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दीपावली, शुक्रवार पूजा, कोजागरी पूर्णिमा, व्यापार समृद्धि
दीपावली, शुक्रवार पूजा, कोजागरी पूर्णिमा, व्यापार समृद्धि
विशेष दिन: शुक्रवार
दीपावली का लक्ष्मी-पूजन प्रदोष काल में विहित है — सूर्यास्त से आरंभ होकर लगभग दो घंटे चौबीस मिनट तक — और उसमें भी स्थिर लग्न में। स्थिर अर्थात् अचल: मान्यता है कि स्थिर लग्न में पूजित लक्ष्मी घर से जाती नहीं, वहीं वास करती हैं। दीपावली की रात्रि वृषभ लग्न प्रायः प्रदोष काल में ही पड़ता है, इसीलिए लगभग प्रत्येक पंचांग उसी को लक्ष्मी-पूजन मुहूर्त बताता है। साथ ही अमावस्या तिथि का होना आवश्यक है। दीपावली को मध्याह्न में लक्ष्मी-पूजन करना अशास्त्रीय है — अपने नगर का पंचांग अवश्य देखें, क्योंकि ये समय भारत में ही घंटे भर तक और विदेश में उससे कहीं अधिक बदल जाते हैं।
कमल पर विराजमान लक्ष्मी की प्रतिमा लें, खड़ी हुई नहीं — खड़ी लक्ष्मी को जाने के लिए उद्यत माना जाता है। गणेशजी उनके दाहिनी ओर विराजें, अर्थात् सम्मुख बैठे आपके बाईं ओर, और पूजा उन्हीं से आरंभ हो — कोई भी पूजा उन्हें लाँघकर नहीं होती। सरस्वतीजी, जहाँ रखी जाती हैं, लक्ष्मीजी के बाईं ओर विराजें। प्रतिमाओं का मुख पूर्व अथवा उत्तर की ओर हो और साधक उनके सम्मुख बैठें। प्रतिवर्ष नई प्रतिमा और वर्षों तक एक ही प्रतिमा — दोनों मान्य हैं; नई स्थापित करें तो पुरानी का आदरपूर्वक विसर्जन करें, उन्हें यूँ ही न हटाएँ।
एक दीप — परंपरा से सरसों अथवा तिल के तेल का, चौमुखी बत्ती सहित — दीपावली की रातभर जलता रहता है, प्रायः द्वार अथवा तिजोरी के पास। उसे बुझाया नहीं जाता, स्वयं शांत होने दिया जाता है। पूजा का कोई भी दीप फूँक मारकर नहीं बुझाया जाता। पूजनोपरांत घर अंधकार में नहीं, प्रकाशित रहे; उस रात्रि झाड़ू न लगाएँ; और सोने से पूर्व सम्पूर्ण परिवार साथ बैठकर प्रसाद ग्रहण करे।
20 आवश्यक · 5 वैकल्पिक
वैकल्पिक — इनके बिना भी पूजा पूर्ण है
केवल पूजा-स्थल नहीं, सम्पूर्ण गृह की शुद्धि करें।
गृह शुद्धि
केवल पूजा-स्थल नहीं, सम्पूर्ण गृह की सफाई करें — यही एकमात्र पूजा है जिसकी तैयारी पूरा घर है। तत्पश्चात् स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें; परंपरा से लाल, गुलाबी अथवा पीले।
द्वार सज्जा
द्वार पर रंगोली और भीतर की ओर मुड़े चरण-चिह्न बनाएँ, आम्रपत्र व गेंदे का तोरण बाँधें, और द्वार के दोनों ओर दीप रखें। पूजा के समय द्वार खुला अथवा अनलॉक रहे।
सामग्री
आरंभ से पूर्व सारी सामग्री एकत्र कर लें। प्रदोष काल अल्प होता है — पूजा बीच में माचिस ढूँढ़ने के लिए न रुके।
चौकी, कलश, दीप, संकल्प — और सर्वप्रथम श्रीगणेश।
चौकी
लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर अक्षत की शय्या बनाएँ। मध्य में लक्ष्मीजी, उनके दाहिनी ओर गणेशजी, और यदि रखते हों तो बाईं ओर सरस्वतीजी विराजित करें। मुख पूर्व अथवा उत्तर की ओर रहे।
कलश स्थापना
ताँबे के कलश में जल भरें, उसमें एक सिक्का, सुपारी और अक्षत डालें, मुख पर पाँच आम्रपत्र लगाएँ, गले में मौली बाँधें और लाल वस्त्र में लिपटा नारियल ऊपर रखें। इसे चौकी की दाहिनी ओर स्थापित करें।
मंत्र
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
kalaśasya mukhe viṣṇuḥ kaṇṭhe rudraḥ samāśritaḥ, mūle tatra sthito brahmā madhye mātṛgaṇāḥ smṛtāḥ.
कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगण विराजते हैं।
दीप प्रज्वलन
देव-प्रतिमाओं के दाहिनी ओर विषम संख्या की बत्तियों वाला घी का दीप जलाएँ। घर के शेष सभी दीप पूजा के पश्चात् इसी से प्रज्वलित करें, पूर्व नहीं।
मंत्र
शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसम्पदा। शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
śubhaṃ karoti kalyāṇam ārogyaṃ dhanasampadā, śatrubuddhi-vināśāya dīpajyotir namo’stu te.
तुम शुभ, कल्याण, आरोग्य और धन-सम्पदा देती हो तथा शत्रु-बुद्धि का नाश करती हो — हे दीप-ज्योति, तुम्हें नमस्कार।
संकल्प
दाहिनी हथेली में जल, अक्षत और पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र, स्थान और तिथि बोलकर संकल्प करें कि यह पूजन गृह की समृद्धि और कल्याण हेतु कर रहे हैं, फिर जल थाली में छोड़ दें।
गणेश पूजन
सर्वप्रथम गणेश-पूजन करें — चंदन व सिंदूर का तिलक, अक्षत, दूर्वा और लड्डू अर्पित करें। लक्ष्मीजी का आवाहन उन्हें लाँघकर नहीं होता; विघ्नहर्ता का पूजन धनदात्री से पूर्व होता है।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः॥
oṃ gaṃ gaṇapataye namaḥ.
षोडश उपचार — क्रम से महालक्ष्मी को अर्पित सोलह सेवाभाव।
ध्यान
नेत्र मूँदकर उनके स्वरूप का ध्यान करें — कमलासन पर विराजमान, चतुर्भुजा, दो हाथों में कमल, तीसरे से स्वर्ण-वर्षा और चौथा वरद-मुद्रा में। प्रत्येक षोडशोपचार हाथों से पूर्व मन से आरंभ होता है।
मंत्र
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
namas te’stu mahāmāye śrīpīṭhe surapūjite, śaṅkha-cakra-gadā-haste mahālakṣmi namo’stu te.
हे महामाया, श्रीपीठ पर विराजमान, देवों द्वारा पूजित — शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार।
आवाहन
आवाहन मुद्रा में हाथ जोड़ें — दोनों अंगूठे भीतर की ओर मोड़कर — हथेली में पुष्प लेकर आवाहन करें कि वे पधारें, विराजें और इस गृह में निवास करें।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। श्रीमहालक्ष्मीम् आवाहयामि॥
आसन · पाद्य · अर्घ्य · आचमन
पाँच पुष्प आसन हेतु अर्पित करें। फिर तीन बार जल दें — चरण-प्रक्षालन हेतु, चंदन-पुष्प-अक्षत मिश्रित अर्घ्य के रूप में, और आचमन हेतु।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। आसनं पाद्यं अर्घ्यं आचमनीयं समर्पयामि॥
स्नान
प्रतिमा को क्रमशः दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराएँ, फिर चंदन-मिश्रित जल से, फिर शुद्ध जल अथवा गंगाजल से स्नान कराकर पोंछ दें। चित्र अथवा कागज़ की प्रतिमा हो तो केवल कुछ बूँदें छिड़कें।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। पंचामृत स्नानं शुद्धोदक स्नानं च समर्पयामि॥
वस्त्र · आभूषण
लाल वस्त्र और यज्ञोपवीत के स्थान पर मौली अर्पित करें, तत्पश्चात् आभूषण — चूड़ियाँ, छोटी माला, अथवा पुष्पों से बनाया गया शृंगार।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। वस्त्रं आभूषणं च समर्पयामि॥
गंध · हल्दी · कुमकुम · अक्षत
चंदन लगाएँ, फिर हल्दी और कुमकुम, तत्पश्चात् अक्षत अर्पित करें। हल्दी-कुमकुम यहाँ उतने ही विहित हैं जितने शिव-पूजा में वर्जित — देवी के लिए ये स्वयं सौभाग्य के चिह्न हैं।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। गंधं हरिद्रां कुङ्कुमं अक्षतान् च समर्पयामि॥
पुष्प · कमल
पुष्प अर्पित करें, और सर्वोपरि कमल — वे स्वयं कमला हैं, कमल ही उनका आसन, चिह्न और नाम है। कमल उपलब्ध न हो तो गेंदा, लाल गुलाब अथवा कोई भी सुगंधित ताजा पुष्प स्वीकार्य है।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। पुष्पाणि कमलं च समर्पयामि॥
अष्टलक्ष्मी पूजन
उनके आठों स्वरूपों को नाम लेकर अक्षत व पुष्प अर्पित करें — आदि, धान्य, धैर्य, गज, संतान, विजय, विद्या और धन लक्ष्मी। धन तो आठ में से एक ही है; पूजा आठों की याचना करती है।
