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गणेश चतुर्थी, दैनिक पूजा, नए कार्य का आरंभ
गणेश चतुर्थी, दैनिक पूजा, नए कार्य का आरंभ
विशेष दिन: बुधवार
चतुर्थी को चंद्र-दर्शन से मिथ्या दोष लगता है — बिना किए हुए दोष का कलंक। कहा जाता है कि स्वयं श्रीकृष्ण पर चंद्र-दर्शन के पश्चात् स्यमंतक मणि चुराने का मिथ्या आरोप लगा था। यह निषेध सम्पूर्ण चतुर्थी तिथि तक रहता है। यदि भूलवश चंद्र दिख जाए तो नीचे दिया स्यमंतक श्लोक तीन बार पढ़ें अथवा स्यमंतक कथा सुनें — दोष निवृत्त हो जाता है।
सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः। सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥
siṃhaḥ prasenam avadhīt siṃho jāmbavatā hataḥ, sukumāraka mā rodīs tava hy eṣa syamantakaḥ.
आवाहन और प्राण-प्रतिष्ठा नवीन प्रतिमा के लिए हैं — उनसे देवता का आवाहन होता है। यदि आपके घर में गणेशजी पहले से नित्य पूजित हैं तो ये दोनों चरण छोड़ दें, और अंत में विसर्जन के स्थान पर उत्थापन करें।
15 आवश्यक · 5 वैकल्पिक
वैकल्पिक — इनके बिना भी पूजा पूर्ण है
स्नान करें, सामग्री एकत्र करें और आसन तैयार करें।
शुद्धि
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा-स्थल शुद्ध करें और पूर्व अथवा उत्तर की ओर मुख कर बैठें।
सामग्री
आरंभ से पूर्व सारी सामग्री एकत्र कर लें, जिससे पूजा बीच में न रुके।

चौकी
लकड़ी की चौकी पर लाल वस्त्र बिछाएँ और बीच में अक्षत की छोटी शय्या बनाएँ, जहाँ प्रतिमा विराजेगी।

कलश स्थापना
ताँबे के कलश में जल भरें, मुख पर पाँच आम्रपत्र लगाएँ, गले में मौली बाँधें और ऊपर नारियल रखें। इसे चौकी की दाहिनी ओर स्थापित करें।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। कलशाय नमः॥

श्रीगणेश का आवाहन कर उन्हें घर में विराजमान करें।
संकल्प
दाहिनी हथेली में जल, अक्षत और पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र, स्थान और तिथि बोलकर संकल्प करें कि यह पूजा परिवार के कल्याण हेतु कर रहे हैं, फिर जल थाली में छोड़ दें।
मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
vakratuṇḍa mahākāya sūryakoṭi samaprabha, nirvighnaṃ kuru me deva sarvakāryeṣu sarvadā.
हे वक्रतुण्ड, महाकाय, कोटि सूर्यों के समान तेजस्वी — मेरे समस्त कार्य सदा निर्विघ्न कीजिए।

आवाहन
आवाहन मुद्रा में हाथ जोड़ें — दोनों अंगूठे भीतर की ओर मोड़कर — हथेली में पुष्प लेकर श्रीगणेश का आवाहन करें।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। श्रीगणपतिम् आवाहयामि॥

प्राण-प्रतिष्ठा
प्रतिमा को धीरे से अक्षत-शय्या पर विराजमान करें। जल में डुबोई दूर्वा से हृदय का स्पर्श कर प्रार्थना करें कि इन दिनों प्राण यहीं निवास करें।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। अस्यां प्रतिमायां प्राणाः इह प्राणाः॥

षोडश उपचार — क्रम से अर्पित किए जाने वाले सोलह सेवाभाव।
आसन · पाद्य · अर्घ्य · आचमन
पाँच पुष्प आसन हेतु अर्पित करें। फिर तीन बार जल दें — चरण प्रक्षालन (पाद्य), स्वागत (अर्घ्य) और आचमन हेतु।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। आसनं पाद्यं अर्घ्यं आचमनीयं समर्पयामि॥
स्नान
प्रतिमा को क्रमशः दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल अथवा गंगाजल से शुद्ध स्नान कराकर पोंछ दें। मिट्टी की प्रतिमा को केवल पोंछें, भिगोएँ नहीं।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। पंचामृत स्नानं समर्पयामि॥

वस्त्र · यज्ञोपवीत
नवीन वस्त्र और नौ तंतुओं का यज्ञोपवीत अर्पित करें।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। वस्त्रं यज्ञोपवीतं च समर्पयामि॥

