अध्याय 1 — षट्तिला एकादशी की विधि
दालभ्य ऋषि ने पुलस्त्य मुनि से पूछा — माघ कृष्ण एकादशी का क्या नाम है और उसकी विधि क्या है? मुनि ने कहा — इसका नाम षट्तिला एकादशी है। इस दिन तिल का छः प्रकार से उपयोग करना चाहिये — तिल मिला जल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से होम, तिल का भोजन, तिल का दान और तिल युक्त जल पीना। के है हे हरे मे हरे डे डर डरे फै हर हे डरे डरे अर उरए हरे हरे जे उदे जब फैे फरे हे फेक हे KKK KKK IK RkaKKKKKKKKK पालक हुआ। इसलिये राजन् ! “wea उत्तम ad अवश्य करना
चाहिये। मैंने लोगोंके हितके लिये तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है।
जो मनुष्य एकाग्रचित्त होकर 'पुत्रदा'का ब्रत करते हैं, वे इस लोकमें पुत्र
पाकर मृत्युके पश्चात् स्वर्गगामी होते हैं। इस माहात्म्यको पढ़ने और सुननेसे
SST यज्ञका फल मिलता है ! एकादशीका माहात्म्य
युथिष्ठटिरने पूछा--जगन्नाथ ! श्रीकृष्ण | आदिदेव ! जगत्पते ! माघ मासके कृष्ण पक्षमें कौन-सी एकादशी होती है ? उसके लिये कैसी विधि
है ? तथा उसका फल क्या है ? महाप्राज्ञ | कृपा करके ये सब बातें बताइये | श्रीभगवान् बोले--नृपश्रेष्ठ ! सुनो, माघ मासके कृष्ण पक्षकी जो
एकादशी है, वह 'षट्तिला'के नामसे विख्यात है, जो सब पापोंका नाश
करनेवाली है । अब तुम 'षट्तिला'की पापहारिणी कथा सुनो, जिसे मुनिश्रेष्ठ
पुलस्त्यने दाल्भ्यसे कहा था। ASA पूछा--ब्रह्मन् ! मृत्युलोकमें आये हुए प्राणी प्रायः पापकर्म
करते हैं। उन्हें नरकमें न जाना पड़े, इसके लिये कोन-सा उपाय है ?
बतानेकी कृपा करें । पुलस्त्यजी बोले--महाभाग | तुमने बहुत अच्छी बात पूछी है, बतल्ता
हूँ; सुनो। माघ मास आनेपर मनुष्यको चाहिये कि वह नहा-धोकर पतित्र हो
इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए काम, क्रोध, अहंकार, लोभ और चुगली आदि
बुराइयोंको त्याग दे | देवाधिदेव | भगवान्का स्मरण करके जलसे पैर धोकर
भूमिपर पड़े हुए गोबरका संग्रह करे | उसमें तिल और कपास छोड़कर एक सौ
आठ पिंडिकाएँ बनाये। फिर माघमें जब आर्द्री या मूल नक्षत्र आये, तब
कृष्ण पक्षकी एकादशी करनेके लिये नियम ग्रहण करे | भलीभाँति स्नान करके ay: एकादशी-ब्रतका माहात्म्य जद है है को है है हद है है जैे है है डरे हरे है है हे है हरे हे है है मे है औै हे है है हे हि 'औ है है हे की है है औैे है अरे और है और फीकी ही है हे फैे हद हे है हे हरे अरे डे एफ डरे कै डे डे डे डे रु पवित्र हो शुद्धभावसे देवाधिदेव श्रीविष्णुकी पूजा करे। कोई भूल हो
जानेपर श्रीकृष्णका नामोच्चारण करे | रातको जागरण और होम करे | चन्दन,
अरगजा, कपूर, नैवेद्य आदि सामग्रीसे , चक्र ओर गदा धारण
करनेवाले देवदेवेश्वर श्रीहरिकी पूजा करे। तत्पश्चात् भगवान्का स्मरण
करके IVA श्रीकृष्णनामका उच्चारण करते हुए PES, AAS अथवा
fast फलसे भगवानको विधिपूर्वक पूजकर अर्ध्य दे। अन्य सब
सामग्रियोंके अभावमें सौ सुपारियोंके द्वारा भी पूजन और अर्घ्यदान किये
जा सकते हैं। अर्ध्यका मन्त्र इस प्रकार है--
कृष्ण कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां गतिर्भव |
Rania wie पुरुषोत्तम ॥
' नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेउस्तुमहापुरुष पूर्वज ॥
गृहाणार्ष्य wat दत्त लक्ष्म्या सह जगत्पते |
(४४ | १८--२०)
अध्याय 2 — तिल के छः उपयोग और पुण्य
सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण | आप बड़े दयालु हैं। हम आश्रयहीन जीवोंके आप आश्रयदाता होइये | पुरुषोत्तम | हम संसार-समुद्रमें डूब रहे . हैं, आप हमपर प्रसन्न होइये। कमलनयन ! आपको नमस्कार है,
विश्वभावन ! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य ! महापुरुष ! सबके पूर्वज ! आपको नमस्कार है। जगत्पते | आप लक्ष्मीजीके साथ मेरा दिया हुआ
अर्ध्य स्वीकार करें|! TAT ब्राह्मणकी पूजा करें। उसे जलका घड़ा दान करे | साथ ही...
OM, जूता और ge भी दे। दान करते समय ऐसा कहे--'इस दानके
द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों।' अपनी शक्तिके अनुसार श्रेष्ठ
ब्राह्मणको काली गौ दान करे। द्विजश्रेष्ठ | विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह. तिलसे भरा हुआ पात्र भी दान करे। उन तिलोंके बोनेपर उनसे जितनी शाखाएँ पैदा हो सकती हैं, उतने हजार वर्षोततक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित
होता है। तिलसे ar a, उबटन लगाये, तिलसे होम करे; तिल ई भूल हो
रे । चन्दन, धारण
का स्मरण
छः अथवा
अन्य सब
दान किये १८--२०)
आश्रयहीन
में डूब रहे
स्कार है,
के पूर्वज |
देया हुआ इस दानके
सार श्रेष्ठ
ये किवह से जितनी करे; तिल