अध्याय 1 — आमलकी एकादशी और आँवले का माहात्म्य
राजा मान्धाता ने वशिष्ठ मुनि से पूछा — भगवन्! फाल्गुन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? मुनि ने कहा — राजन्! इसका नाम आमलकी एकादशी है। इस दिन आँवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का वास होता है। आँवले की पूजा से सभी पापों का नाश होता है। हो हे ही ही ही ही कै की के डे ही की ही हे है के डे डे की को है डी कै है के हे के की औ डी ही मे कै कै है के ही की की ही औ के के. मे मे औ है हे फै हे ही ही ओ कै के को #ए ही के की Rankan मान्धाताना पूछा-द्विजश्रेष्ठ]_ यह 'आमलकी'
कब उत्पन्न हुई, मुझे बताइये। atest कहा--महाभाग ! सुनो--पृथ्वीपप 'आमलकी'की
उत्पत्ति किस प्रकार हुई, यह बताता हूँ। आमलकी महान् वृक्ष है, जो सब
पापोंका नाश करनेवाला है। भगवान् विष्णुके थूकनेपर उनके मुखसे
चन्द्रमाके समान कान्तिमान् एक बिन्दु प्रकट हुआ। वह बिन्दु पृथ्वीपर गिरा |
उसीसे आमलकी (आँवले) का महान् वृक्ष उत्पन्न हुआ। यह सभी वृक्षोंका
आदिभूत कहलाता है। इसी समय समस्त प्रजाकी सृष्टि करनेके लिये
भगवानने ब्रह्माजीको उत्पन्न किया | SAS इन प्रजाओंकी सृष्टि हुई | देवता,
दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग तथा निर्मल अन्तःकरणवाले महर्षियोंको
ब्रह्माजीने जन्म दिया। उनमेंसे देवता और ऋषि उस स्थानपर आये, जहाँ
विष्णुप्रिया आमलकीका वृक्ष था | महाभाग | उसे देखकर देवताओंको बड़ा
विस्मय हुआ। वे एक-दूसरेपर दृष्टिपात करते हुए उत्कण्ठापूर्वक उस वृक्षकी
ओर देखने लगे और खड़े-खड़े सोचने लगे कि wer (पाकर) आदि वृक्ष तो
पूर्व कल्पकी ही भाँति हैं, जो सब-के-सब हमारे परिचित हैं, किन्तु इस
वृक्षको हम नहीं जानते। उन्हें इस प्रकार चिन्ता करते देख आकाशवाणी
हुई--'महर्षियो | यह सर्वश्रेष्ठ आमलकीका वृक्ष है, जो विष्णुको प्रिय है।
इसके स्मरणमात्रसे गोदानका फल मिलता है। स्पर्श करनेसे इससे दूना और
PS भक्षण करनेसे तिगुना पुण्य प्राप्त होता है। इसलिये सदा प्रयत्रपूर्वक
आमलकीका सेवन करना चाहिये | यह सब पापोंको हरनेवाला वैष्णव वृक्ष
बताया गया S| इसके मूलमें विष्णु, उसके ऊपर ब्रह्मा, THA परमेश्वर
भगवान् रुद्र, शाखाओंमें मुनि, टहनियोंमें देवता, पत्तोंमें वसु, फूलोंमें AKT
तथा फलोंमें समस्त प्रजापति वास करते हैं। आमलकी सर्वदेवमयी बतायी
गयी है ।# अतः विष्णुभक्त पुरुषोंके लिये यह परम पूज्य है।' * FRIAS स्थितो विष्णुस्तदूर्ध्व च पितामहः | स्कन्धे च भगवान् रुद्र: संस्थितः परमेश्वर: ॥
WRAY मुनयः सर्वे प्रशाखासु च : | पर्णेषु वसवो देवाः पुष्पेषु मरुतस्तथा॥ ER “ए पिन प्करए न ० ५ २८ एकादशी-ब्रतका माहात्म्य औ है हे मी हे फो है है कै की है ही की है है है फ डी के हे ही हे कै ही डे की की हि है औ हे है है हि ही है ही है है मे है ही हो औ है के है हि परे मै औ डे मी हरे की डी औ के के डे khan ऋषि बोले-- [ अव्यक्त स्वरूपसे बोलनेवाले महापुरुष ! ] हमलोग आपको क्या समझें--आप कौन हैं ? देवता हैं या कोई और ? | हमें ठीक-ठीक बताइये | द आकाशवाणी हुई--जो सम्पूर्ण भूतोंके कर्ता और समस्त भुवनोंके स्रष्टा |
