अध्याय 1 — रानी का व्रत छोड़ना
एक प्रतापी राजा और उसकी रानी के सुखी जीवन की यह कथा है। रानी प्रत्येक गुरुवार को बृहस्पति देव का व्रत विधिपूर्वक करती थीं — पीले वस्त्र पहनती थीं, चने की दाल, केला, गुड़ और घी का पवित्र भोजन बनाती थीं, गरीबों को पीला अन्न और वस्त्र दान करती थीं, घी का दीपक जलाती थीं। इस व्रत के प्रभाव से राज्य में सुख-समृद्धि थी।
एक बार रानी की पड़ोसन ने उन्हें उकसाते हुए कहा, "रानी जी! चने की दाल और केला खाने से क्या होगा? यह सब व्रत-उपवास तो गरीबों का काम है। आपका वैभव तो महाराज के पराक्रम से है, किसी देवता की कृपा से नहीं।" रानी इन बातों में आ गईं और उन्होंने गुरुवार का व्रत बंद कर दिया। उस दिन से गुरुवार को कपड़े धोने लगीं, बाल धोने लगीं और तले-भुने भोजन बनाने लगीं।
उसी सप्ताह से राज्य में विपदाएँ आने लगीं। वर्षा कम हो गई, खेत सूखे, प्रजा परेशान हुई। राजकुमार को अचानक गंभीर रोग ने घेर लिया। खजाने में भी कमी आने लगी।
राजा व्यापार के सिलसिले में परदेस गए। मार्ग में एक छोटे से गाँव में उन्हें एक गरीब कुम्हार की पत्नी मिली जो अत्यंत शांत और संतुष्ट थी। राजा ने पूछा, "इतनी गरीबी में भी इतनी प्रसन्नता कैसे?" उस स्त्री ने उत्तर दिया, "राजन! हम हर गुरुवार को बृहस्पति देव का व्रत करते हैं — पीला भोजन खाते हैं, दान देते हैं, घी का दीपक जलाते हैं। देव की कृपा से कभी अभाव नहीं होता।"
राजा को सारा रहस्य समझ आ गया। वे घर लौटे, रानी को सारा हाल बताया। दोनों ने मिलकर सात गुरुवार का व्रत भक्तिपूर्वक किया। चौथे गुरुवार को वर्षा हुई, पाँचवें पर राजकुमार का स्वास्थ्य लौटा, सातवें गुरुवार को बृहस्पति देव स्वयं एक साधु के रूप में दरबार में पधारे और आशीर्वाद दिया।
गुरुवार व्रत के नियम: पीले वस्त्र, पीला भोजन (चना दाल, केला, गुड़, घी), दान, घी का दीपक — और उस दिन बाल व कपड़े न धोएं। बृहस्पति देव की कृपा से धन, विद्या, संतान और दीर्घायु प्राप्त होती है। जय बृहस्पति देव! जय भगवान विष्णु!
अध्याय 2 — बृहस्पति देव का आशीर्वाद और व्रत विधि
एक बार एक गरीब ब्राह्मण था जिसके घर में अभाव ही अभाव था। उसकी पत्नी हर गुरुवार को बृहस्पति देव का व्रत करती थी। एक बार घर में अन्न का एक दाना भी नहीं था। पत्नी व्रत पर थी।
उसी समय एक साधु द्वार पर आए और बोले, "भोजन दो।" पत्नी ने कहा, "महात्मन! मेरे पास देने को कुछ नहीं है। घर में अन्न नहीं है।" साधु ने कहा, "तुम्हारे घर के कोने में एक मटका रखा है, उसमें देखो।" पत्नी ने देखा तो मटका अन्न से भरा था! उसने साधु को भोजन कराया। साधु प्रसन्न होकर बोले, "तुम्हारे व्रत की शक्ति असीम है। मैं स्वयं बृहस्पति देव हूँ। जब भी सच्चे मन से गुरुवार का व्रत किया जाएगा, मैं भक्त की हर जरूरत पूरी करूँगा।"
बृहस्पति देव ने गुरुवार व्रत की विधि बताई:
— प्रातःकाल स्नान करके पीले वस्त्र धारण करें।
— केले के पेड़ की पूजा करें, या बृहस्पति-विष्णु की पूजा करें।
— भोजन में चने की दाल, पीली खिचड़ी, केला और गुड़ लें।
— गुड़, चना और केला गरीबों को दान करें।
— शाम को घी का दीपक जलाएं।
— गुरुवार को कपड़े, बाल और मकान न धोएं।
— नमक का उपयोग कम करें।
— बृहस्पति स्तोत्र का पाठ करें।
जो इस व्रत को सात या इक्कीस गुरुवार करता है, उसे बृहस्पति देव की विशेष कृपा मिलती है। संतान, धन, विद्या, पति की दीर्घायु — जो भी मनोकामना हो, पूर्ण होती है। जय बृहस्पति देव! जय विष्णु!