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पूर्णिमा, संक्रांति, गृहप्रवेश, विवाह, संकल्प-पूर्ति
पूर्णिमा, संक्रांति, गृहप्रवेश, विवाह, संकल्प-पूर्ति
विशेष दिन: पूर्णिमा
पाँच में से तीन अध्याय ऐसे व्यक्ति की कथा हैं जिसने पूजा तो की किंतु प्रसाद की उपेक्षा कर दी: वह वणिक जो अपना वचन भूल गया, उसकी पुत्री जो प्रसाद लिए बिना उठ गई, और वह राजा जिसने ग्वालों का प्रसाद ठुकरा दिया। तीनों सब कुछ खो बैठते हैं और लौटकर प्रसाद ग्रहण करने पर ही पुनः पाते हैं। अतः भोग सवाया माप में बनाएँ — सवा भाग आटा अथवा सूजी, शक्कर, घी, दूध और केले; उसमें तुलसी दल अवश्य मिलाएँ, जिनके बिना नैवेद्य स्वीकार नहीं होता; और यह सुनिश्चित करें कि उपस्थित प्रत्येक जन, घर में काम करने वाले, तथा उस संध्या जो भी द्वार पर आए — सबको प्रसाद मिले और वे ग्रहण करें। उस रात्रि कोई भी घर से बिना प्रसाद के न जाए।
व्रत में सम्मिलित प्रत्येक व्यक्ति प्रथम पंक्ति से अंतिम तक बैठा रहे, दाहिने हाथ में कुछ अक्षत लिए, और प्रत्येक अध्याय की समाप्ति पर उन्हें देव-सम्मुख अर्पित करे। कथा के बीच द्वार खोलने या रसोई देखने उठ जाना ठीक वही है जो चौथे अध्याय में कलावती ने किया था। मोबाइल दूर रखें, भोजन की तैयारी पहले पूर्ण कर लें, और कथा अखंड चलने दें — सस्वर पाठ में लगभग पैंतालीस मिनट से एक घंटा लगता है।
पूर्णिमा शास्त्रीय तिथि है, और उनमें भी कार्तिक, वैशाख, श्रावण तथा चैत्र पूर्णिमा श्रेष्ठ हैं। यह संक्रांति, एकादशी तथा किसी भी ऐसे अवसर पर भी की जाती है जहाँ कोई संकल्प लिया या पूर्ण हुआ हो — गृहप्रवेश, विवाह, संतान-जन्म, रोग से मुक्ति, नया व्यवसाय, परीक्षा में सफलता। इसके लिए न कोई मास वर्जित है न कोई अवसर अनुपयुक्त; यह एकमात्र ऐसा व्रत है जिस पर पंचांग का कोई प्रतिबंध नहीं। पूजा परंपरा से संध्या-समय, सूर्यास्त के आसपास होती है, और परिवार दिनभर व्रत रखकर प्रसाद के पश्चात् ही भोजन करता है।
पुण्याहवाचन, मातृका-पूजन, हवन और पूर्णाहुति सहित विस्तृत विधि पुरोहित द्वारा सम्पन्न होती है और उसमें दो-तीन घंटे लगते हैं। घरेलू विधि इससे कहीं कम में पूर्ण है: संकल्प, गणेश-पूजन, कलश, षोडशोपचार, पाँच अध्याय, आरती और प्रसाद। मंत्र जितना बन सके उतना शुद्ध पढ़ें और शेष अपनी भाषा में कहें — व्रत का नाम ही सत्य पर है, और निष्ठा से निभाया गया वचन ही इसका सर्वस्व है। जहाँ हवन किया जाए, वह कथा के पश्चात् और आरती से पूर्व होता है।
18 आवश्यक · 2 वैकल्पिक
वैकल्पिक — इनके बिना भी पूजा पूर्ण है
दिवस, मंडप, और पहले से बनाया गया सवाया भोग।
दिवस निर्णय
पूर्णिमा, संक्रांति, एकादशी अथवा जिस अवसर हेतु व्रत है वह दिन निश्चित करें। पूजा संध्या-समय, सूर्यास्त के आसपास रखें, और दिनभर व्रत करें — फल और दूध, अन्न कुछ नहीं, प्रसाद ग्रहण करने तक।
मंडप एवं चौकी
कक्ष शुद्ध कर रंगोली बनाएँ। यदि परंपरा हो तो पूजा-स्थल के चारों कोनों पर केले के खंभे बाँधकर ऊपर चँदोवा लगाएँ, और चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर मध्य में अक्षत की शय्या बनाएँ।
सवाया भोग
पूजा आरंभ होने से पूर्व प्रसाद बना लें, सवाया माप में — प्रत्येक वस्तु सवा भाग। सूजी अथवा गेहूँ का आटा घी में भूनें, दूध और शक्कर मिलाएँ, मसला हुआ केला डालें और अंत में तुलसी दल मिलाएँ। ढककर चौकी के पास रखें।
गणेश, कलश, नवग्रह, संकल्प और आवाहन।
गणेश पूजन
स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें — यथासंभव पीत वर्ण के — पूर्व की ओर मुख कर बैठें, और सर्वप्रथम गणेश-पूजन करें: चंदन, अक्षत, दूर्वा और लड्डू अर्पित करें।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः॥
कलश स्थापना
ताँबे के कलश में जल एवं थोड़ा गंगाजल भरें, उसमें सिक्का और सुपारी डालें, मुख पर पाँच आम्रपत्र लगाएँ, गले में मौली बाँधें और ऊपर नारियल रखें। इसे चौकी की दाहिनी ओर स्थापित करें।
मंत्र
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः। मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः॥
kalaśasya mukhe viṣṇuḥ kaṇṭhe rudraḥ samāśritaḥ, mūle tatra sthito brahmā madhye mātṛgaṇāḥ smṛtāḥ.
कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगण विराजते हैं।
नवग्रह एवं दिक्पाल
चौकी के पास रोली से नौ कोष्ठक अथवा अष्टदल कमल बनाएँ, और नवग्रहों तथा अष्ट दिक्पालों को अक्षत व पुष्प अर्पित कर प्रार्थना करें कि पूजा निर्विघ्न सम्पन्न हो।
मंत्र
ॐ नवग्रहेभ्यो नमः॥ ॐ अष्टदिक्पालेभ्यो नमः॥
संकल्प
दाहिनी हथेली में जल, अक्षत और पुष्प लें। अपना नाम, गोत्र, स्थान और तिथि बोलें, और स्पष्ट कहें कि यह व्रत किस निमित्त है — कोई याचना, कोई प्राप्ति, अथवा कोई वचन जो निभाया जा रहा है। फिर जल थाली में छोड़ दें।
ध्यान एवं आवाहन
उनके स्वरूप का ध्यान करें — शेषशय्या पर विराजमान, पद्मनाभ, मेघवर्ण, लक्ष्मीपति — तत्पश्चात् आवाहन मुद्रा में पुष्प लेकर प्रार्थना करें कि वे इस पूजा और कथा में उपस्थित रहें।
मंत्र
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
śāntākāraṃ bhujagaśayanaṃ padmanābhaṃ sureśaṃ viśvādhāraṃ gaganasadṛśaṃ meghavarṇaṃ śubhāṅgam, lakṣmīkāntaṃ kamalanayanaṃ yogibhir dhyānagamyaṃ vande viṣṇuṃ bhavabhayaharaṃ sarvalokaikanātham.
शांत स्वरूप, शेषशय्या पर शयन करने वाले, पद्मनाभ, देवेश, विश्व के आधार, आकाश के समान व्यापक, मेघवर्ण, सुंदर अंगों वाले, लक्ष्मीपति, कमलनयन, योगियों को ध्यान में प्राप्त होने वाले — भवभय हरने वाले, समस्त लोकों के एकमात्र नाथ विष्णु को नमस्कार।
क्रम से श्रीसत्यनारायण को अर्पित सोलह उपचार।
आसन · पाद्य · अर्घ्य · आचमन
पाँच पुष्प आसन हेतु अर्पित करें, फिर तीन बार जल दें — चरण-प्रक्षालन, स्वागत (अर्घ्य) और आचमन हेतु।
मंत्र
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। आसनं पाद्यं अर्घ्यं आचमनीयं समर्पयामि॥
स्नान
चित्र अथवा प्रतिमा को क्रमशः दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल अथवा गंगाजल से स्नान कराकर पोंछ दें। चित्र हो तो केवल कुछ बूँदें छिड़कें।
मंत्र
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। पंचामृत स्नानं शुद्धोदक स्नानं च समर्पयामि॥
वस्त्र · यज्ञोपवीत
नवीन पीत वस्त्र और यज्ञोपवीत अर्पित करें।
मंत्र
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। वस्त्रं यज्ञोपवीतं च समर्पयामि॥
गंध · अक्षत · पुष्प · तुलसी
चंदन और रोली लगाएँ, अक्षत अर्पित करें, फिर पीत पुष्प — और तुलसी, जो सर्वोपरि उन्हीं की है। विष्णु को अर्पित कोई भी वस्तु तुलसी दल के बिना पूर्ण नहीं होती।
मंत्र
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। गंधं अक्षतान् पुष्पाणि तुलसीदलं च समर्पयामि॥
धूप · दीप
धूप जलाकर सम्मुख घुमाएँ, फिर घी का दीप दिखाएँ और साथ ही बाएँ हाथ से घंटी बजाएँ।
मंत्र
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। धूपं दीपं समर्पयामि॥
नैवेद्य
तुलसी दल सहित सवाया भोग, समूचे केले, फल, मेवा और थाली के पास थोड़ा जल अर्पित करें। सम्पूर्ण कथा इसी अर्पण के विषय में है।
मंत्र
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। नैवेद्यं समर्पयामि॥
ताम्बूल · दक्षिणा