हैं, जिन्हें विद्वान पुरुष भी कठिनतासे देख पाते हैं, वही सनातन विष्णु में हूँ। देवाधिदेव भगवान् विष्णुका कथन सुनकर उन ब्रह्मकुमार महर्षियोंके
नेत्र आश्चर्यसे चकित हो उठे | उन्हें बड़ा विस्मय हुआ | वे आदि-अन्तरहित
भगवानकी स्तुति करने लगे। ऋषि बोले--सम्पूर्ण आत्मभूत, आत्मा एवं परमात्माको
नमस्कार है। अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले अच्युतको नित्य . प्रणाम है। अन्तरहित बारम्बार प्रणाम है। दामोदर, कवि (Sag) और नमस्कार है| मायापते ! आपको प्रणाम है । आप विश्वके स्वामी हैं; आपको नमस्कार S| ऋषियोंके इस प्रकार स्तुति HOT भगवान् श्रीहरि संतुष्ट हुए और | बोले--महर्षिय़ो ! तुम्हें कोन-सा अभीष्ट वरदान दूँ 2’ ऋषि बोले--भगवन् | यदि आप संतुष्ट हैं तो हमलोगोंके हितके लिये |
कोई ऐसा त्रत बतलाइये, जो स्वर्ग और मोक्षरूपी फल प्रदान करनेवाला हो ।
श्रीविष्णु बोले--महर्षियो | फाल्गुन शुक्ृतपक्षमें यदि पुष्य नक्षत्रसे | युक्त द्वादशी हो तो वह महान् पुण्य देनेवाली और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। द्विजवरो | उसमें जो विशेष कर्तव्य है, उसको सुनो। | आमलकी आँवलेके gah पास जाकर वहाँ रात्रिमें जागरण | करता चाहिये। इससे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता और सहखर गोदानोंका | फल प्राप्त करता है। विप्रगण ! यह wai उत्तम wa है, जिसे मैंने | तुमलोगोंको बताया है। * OSM पतयः सर्वे HOI व्यवस्थिताः । सर्वदेवमयी धात्री च कथिता AAT | (४७ | २०--१३ ) हु फाल होता
समः उसद
मनुष घर]
और?
के स्रष्टा |
[मैं हूँ। , कवि
अध्याय 2 — राजा मान्धाता और आमलकी का व्रत
नक्षत्रसे
सुनो। |
जागरण | आह की कै है ही भी कै हरे है की ही कै के की की की कै है जे की है है की के है है डी कै मे हि डक ओके की के है डी डी की कै कै के कि औ की औी डे के की है की की है कि है ही औ ही कै के ही ऋषि बोले--भगवन् ! इस व्रतकी विधि बतलाइये | यह कैसे पूर्ण
होता है ? इसके देवता, नमस्कार और मन्त्र कौन-से बताये गये हैं sq
समय GI SAN दान कैसे किया जाता है 2 पूजनकी कौन-सी विधि है तथा
उसके लिये मन्त्र क्या है ? इन सब बातोंका यथार्थ रूपसे वर्णन कीजिये |
भगवान् विष्णुने कहा--द्विजवरो | इस ब्रतकी जो उत्तम विधि है,
उसको श्रवण करो | एकादशीको प्रातःकाल दन्तधावन करके यह सड्डूल्प
करे कि 'हे पुण्डरीकाक्ष ! हे अच्युत | मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे
दिन भोजन करूँगा। आप मुझे शरणमें रखें।' ऐसा नियम लेनेके बाद
पतित, चोर, पाखण्डी, दुराचारी, मर्यादा भंग करनेवाले तथा गुरुपलीगामी,
मनुष्योंसे वार्ताल्लप न करे। अपने मनको FR रखते हुए नदीमें, Shaw,
कुएँपर अथवा घरमें ही स्नान करे | SH पहले शरीरमें मिट्टी लगाये।
मृत्तिका लगानेका मन्त्र
अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते age
मृत्तिके हर मे ad जन्मकोट्यां समर्जितम॥
है (४७ ॥। ४३)
“वसुन्धरे | ऊपर अश्व और रथ चला करते हैं तथा वामन '
अवतारके समय भगवान् विष्णुने भी तुम्हें अपने पैरोंसे नापा था | मृत्तिके !
