अध्याय 1 — षटतिला एकादशी की विधि और महिमा
एकादशियों का माहात्म्य सुनकर अर्जुन ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम करते हुये कहा — हे केशव! आपके श्रीमुख से ये कथाएँ सुनकर मुझे असीम आनंद मिला। अब अन्य एकादशियों का माहात्म्य भी सुनाने की कृपा करें।
श्रीकृष्ण बोले — हे अर्जुन! अब माघ कृष्ण पक्ष की षटतिला एकादशी की कथा सुनो।
एक बार दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य ऋषि से पूछा — हे मुनिश्रेष्ठ! मनुष्य क्रोध, ईर्ष्या और मूर्खतावश ब्रह्महत्या, चोरी आदि महापाप कर बैठते हैं और बाद में पछताते हैं। ऐसे मनुष्यों को नरक से बचाने का क्या उपाय है? कोई ऐसा दान-पुण्य बताइये जिससे नरक की यातना से बचा जा सके।
पुलस्त्य ऋषि बोले — हे मुनिवर! आपने बड़ा गूढ़ प्रश्न पूछा है, जिससे संसार का बड़ा उपकार होगा। जो रहस्य इंद्र भी नहीं जानते, वह मैं आपको बताता हूँ।
माघ मास में स्नान से शुद्ध रहना चाहिये। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या और अहंकार से सर्वथा बचना चाहिये। पुष्य नक्षत्र में गोबर, कपास और तिल मिलाकर उपले बनायें और उनसे एक सौ आठ बार हवन करें।
जिस दिन मूल नक्षत्र और एकादशी तिथि हो, उस दिन विधिपूर्वक भगवान श्रीहरि का पूजन और कीर्तन करें। एकादशी को उपवास और रात्रि जागरण करें। द्वादशी को धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करें और खिचड़ी का भोग लगायें। पेठा, नारियल या सुपारी सहित अर्घ्य देते हुये यह स्तुति करें —
'हे जगदीश्वर! आप निराश्रितों के आश्रय हैं, संसार-सागर में डूबे हुओं के उद्धारकर्ता हैं। हे कमलनयन! हे मधुसूदन! हे जगन्नाथ! लक्ष्मीजी सहित मेरे इस तुच्छ अर्घ्य को स्वीकार कीजिये।'
इसके बाद ब्राह्मण को जल से भरा घड़ा और तिल दान करें। जितने तिलों का दान हो, उतने सहस्र वर्ष स्वर्ग की प्राप्ति होती है।
इस एकादशी में तिल के छः उपयोग होते हैं, इसीलिये इसे षटतिला कहते हैं —
तिल-स्नान, तिल-उबटन, तिलोदक, तिल-हवन, तिल-भोजन और तिल-दान।
इन छः प्रकार से तिल के उपयोग से अनेक पाप नष्ट हो जाते हैं।