अध्याय 1 — अपरा एकादशी का माहात्म्य
युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी का क्या नाम और माहात्म्य है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम अपरा एकादशी है। अपरा का अर्थ है — जिसका पुण्य अनन्त हो। यह झूठी गवाही, व्रत-भंग और गुरु-अपमान जैसे पापों को भी नष्ट करती है। कुन्तीनन्दन ! निर्जला एकादशीके दिन श्रद्धालु स्त्री-पुरुषोंके लिये जो दान और कर्तव्य बिहित है, उसे सुनो--उस दिन जलमें शयन करनेवाले
भगवान् विष्णुका पूजन और जलमयी घेनुका दान करना चाहिये। अथवा
प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी दान उचित है। पर्याप्त दक्षिणा और
भाँति-भाँतिके मिष्टन्नोंद्वारा यत्रपूर्वक ब्राह्मणोंको संतुष्ट करना चाहिये। ऐसा
करनेसे ब्राह्मणोंको TEE करना चाहिये। ऐसा करनेसे ब्राह्मण अवश्य
संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होनेपर seh मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने
शम, दम और दामनमें प्रवृत्त हो श्रीहरिकी पूजा और रात्रिमें जागरण करते
हुए इस निर्जला एकादशीका किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई
सो पीढ़ियोंको और आनेवाली सौ पीढ़ियोंको भगवान् वासुदेवके परम
धाममें पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशीके दिन अन्न, ae, गौ, जल,
Wal, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिये ।* जो श्रेष्ठ
एवं सुपात्र ब्राह्मणको जूता दान करता है, वह सोनेके विमानपर बैठकर
स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशीकी महिमाको भत्तिपूर्वक
सुनता तथा जो भक्तिपूर्वक उसका वर्णन करता है, वे दोनों स्वर्गलोकमें जाते
हैं। चतुर्दशीयुक्त अमावास्याको सूर्यग्रहणके समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस
फलको प्राप्त करता है, वही इसके श्रवणसे भी प्राप्त होता है। पहले
दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिये कि 'मैं भगवान् केशवकी
प्रसन्नताके लिये एकादशीको निराहार रहकर आचमनके सिवा दूसरे जलका
भी त्याग करूँगा ।' द्वादशीको देवदेवेश्वर भगवान् विष्णुका पूजन करना
चाहिये। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर aed विधिपूर्वक पूजन करके
TSR घड़ा सट्डल्प करते हुए निम्नाड्धित मन्त्रका उच्चारण करे।
देवदेव हषीकेश संसारार्णवतारक |
उदकुम्भप्रदानेन AT मां परमां गतिम्॥ (५३। ६०) * अन्न FS TU TS VAR शुभम्। कमण्डलुस्तथा दातव्यं निर्जलादिने॥ मा०--३ (५३ । ५३)