प्राचीन काल में एक गरीब दंपत्ति रहते थे। वे नि:संतान थे और इस दुख में डूबे रहते थे। पति-पत्नी दोनों ने सूर्य देव की घोर उपासना की। एक दिन सूर्य देव ने पत्नी को स्वप्न में दर्शन दिए।
सूर्य देव ने कहा, "हे पुत्री, तुम्हारी भक्ति ने मुझे प्रसन्न किया है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को छठ व्रत करो। दो दिन का व्रत रखो। पहले दिन नदी तट पर जाकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दो। दूसरे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दो। प्रसाद में ठेकुआ, फल और नारियल चढ़ाओ। ध्यान रखना — प्रसाद बनाते समय उसे चखना नहीं।"
स्त्री ने विधिपूर्वक छठ व्रत किया। वह दो दिन निर्जल रही। पहले दिन नदी में कमर भर पानी में खड़ी होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया। दूसरी भोर को उगते सूर्य को अर्घ्य दिया। उसने ठेकुआ और फलों का प्रसाद बनाया, परन्तु एक बार भी नहीं चखा।
सूर्य देव प्रसन्न हुए। कुछ समय बाद उस स्त्री ने एक सुंदर और तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। वह पुत्र बड़ा होकर एक महान राजा बना। पड़ोसी सभी राज्यों ने उसका लोहा माना।
छठ व्रत करने से सूर्य देव प्रसन्न होते हैं और भक्त को स्वास्थ्य, संतान और समृद्धि का वरदान मिलता है। पवित्र मन से यह व्रत करने वाले को सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जय छठी माता! जय सूर्य देव!
अध्याय 2 — द्रौपदी का छठ व्रत और कर्ण की सूर्य-भक्ति
महाभारत काल में दो महान सूर्योपासना की कथाएं हैं जो छठ पर्व की परंपरा को और गहरी करती हैं।
पहली कथा — द्रौपदी का छठ व्रत:
पांडवों के वनवास के दौरान द्रौपदी को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। एक बार सभी पांडव अत्यंत दुर्बल और रोगी हो गए। द्रौपदी व्याकुल हो उठीं। उन्हें ऋषि धौम्य ने सूर्य षष्ठी व्रत का विधान बताया।
द्रौपदी ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी को नदी के किनारे जाकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया। निर्जल रहकर पूरी रात जागरण किया। प्रातःकाल उगते सूर्य को अर्घ्य दिया। उन्होंने बांस के सूप में ठेकुआ, नारियल, सुपारी, नींबू, हल्दी और फल सजाए और सूर्य देव को अर्पित किए।
सूर्य देव की कृपा से पांडव शीघ्र स्वस्थ हुए और वनवास की सभी बाधाएं धीरे-धीरे दूर होने लगीं।
दूसरी कथा — कर्ण की सूर्य भक्ति:
कर्ण, सूर्य का पुत्र, प्रतिदिन नदी में कमर भर जल में खड़े होकर सूर्य देव को अर्घ्य देता था। यह उसकी नित्य साधना थी। कहते हैं कि इस साधना के दौरान वह कभी किसी को खाली हाथ नहीं लौटाता था — चाहे कोई भी आए, वह अपने स्वर्ण कवच और कुंडल तक दान कर देता था।
छठ व्रत की यही परंपरा है — जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना। यह पर्व मुख्यतः बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल तराई में मनाया जाता है।
छठ पर्व का संदेश: सूर्य प्रत्यक्ष देवता हैं — प्रकाश, ऊर्जा और जीवन के स्रोत। छठी मैया सूर्य की बहन हैं जो संतान की रक्षा करती हैं। नदी का पवित्र जल, डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य — यह पर्व प्रकृति और परमात्मा को एक साथ पूजने का उत्सव है।
जय सूर्य देव! जय छठी मैया! जय सूर्य शक्ति!