युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! चैत्र शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम कामदा एकादशी है। यह सभी इच्छाओं को पूर्ण करनेवाली, ब्रह्महत्या जैसे पापों को भी नाश करनेवाली है। पुंडरीक और उसकी पत्नी ललिता की कथा सुनो। 7 कि हि है "है रे हरे डे हरे हरे हे हर हर डरे उरे हरे हरे हे डे फर फैर 7 फटे अरे डरे डे हे जद जे फेक पे डे ' है हे फेज कै हद के है है जे करे हरे है जुट कै जे हर ' है हमे है है डे हरे फेक हेएे डैएे है हरे है. ललितके मनका MAT ज्ञात हो गया; अतः उसने राजा पुण्डरीकको उसके
पैरोंकी गति रुकने एवं गानमें त्रुटि होनेकी बात बता दी | ककोंटककी बात
सुनकर नागराज पुण्डरीककी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। उसने गाते हुए
कामातुर ललितको शाप दिया-- ‘she | तू मेरे सामने गान करते समय
भी पत्नीके वशीभूत हो गया, इसलिये राक्षस हो a’ महाराज पुण्डरीकके इतना कहते ही वह wed राक्षस हो गया।
TAR मुख, विकराल आँखें और देखनेमात्रसे भय उपजानेवाला रूप |
ऐसा राक्षस होकर वह कर्मका फल भोगने wa | ललिता अपने पतिकी
विकराल आकृति देख मन-ही-मन बहुत चिन्तित | भारी दुःखसे कष्ट
पाने लगी। सोचने लगी, 'क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? मेरे पति पापसे कष्ट
पा रहे हैं ।' वह रोती हुई घने जंगलोंमें पतिके पीछे-पीछे घूमने लगी | वनमें
उसे एक सुन्दर आश्रम दिखायी दिया, जहाँ एक ard मुनि बैठे हुए थे।
उनका किसी भी प्राणीके साथ वैर-विरोध नहीं था। ललिता शीघ्रताके
साथ वहाँ गयी और मुनिको प्रणाम करके उनके सामने खड़ी हुई। मुनि
बड़े दयालु थे। उस दुःखिनीको देखकर वे इस प्रकार बोले--'शुभे | तुम कौन हो ? कहाँसे यहाँ आयी हो ? मेरे सामने सच-सच बताओ ।' ललिताने कहा--महामुने ! वीरधन्वा नामवाले एक गय्धर्व हैं। मैं महात्माकी पुत्री हूँ। मेरा नाम ललिता है। मेरे स्वामी अपने पाप-दोषके
कारण राक्षस हो गये हैं। उनकी यह अवस्था देखकर मुझे चैन नहीं है।
ब्रह्म ! इस समय मेरा जो कर्तव्य हो, वह बताइये | विप्रवर ! जिस पुण्यके
द्वारा मेरे पति राक्षसभावसे छुटकारा पा जाये, उसका उपदेश कीजिये ।' ऋषि बोले--भद्रे ! इस समय चेत्र मासके कामदा'
नामक एकादशी तिथि है, जो सब पापोंको हरनेवाली और उत्तम है। तुम
उसीका विधि-पूर्वक ad करो और इस ब्रतका जो पुण्य हो, उसे अपने
स्वामीको दे डालो। पुण्य देनेपर क्षणभरमें ही उसके शापका दोष दूर जायगा।
राजन् ! मुनिका यह वचन सुनकर ललिताको बड़ा हर्ष हुआ। उसने ३६ एकादशी-ब्रतका माहात्म्य