मैंने करोड़ों जन्मोंमें जो पाप किये हैं, मेरे उन सब पापोंको हर लो ।'
स्नान-मन्त्र
a मातः सर्वभूतानां जीवन aq रक्षकम्।
Safest रसानां पतये नमः ॥
wise सर्वतीर्थेषु. हृदप्रस्रवणेषु॒ al
way देवखातेषु इदं AM तु मे भवेत्॥
(४७ | ४४-४५)
‘Sea अधिष्ठात्री देवी ara: | तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये जीवन
हो । वही जीवन, जो और उद्धिज्ज जातिके जीवोंका भी रक्षक है।
तुम रसोंकी स्वामिनी हो तुम्हें नमस्कार है। आज मैं सम्पूर्ण तीर्थों, कुण्डों, मा०-. २ ३० एकादशी-ब्रतका माहात्म्य झरनों, नदियों और देवसम्बन्धी सरोवरोंमें ज्नान कर चुका | मेरा यह स्नान
उक्त सभी स््रानोंका फल देनेवाला हो I’
विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह परशुरामजीकी सोनेकी प्रतिमा
बनवाये | प्रतिमा अपनी शक्ति और धनके अनुसार एक या आधे माशे
सुवर्णकी होनी चाहिये। AM पश्चात् घर आकर पूजा और हवन करे।
इसके बाद सब प्रकारकी सामग्री लेकर आँवलेके व॒क्षके पास जाय | वहाँ
व॒क्षके चारों ओरकी जमीन झाड़-बुहार, लीप-पोतकर शुद्ध करे | शुद्ध की
हुईं भूमिमें मन्त्रपाठपूर्वक जलसे भरे हुए नवीन कलशकी स्थापना करे।
कलझमें ओर दिव्य आदि छोड़ दे। उसको
चर्चित करे। कण्ठमें फूलकी माला पहनाये। सब्र प्रकारके धूपकी सुगन्ध
फैलाये। जलते हुए दीपकोंकी श्रेणी सजाकर रखे। तात्पर्य यह कि सब
FR सुन्दर एवं मनोहर दृश्य उपस्थित करे। पूजाके लिये नवीन ora,
जूता और set भी मैंगाकर रखे। कलशके ऊपर एक पात्र रखकर उसे
दिव्य लाजों (खीलों) से भर दे। फिर उसके ऊपर सुवर्णमय
परशुरामजीकी स्थापना करे। “'बविशोकाय नमः” कहकर उनके चरणोंकी,
'विश्वरूपिणे नमः” से दोनों घुटनोंकी, ‘sma नमः” से जाँघोंकी,
दामोदराय नमः” से कटिभागकी, 'पद्मनाभाय- नमः” से saat,
“श्रीवत्सधारिणे नमः” से वक्षःस्थलकी, 'च्क्रिणे नमः” से बायी बाँहकी,
“गदिने नमः” से दाहिनी बाँहकी, “बैकुण्ठाय नमः" से कण्ठकी,
यज्ञममुखाय नमः” से मुखकी, 'विशोकनिधये नमः” से नासिकाकी,
'बासुदेवाय नम:' से नेत्रोंकी, 'बामनाय नमः” से ललाटकी, 'सर्वात्मिने
नमः” से सम्पूर्ण अज्ञों तथा मस्तककी पूजा करे। ये ही पूजाके मन्त्र हैं।
तदनन्तर भक्तियुक्त चित्तसे शुद्ध फलके द्वारा देवाधिदेव परशुरामजीको
अर्ध्य प्रदान करे। अर्ध्यका मन्त्र इस प्रकार है--
नमस्ते देवदेवेश जामदग्न्य नमोञ्स्तु ते। (४७ | ५७) nr न आन पनवरीकजकनी नवीन तीज नकद ७) नल लव ero 2४७॥७॥७॥७७॥७॥४४७४४७७७॥७७७४७४४४७एएएशआ 0 न अर कक सम *देवदेवेश्वर ! जमदमभिनन्दन ! श्रीविष्णुस्वरूप परशुरामजी ! आपको
नमस्कार है, नमस्कार है। आँवलेके फलके साथ दिया हुआ मेरा यह अर्घ्य
अहण कीजिये ।' तदनन्तर भक्तियुक्त चित्तसे जागरण करे। नृत्य, संगीत, वाद्य, धार्मिक
उपाख्यान तथा श्रीविष्णुसम्बन्धिनी कथा-वार्ता आदिके द्वारा वह रात्रि
व्यतीत करे | उसके बाद भगवान् विष्णुके नाम ले-लेकर आमलकी वृक्षकी ' परिक्रमा एक सौ आठ या अट्ठाईस बार करे | फिर WaT होनेपर श्रीहरिकी आरती करे। ब्राह्मणकी पूजा करके वहाँकी सब सामग्री उसे निवेदन कर
दे। परशुरामजीका कलश, दो वख्र, जूता आदि सभी वस्तुएँ दान कर दे.
