भक्तिमाला ऐप
🔔 रिमाइंडर · 🪔 आरती · 📿 पंचांग

6 दोहे — हिंदी अर्थ सहित
"ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय" — कबीर के वाणी पर दोहे मधुर, विनम्र और सोच-समझकर बोलने की शिक्षा देते हैं। नीचे वाणी पर कबीर के दोहे हिंदी अर्थ सहित दिए गए हैं।
कबीर कहते हैं कि किसी भी बात की अति अच्छी नहीं होती। न तो बहुत अधिक बोलना अच्छा है और न ही बहुत अधिक चुप रहना; न अधिक वर्षा अच्छी है और न अधिक धूप। यह दोहा जीवन में संतुलन और मध्यम मार्ग अपनाने की शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य को ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिसमें अहंकार न हो। ऐसी वाणी दूसरों को तो शीतलता और सुख देती ही है, साथ ही बोलने वाले के मन को भी शांति प्रदान करती है। यह दोहा मधुर और विनम्र वाणी का महत्व बताता है।
कबीर कहते हैं कि वाणी अनमोल है, परंतु इसका मूल्य वही जानता है जो सोच-समझकर बोलता है। शब्दों को पहले हृदय रूपी तराजू में तौल लेना चाहिए, तभी उन्हें मुख से बाहर निकालना चाहिए। यह दोहा सोच-समझकर मधुर बोलने की शिक्षा देता है।
कबीर कहते हैं कि मनुष्य जैसा भोजन करता है, उसका मन भी वैसा ही बन जाता है; और जैसा जल (संगति/परिवेश) ग्रहण करता है, उसकी वाणी भी वैसी ही हो जाती है। यह दोहा शुद्ध आहार और सात्विक परिवेश के मन व वाणी पर प्रभाव को दर्शाता है।
कबीर कहते हैं कि सोच-विचारकर बोलना चाहिए और समझकर ही कोई बात लिखनी चाहिए। यदि मनुष्य अपने मन को संयम में रखे तो मन को सच्चा आनंद प्राप्त होता है। यह दोहा संयमित वाणी और मन के नियंत्रण का संदेश देता है।
कबीर कहते हैं कि जो कुछ तुम मुख से बोलते हो, उसे अपने मन में भी उतारो (आचरण में लाओ)। और जो सच्चा भाव मन में है, उसे प्रेमपूर्वक मुख से कहो। यह दोहा वाणी और आचरण में एकरूपता तथा निष्कपटता का संदेश देता है।