मंत्र
ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः। ॐ धान्यलक्ष्म्यै नमः। ॐ धैर्यलक्ष्म्यै नमः। ॐ गजलक्ष्म्यै नमः। ॐ सन्तानलक्ष्म्यै नमः। ॐ विजयलक्ष्म्यै नमः। ॐ विद्यालक्ष्म्यै नमः। ॐ धनलक्ष्म्यै नमः॥
धूप · दीप
धूप जलाकर सम्मुख घुमाएँ, फिर घी का दीप दिखाएँ। साथ ही बाएँ हाथ से घंटी बजाएँ।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। धूपं दीपं समर्पयामि॥
नैवेद्य
खील और बताशे अर्पित करें — यही दीपावली का अपना नैवेद्य है — साथ में खीर अथवा श्वेत मिष्ठान्न, फल, और थाली के पास थोड़ा जल रखें।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। नैवेद्यं समर्पयामि॥
ताम्बूल · दक्षिणा
सुपारी, लौंग व इलायची सहित पान, समूचा नारियल और दक्षिणा — सिक्के व एक नोट — सम्मुख अर्पित करें, जिन्हें बाद में व्यय न कर तिजोरी में रखा जाता है।
मंत्र
ॐ महालक्ष्म्यै नमः। ताम्बूलं नारिकेलं दक्षिणां च समर्पयामि॥
यही वह अंश है जो इसे मात्र लक्ष्मी-पूजन नहीं, दीपावली-पूजन बनाता है।
कुबेर पूजन
तिजोरी, लॉकर अथवा गल्ले का कुबेर-स्थान के रूप में पूजन करें। उस पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएँ, अक्षत व पुष्प अर्पित करें, और भीतर कौड़ियाँ अथवा एक सिक्का रखें।
मंत्र
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये। धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥
oṃ yakṣāya kuberāya vaiśravaṇāya dhanadhānyādhipataye, dhanadhānya-samṛddhiṃ me dehi dāpaya svāhā.
यक्षराज कुबेर, विश्रवा-पुत्र, धन-धान्य के अधिपति — मुझे धन-धान्य की समृद्धि प्रदान कीजिए।
बही-खाता · सरस्वती पूजन
नई बही-खाता, लेखा-पुस्तिका अथवा लैपटॉप देव-प्रतिमाओं के सम्मुख रखें। प्रथम पृष्ठ पर कुमकुम से स्वस्तिक बनाकर "श्री" अथवा "शुभ–लाभ" लिखें, और वहीं सरस्वती-पूजन करें — पुस्तकें उनकी हैं, उनमें लिखी आय लक्ष्मी की।
मंत्र
ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः॥
oṃ aiṃ sarasvatyai namaḥ.
दीपमालिका पूजन
मिट्टी के दीयों को चौकी के सम्मुख पंक्ति में सजाएँ, उन्हें अक्षत, कुमकुम और पुष्प अर्पित करें, और तभी पूजा के दीप से प्रज्वलित कर सम्पूर्ण गृह में स्थापित करें — देहरी, तुलसी, रसोई, जल-स्थान और छत पर।
आरती, प्रदक्षिणा, क्षमा-प्रार्थना, प्रसाद — और रात्रि का दीप।
आरती
आरती की थाली में कपूर जलाकर घड़ी की दिशा में घुमाएँ — चार बार चरणों में, दो बार नाभि पर, एक बार मुख पर, फिर सात बार सम्पूर्ण विग्रह पर। पहले गणेशजी की आरती, तत्पश्चात् लक्ष्मीजी की।
मंत्र
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता। तुमको निशदिन सेवत, हर विष्णु विधाता॥
oṃ jaya lakṣmī mātā, maiyā jaya lakṣmī mātā, tumako niśadina sevata, hara viṣṇu vidhātā.
पुष्पांजलि · प्रदक्षिणा
दोनों हथेलियों में पुष्प लेकर पुष्पांजलि अर्पित करें, फिर प्रदक्षिणा करें — स्थान न हो तो वहीं तीन बार दाहिनी ओर घूम जाएँ।
मंत्र
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे॥
yāni kāni ca pāpāni janmāntarakṛtāni ca, tāni tāni vinaśyanti pradakṣiṇa-pade pade.
इस जन्म अथवा जन्मांतर में किए गए जो भी पाप हों — वे प्रदक्षिणा के पद-पद पर नष्ट हो जाते हैं।
क्षमा प्रार्थना
जो भूल हुई, छूट गई अथवा ज्ञात ही न थी, उसके लिए क्षमा माँगें — यही श्लोक प्रत्येक पूजा का समापन है।
मंत्र
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वरि॥
āvāhanaṃ na jānāmi na jānāmi visarjanam, pūjāṃ caiva na jānāmi kṣamasva parameśvari.
मैं आवाहन जानता नहीं, विसर्जन जानता नहीं, पूजा भी नहीं जानता — हे परमेश्वरी, क्षमा कीजिए।
प्रसाद · रात्रि दीप
प्रसाद घर के सभी सदस्यों में बाँटकर साथ ग्रहण करें, बड़ों के चरण-स्पर्श करें, और द्वार अथवा तिजोरी के पास एक तेल का दीप रातभर जलने दें। घर प्रकाशित रहने दें, और आज रात्रि झाड़ू न लगाएँ।