अध्याय 1 — मोहिनी एकादशी की विधि और महिमा
युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! वैशाख शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम मोहिनी एकादशी है। यह एकादशी मनुष्यों को सब पापों से मुक्त कर विष्णुलोक में ले जाती है। श्रुतदेव ब्राह्मण की मुक्ति की कथा सुनो। है है है डरे ही अरे हैँ अं है हरि है औी अरे है जे अरे अर जे डे फे हे जे डे III हद जे जे जे WRRRKKKKK जे पे पे whkkhhikkkiikhn KaKKKK पढ़ने और सुननेसे गोदानका फल मिलता है और मनुष्य सब पापोंसे
मुक्त होकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
युथ्िष्ठिने पूछा--जनार्दन ! वैज्ञाख मासके जशुक्त-पक्षमें किस
नामकी एकादशी होती है ? उसका क्या फल होता है ? तथा उसके लिये
कौन-सी विधि है ?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले--महाराज ! पूर्वकालमें परम बुद्धिमान्
श्रीरामचन्द्रजीने महर्षि वसिष्ठसे यही बात पूछी थी, जिसे आज तुम मुझसे
पूछ रहे हो।
श्रीरामने कहा--भगवन् ! जो समस्त पापोंका क्षय तथा सब
प्रकारके दुःखोंका निवारण करनेवाला त्रतोंमें उत्तम हो, उसे मैं सुनना
चाहता हूँ।
वसिष्ठजी बोले--श्रीराम ! तुमने बहुत उत्तम बात पूछी है। मनुष्य
तुम्हारा नाम लेनेसे ही सब पापोंसे शुद्ध हो जाता है। तथापि लोगोंके
हितकी इच्छासे मैं पवित्रोंमें पवित्र उत्तम aden वर्णन करूँगा। वैशाख
AR eT जो एकादशी होती है, उसका नाम मोहिनी है। वह सब
पापोंको हरनेवाली और उत्तम है। उसके ब्रतके प्रभावसे मनुष्य मोहजाल
तथा पातक-समूहसे छुटकारा पा जाते हैं।
सरस्वती नदीके रमणीय तटपर भद्रावती नामकी सुन्दर नगरी है। वहाँ
धृतिमान् नामक राजा, जो चन्द्रवंशमें उत्पन्न और सत्यप्रतिज्ञ थे, राज्य करते
थे। उसी नगरमें एक वैश्य रहता था, जो धन-धान्यसे परिपूर्ण ओर
समृद्धिशाली था। उसका नाम था धनपाल। वह सदा पुण्यकर्ममें ही लगा
रहता था। दूसरोंके लिये पौंसला, कुआँ, मठ, बगीचा, thaw और घर
बनवाया करता था। भगवान् श्रीविष्णुकी भक्तिमें उसका हार्दिक अनुराग
था। वह सदा शान्त रहता था। उसके पाँच पुत्र थे--सुमना, EA,
मेधावी, सुकृत तथा धृष्टबुद्धि धृष्टबुद्धि पाँचवाँ था। वह सदा बड़े-बड़े
पापोमें ही रहता था। जुए आदि दुर्व्यसनोंमें उसकी बड़ी आसक्ति
थी। वह वेश्याओंसे मिलनेके लिये ल्ललायित रहता था। उसकी बुद्धि न ४० एकादशी-बम्रतका माहात्म्य तो देवताओंके पूंजनमें लगती थी और न पितरों तथा ब्राह्मणोंके सत्कारमें
वह दुष्टात्मा अन्यायके मार्गपर चलकर पिताका धन बरबाद किया करता
था। एक दिन वह वेश्याके गलेमें बाँह डाले चौराहेपर घूमता देखा गया। ज्येष यु तब पिताने उसे घरसे निकाल दिया तथा बन्धु-बान्धवोंने भी उसका एकादशी
परित्याग कर दिया। अब वह दिन-रात दुःख ओर शोकमें डूबा तथा कृपा की
