नारद मुनि ने राजा युधिष्ठिर को बताया — राजन्! आश्विन कृष्ण एकादशी का नाम इन्दिरा एकादशी है। इस व्रत से पितरों को भी मोक्ष मिलता है। इस विषय में राजा इन्द्रसेन की कथा सुनो। + हे फ है अरे हे हे हरे हे हद डे है है जे हरे उरै है डरे हे है 7 हरे डरे है हे हे फ़ि हे डे जहे हे जे के है के औैे डे फैे औैे के है "है मै हद औैे हे >े हर हरे हे फैे कर हे हे जे डरे जे मी है है को हरे डे है नारदजीने कहा--नृपश्रेष्ठ ! सुनो, मेरी बात तुम्हें आश्चर्यमें
डालनेवाली है, मैं ब्रह्मलोकसे यमलोकमें आया था, वहाँ एक श्रेष्ठ
आसनपर बैठा और यमराजने मेरी भक्तिपूर्वक पूजा की। उस समय
यमराजकी सभामें मैंने तुम्हारे पिताको भी देखा था। वे ब्रतभंगके दोषसे
वहाँ आये थे। राजन् ! उन्होंने तुमसे कहनेके लिये एक सन्देश दिया है,
उसे सुनो। उन्होंने कहा है, 'बेटा ! मुझे ‘sau’ के ब्रतका पुण्य देकर
स्वर्गमें भेजो” उनका यह सन्देश लेकर में तुम्हारे पास आया हूँ। राजन् !
अपने पिताको स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेके लिये 'इन्दिरा' का व्रत करो। राजाने पूछा--भगवन् ! कृपा करके 'इन्दिरा' का बताइये | किस
पक्षमें, किस तिथिको और किस विधिसे उसका व्रत करना चाहिये। नारदजीने कहा--राजेन्द्र | सुनो, मैं तुम्हें इस adel शुभकारक
विधि बतलाता हूँ। आश्विन मासके कृष्णपक्षमें दशमीके उत्तम दिनको
श्रद्धायुक्त चित्तसे प्रातःकाल स्नान करे। फिर मध्याह्कालमें स्नान करके
एकाग्रचित्त हो एक समय भोजन करे तथा रात्रिमें भूमिपर सोये। रात्रिके
अन्तमें निर्मल प्रभात SAK एकादशीके दिन दातुन करके मुँह धोये; इसके
बाद भक्तिभावसे निम्नाद्धित मन्त्र पढ़ते हुए उपवासका नियम ग्रहण करे-- स्थित्वा निराहारः सर्वभोगविवर्जितः |
श्रो पुण्डरीकाक्ष शरण मे भवाच्युत ॥
.._ (६०। २३) SRA भगवान् नारायण | आज मैं सब भोगोंसे अलग हो
निराहार रहकर कल भोजन करूँगा। अच्युत ! आप मुझे शरण दें।' इस प्रकार नियम करके मध्याह्कालमें पितरोंकी प्रसन्नताके लिये
शालग्राम-शिलाके सम्मुख विधिपूर्वक श्राद्ध करे तथा दक्षिणासे ब्राह्मणोंका
सत्कार करके उन्हें भोजन करावे। पितरोंको दिये हुए अन्नमय पिण्डको
सूँघकर विद्वान् पुरुष गायको खिला दे। फिर धूप और गन्ध आदिसे
भगवान् हृषीकेशका पूजन करके रात्रिमें उनके समीप जागरण करे।
तत्पश्चात् TAT होनेपर द्वादशीके दिन पुनः भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी पूजा करे | RQ *एकादशी-ब्रतका माहात्म्य उसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराकर भाई-बन्धु, नाती और पुत्र आदिके
साथ स्वयं मौन होकर भोजन करे। राजन् ! इस विधिसे आलपस्यरहित
होकर तुम 'इन्दिरा'का व्रत करो। इससे तुम्हारे पितर भगवान् विष्णुके
बैकुण्ठधाममें चले MAT | भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--राजन् ! राजा इन्द्रसेनसे ऐसा कहकर देवर्षि नारद अन्तर्धान .हो गये। राजाने उनकी बतायी हुई विधिसे
अन्तःपुरकी रानियों, पुत्रों ओर भृत्योंसहित उस उत्तम व्रतका अनुष्ठान
किया। कुन्तीनन्दन | व्रत पूर्ण होनेपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी।
इन्द्रसेनके पिता गरुड़पर आरूढ़ होकर श्रीविष्णुधामको चले गये sik
राजर्षि इन्द्रसेन भी अकण्टक राज्यका उपभोग करके अपने पुत्रको राज्यपर बिठाकर स्वयं Sickel गये। इस प्रकार मैंने तुम्हारे सामने 'इन्दिरा' : ब्रतके माहात्म्यका वर्णन किया है। इसको पढ़ने और सुननेसे मनुष्य सब
पापोंसे मुक्त हो जाता है।