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5 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
"साईं इतना दीजिए, जा में कुटुम समाय" — कबीर के संतोष पर दोहे संतोष, सादगी और सीमित आवश्यकताओं में संतुष्ट रहने का संदेश देते हैं। पढ़िए संतोष पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित।
कबीर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि हे प्रभु! मुझे केवल इतना ही दीजिए जिससे मेरे परिवार का भरण-पोषण हो जाए। न तो मैं स्वयं भूखा रहूँ और न ही मेरे द्वार आया कोई साधु भूखा लौटे। यह दोहा संतोष और सीमित आवश्यकताओं में संतुष्ट रहने का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जिसकी सारी इच्छाएँ मिट गईं, चिंताएँ समाप्त हो गईं और मन निश्चिंत हो गया, वही सच्चा सुखी है। जिसे संसार से कुछ नहीं चाहिए, वही वास्तव में बादशाहों का बादशाह है। यह दोहा निःस्पृहता और संतोष को सबसे बड़ा धन बताता है।
कबीर कहते हैं कि संत यही उपदेश देते हैं कि संतोष रखो और जो रूखा-सूखा मिल जाए उसी में संतुष्ट रहो। जो श्रेष्ठ कर्म (खेती) करता है, वह सबके साथ मिल-बाँटकर खाता है। यह दोहा संतोष और परोपकार के भाव का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि शील (सच्चरित्रता) सबसे बड़ा गुण है और यह सभी रत्नों की खान है। तीनों लोकों की समस्त संपदा सद्चरित्र में ही समाई हुई है। यह दोहा चरित्र को सबसे बड़ा धन बताता है।
कबीर कहते हैं कि (अनियंत्रित) आशा ईंधन की तरह जलती रहती है और चिंता उसे और दहकाती है। जो इन दोनों पर विवेक से नियंत्रण रखे, वही धर्म के मार्ग पर चलता है। यह दोहा अतृप्त आशा और चिंता से बचकर संयमित जीवन जीने का संदेश देता है।