत कठिन हो गया था।
एक दिन सत्यवती ने एक वृद्ध स्त्री को संतोषी माता का व्रत करते देखा। उसने पूछा कि यह कौन सा व्रत है। वृद्धा ने बताया, "बेटी, यह संतोषी माता का व्रत है। सोलह शुक्रवार तक इसे करो। माता को गुड़ और भुने चने का भोग लगाओ। व्रत के दिन कभी खट्टी चीज मत खाओ। माता तुम्हारी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करेंगी।"
सत्यवती ने विधिपूर्वक सोलह शुक्रवार का व्रत आरंभ किया। उसकी जेठानियां उसे खट्टी चीजें खिलाने की कोशिश करती थीं, परन्तु सत्यवती हर बार बच जाती थी। संतोषी माता की कृपा से उसके पति को दूर देश में अच्छा काम मिला और वह खूब धन कमाने लगा।
सोलहवें शुक्रवार को, जब उसने व्रत का उद्यापन किया और सभी को प्रसाद बांटा, उसी दिन उसके पति ने घर लौटने का निश्चय किया। उसकी जेठानियों ने परेशान करने के लिए उसके पति को झूठे संदेश दिए, परन्तु माता की कृपा से सत्य सामने आया। सत्यवती का पति घर आया, और वे दोनों सुख और समृद्धि से जीने लगे।
जो कोई भी सच्चे मन से संतोषी माता का व्रत करता है, माता उसकी सभी इच्छाएं पूर्ण करती हैं। जय संतोषी माता!