सुपारी, लौंग व इलायची सहित पान, समूचा नारियल और दक्षिणा — सवाया मात्रा में सिक्के — सम्मुख अर्पित करें।
मंत्र
ॐ श्रीसत्यनारायणाय नमः। ताम्बूलं नारिकेलं दक्षिणां च समर्पयामि॥
व्रत का मूल। समाप्ति से पूर्व कोई न उठे।
कथा आरंभ
कथा में सम्मिलित सभी जन दाहिने हाथ में कुछ अक्षत लेकर बैठ जाएँ। पुस्तक वस्त्र पर रखें, नंगी भूमि पर कभी नहीं। यहाँ से पाँचवें अध्याय की समाप्ति तक कोई न उठे।
प्रथम अध्याय
नैमिषारण्य में ऋषिगण सूतजी से पूछते हैं कि सामान्य जन दुःख से किस प्रकार मुक्त हों। वे नारदजी द्वारा भगवान विष्णु से पूछा गया वही प्रश्न सुनाते हैं, और विष्णु का उत्तर: सत्यनारायण व्रत करो, कलियुग का शोक दूर हो जाता है।
द्वितीय अध्याय
काशी का एक निर्धन ब्राह्मण यह व्रत करता है और उसकी दरिद्रता दूर हो जाती है। एक लकड़हारा उसे देखकर अपने अल्प साधनों से वही व्रत करता है — और कथा अपनी पहली बात कहती है: व्रत साधन नहीं, भाव माँगता है।
तृतीय अध्याय
राजा उल्कामुख यह व्रत करते हैं। संतानहीन वणिक साधु प्रतिज्ञा करता है कि संतान होने पर वह व्रत करेगा। कलावती का जन्म होता है — और वह वचन नहीं निभाता। सम्पूर्ण अध्याय उसी अधूरे संकल्प पर टिका है।
चतुर्थ अध्याय
रत्नपुर में साधु और उसके दामाद पर चोरी का मिथ्या आरोप लगता है, वे बंदी बनाए जाते हैं और उनका धन लुप्त हो जाता है। घर पर लीलावती व्रत करती है, किंतु कलावती प्रसाद लिए बिना उठकर चली जाती है — और नौका रिक्त मिलती है। वह लौटकर प्रसाद ग्रहण करती है और धन पुनः प्राप्त होता है।
पंचम अध्याय
राजा तुंगध्वज व्रत कर रहे ग्वालों के पास से निकलते हैं और उनके द्वारा दिया गया प्रसाद अस्वीकार कर देते हैं। वे अपने पुत्र और सम्पत्ति खो बैठते हैं। लौटकर उन्हीं के साथ प्रसाद ग्रहण करते हैं और सब कुछ पुनः प्राप्त हो जाता है — यही नियम का अंतिम और सबसे स्पष्ट कथन है।
आरती, क्षमा-प्रार्थना, और प्रसाद जो सबको मिले।
आरती
कपूर जलाकर सम्मुख घड़ी की दिशा में घुमाएँ — चार बार चरणों में, दो बार नाभि पर, एक बार मुख पर, फिर सात बार सम्पूर्ण विग्रह पर।
मंत्र
जय लक्ष्मीरमणा, स्वामी जय लक्ष्मीरमणा। सत्यनारायण स्वामी, जन-पातक-हरणा॥
jaya lakṣmīramaṇā, svāmī jaya lakṣmīramaṇā, satyanārāyaṇa svāmī, jana-pātaka-haraṇā.
पुष्पांजलि · प्रदक्षिणा · क्षमा
कथा भर हाथ में रखे अक्षत पुष्पांजलि सहित अर्पित करें, तीन प्रदक्षिणा करें, और जो भूल हुई, छूट गई अथवा ज्ञात ही न थी उसके लिए क्षमा माँगें।
मंत्र
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्। पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
āvāhanaṃ na jānāmi na jānāmi visarjanam, pūjāṃ caiva na jānāmi kṣamasva parameśvara.
मैं आवाहन जानता नहीं, विसर्जन जानता नहीं, पूजा भी नहीं जानता — हे परमेश्वर, क्षमा कीजिए।
प्रसाद वितरण
प्रसाद उपस्थित प्रत्येक जन को दें, फिर पड़ोसियों, घर में काम करने वालों और द्वार पर आए हर व्यक्ति को। उसके पश्चात् ही परिवार व्रत का पारण कर भोजन करे। ब्राह्मण अथवा किसी जरूरतमंद को भोजन एवं दक्षिणा दें, और कलश का जल घर में छिड़कने हेतु रखें।