और यह भावना करे कि 'परशुरामजीके स्वरूपमें भगवान् विष्णु मुझपर
प्रसन्न Gi! तत्पश्चात् आमलकीका स्पर्श करके उसकी प्रदक्षिणा करे और
स्नान करनेके बाद विधिपूर्वक ब्राह्मणांको भोजन कराये। तदनन्तर
कुटुम्बियोंके साथ बैठकर स्वयं भी भोजन ax | ऐसा करनेसे जो पुण्य होता
है, वह सब बतलाता हूँ; सुनो | सम्पूर्ण तीर्थेकि सेवनसे जो पुण्य प्राप्त होता
है तथा सब प्रकारके दान देनेसे जो फल मिलता है, वह सब उपर्युक्त
विधिके पालनसे सुलभ होता है। समस्त यज्ञोंकी अपेक्षा भी अधिक फल
मिलता है; इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। यह व्रत उत्तम है,
जिसका मैंने तुमसे पूरा-पूरा वर्णन किया है। वसिष्ठजी कहते हैं--महाराज | इतना कहकर देवेश्वर भगवान् विष्णु
वहीं अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् उन समस्त महर्षियोंने उक्त ब्रतका
पूर्णरूपसे पालन किया । नृपश्रेष्ठ ! इसी प्रकार तुम्हें भी इस व्रतका अनुष्ठान
करना चाहिये। ै भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--युधिष्ठिर ! यह दुर्धर्ष ad मनुष्यको
सब पापोंसे मुक्त करनेवाला है। चेत्र मासकी 'पापमोचनी' तथा
‘meal’ एकादशीका माहात्म्य game पूछा--भगवन् ! फाल्गुन शुकृपक्षकी आमलकी एक़ादशीका माहात््य मैंने सुना। अब चेत्र कृष्णपक्षकी एकादशीका क्या
नाम है, यह बतानेकी कृपा कीजिये | भगवान् श्रीकृष्ण बोले--राजेन्द्र ! सुनो--मैं इस विषयमें एक
पापनाशक उपाख्यान सुनाऊँगा, जिसे चक्रवर्ती नरेश मान्धाताके पूछनेपर
महर्षि लोमशने कहा था। मान्धाता बोले--भगवन् ! मैं लोगोंके हितकी इच्छासे यह सुनना चाहता हूँ कि चैत्रमासके कृष्णपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है ? उसकी क्या विधि है तथा उससे किस फलकी प्राप्ति होती है ? कृपया ये सब बातें बताइये। लोमशजीने कहा--नृपश्रेष्ठ | पूर्वकालकी बात है, अप्सराओंसे
सेवित चैत्ररथ नामक वनमें, जहाँ गन्धर्वोकी कन्याएँ अपने fasts साथ
ost बजाती हुई विहार करती हैं, मझुघोषा नामक अप्सरा मुनिवर
मेधावीको मोहित करनेके लिये गयी। वे महर्षि उसी वनमें रहकर . ब्रह्मचर्यका पालन करते थे। मझुघोषा मुनिके भयसे आश्रमसे एक कोस दूर ही ठहर गयी और सुन्दर ढंगसे वीणा बजाती हुई मधुर गीत गाने लगी। ' मुनिश्रेष्ठ मेधावी घूमते हुए उधर जा निकले और sa अप्सराको इस प्रकार गान करते देख सेनासहित कामदेवसे परास्त होकर बरबस मोहके
वशीभूत हो गये। मुनिकी ऐसी अवस्था देख मझुघोषा उनके समीप आयी ।
और वीणा नीचे रखकर उनका SUSE करने लगी। मेधावी भी उसके
साथ रमण करने लगे। कामवश रमण करते हुए उन्हें रात और दिनका भी भान न रहा। इस प्रकार मुनिजनोचित सदाचारका लोप करके अप्सराके साथ रमण करते उन्हें बहुत दिन व्यतीत हो गये। ag देवलोकरें
जानेको तैयार हुईं। जाते समय उसने मुनिश्रेष्ठ मेधावीसे कहा--'ब्रह्मन् !
अब मुझे अपने देश जानेकी आज्ञा दीजिये।' इससे