गंध · अक्षत
मस्तक पर चंदन लगाएँ, फिर अक्षत अर्पित करें — साबुत चावल, क्योंकि देव को अर्पित वस्तु स्वयं अखंडित होनी चाहिए।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। गंधं अक्षतान् च समर्पयामि॥

दूर्वा · शमी · पुष्प
तीन-तीन की गाँठ में बँधे 21 दूर्वा दल मस्तक व कंधों पर अर्पित करें। साथ में शमी पत्र और लाल गुड़हल चढ़ाएँ। दूर्वा वह अर्पण है जिसे गणेशजी कभी अस्वीकार नहीं करते।
मंत्र
दूर्वांकुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्। आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक॥
dūrvāṅkurān suharitān amṛtān maṅgalapradān, ānītāṃs tava pūjārthaṃ gṛhāṇa gaṇanāyaka.
ये हरे-भरे, अमृतमय, मंगलदायक दूर्वांकुर आपकी पूजा हेतु लाया हूँ — हे गणनायक, इन्हें स्वीकार कीजिए।

सिंदूर
प्रतिमा पर सिंदूर अर्पित करें। गणेशजी उन थोड़े देवों में हैं जिनकी पूजा विग्रह पर सीधे सिंदूर से होती है।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। सिन्दूरं समर्पयामि॥

धूप · दीप
धूप जलाकर प्रतिमा के सम्मुख घुमाएँ, फिर घी का दीप दिखाएँ। साथ ही बाएँ हाथ से घंटी बजाएँ।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। धूपं दीपं समर्पयामि॥

नैवेद्य
मोदक अर्पित करें — हो सके तो 21 — साथ में फल और थाली के पास थोड़ा जल रखें। मोदक उनका प्रिय भोग है; इसके बिना गणेश-पूजा अपूर्ण है।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। नैवेद्यं समर्पयामि॥

ताम्बूल · नारिकेल · दक्षिणा
सुपारी सहित पान, समूचा नारियल और दक्षिणा — कुछ सिक्के — सम्मुख अर्पित करें।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः। ताम्बूलं नारिकेलं दक्षिणां च समर्पयामि॥

आरती, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा और क्षमा-प्रार्थना।
आरती
आरती की थाली में कपूर जलाकर घड़ी की दिशा में घुमाएँ — चार बार चरणों में, दो बार नाभि पर, एक बार मुख पर, फिर सात बार सम्पूर्ण विग्रह पर।
मंत्र
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
jaya gaṇeśa jaya gaṇeśa jaya gaṇeśa devā, mātā jākī pārvatī pitā mahādevā.

पुष्पांजलि · प्रदक्षिणा
दोनों हथेलियों में पुष्प लेकर पुष्पांजलि अर्पित करें, फिर प्रदक्षिणा करें — स्थान न हो तो वहीं तीन बार दाहिनी ओर घूम जाएँ।
मंत्र
यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च। तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणपदे पदे॥
yāni kāni ca pāpāni janmāntarakṛtāni ca, tāni tāni vinaśyanti pradakṣiṇa-pade pade.
इस जन्म अथवा जन्मांतर में किए गए जो भी पाप हों — वे प्रदक्षिणा के पद-पद पर नष्ट हो जाते हैं।

क्षमा प्रार्थना
अंत में जो भूल हुई, छूट गई या ज्ञात ही न थी, उसके लिए क्षमा माँगें — यही श्लोक प्रत्येक पूजा का समापन है।
मंत्र
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
āvāhanaṃ na jānāmi na jānāmi visarjanam, pūjāṃ caiva na jānāmi kṣamasva parameśvara.
मैं आवाहन जानता नहीं, विसर्जन जानता नहीं, पूजा भी नहीं जानता — हे परमेश्वर, क्षमा कीजिए।
डेढ़, तीन, पाँच, सात या दसवें दिन — कुल की परंपरा के अनुसार।
विसर्जन
कुल की परंपरा के अनुसार निश्चित दिन अंतिम आरती करें, पुनः क्षमा-प्रार्थना करें और प्रतिमा का जल में विसर्जन करें — परंपरा से "गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या" कहते हुए। मिट्टी की प्रतिमा घर पर बाल्टी या टंकी में विसर्जित करें और मिट्टी को पौधे या भूमि में लौटा दें।
मंत्र
गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या।
gaṇapati bappā moryā, puḍhacyā varṣī lavakar yā.
गणपति बप्पा मोरया — अगले वर्ष शीघ्र पधारिए।