कष्ट-पर-कष्ट SoM हुआ इधर-उधर भटकने लगा। एक दिन किसी =
was उदय होनेसे वह महर्षि कौप्डिन्यके आश्रमपर जा पहुँचा। | बहुत a
वैज्ाखका महीना था। तपोधन कोण्डिन्य गड़ाजीमें स्नान करके आये थे। बहुत पुण
धृष्टबुद्धि शोकके भारसे पीड़ित हो मुनिवर कौण्डिन्यके पास गया और हाथ | ब्रह्महत्या:
जोड़ सामने खड़ा होकर बोला--'ब्रह्मन् ! द्विजश्रेष्ठ | मुझपर दया करके | मारनेवाल
कोई ऐसा ब्रत बताइये, जिसके पुण्यके प्रभावसे मेरी मुक्ति हो ।' निश्चय ही
कोण्डिन्य बोले--वैश्ाखके शुक्ृपक्षमें मोहिनी ama प्रसिद्ध देता, बिन
एकादशीका व्रत करो। मोहिनीको उपवास करनेपर प्राणियोंक अनेक | बनकर वे
जन्मोंके किये हुए मेरुपर्वत-जैसे महापाप भी नष्ट हो जाते हैं। परन्तु अप
वसिष्ठजी कहते हैं--श्रीरामचन्द्र ! मुनिका यह वचन सुनकर | क्षात्रधर्मव
धृष्टबुद्धिका चित्त प्रसन्न हो गया। उसने कौण्डिन्यके उपदेशसे विधिपूर्वक | होनेके का
मोहिनी एकादशीका व्रत किया नृपश्रेष्ठ ! इस त्रतके करनेसे वह निष्पाप गुरुकी fr
हो गया और दिव्य देह धारणकर गरुड़पर आरूढ़ हो सब प्रकारके है। किन्तु
उपद्रवोंसे रहित श्रीविष्णुधामको चला | इस प्रकार यह मोहिनीका व्रत माघ
बहुत उत्तम है । इसके पढ़ने और सुननेसे सहख्न गोदानका फल मिलता है। | करनेवाले
की प्राप्त जिस गोदावरीमें बदरिकाश्रः सेवनसे जे दक्षिणासत्त हे है करता एकादशीका साहात्म्य
गया। युथिष्टिरने पूछा--जनार्दन ! sass कृष्णपक्षमें किस नामकी
उसका । एकादशी होती है ? मैं उसका माहात्य सुनना चाहता हूँ। उसे बतानेकी
| तथा | कृपा कीजिये।
किसी भगवान् श्रीकृष्ण बोले--राजन् ! तुमने सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये
हुंचा। | बहुत उत्तम बात पूछी है। राजेन्द्र | इस एकादशीका नाम 'अपरा' है। यह
ये थे। | बहुत पुण्य प्रदान करनेवाली और बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली है।
* होथ | ब्रह्महत्यासे दबा हुआ, गोत्रकी हत्या करनेवाला, गर्भस्थ बालकको
करके | मारनेवाला, परनिन्दक तथा परखीलम्पट पुरुष भी अपरा एकादशीके सेवनसे
निश्चय ही पापरहित हो जाता है। जो झूठी गवाही देता, माप-तोलमें धोखा
प्रसिद्ध | देता, बिना जाने ही नक्षत्रोंकी गणना करता और कूटनीतिसे आयुर्वेदका ज्ञाता
अनेक | बनकर वैद्यका काम करता है--ये सब नरकमें निवास करनेवाले प्राणी हैं।
परन्तु अपरा एकादशीके सेवनसे ये भी पापरहित हो जाते हैं । यदि क्षत्रिय
उनके: |. क्षात्रधर्मका परित्याग करके युद्धसे भागता है, तो वह क्षत्रियोचित धर्मसे भ्रष्ट
पूर्वक होनेके कारण घोर नरंकमें पड़ता है। जो शिष्य विद्या प्राप्त करके स्वयं ही
नेष्पाप गुरुकी निन्दा करता है, वह भी महापातकोंसे युक्त होकर AIR नरकमें गिरता
है। किन्तु अपरा एकादशीके सेवनसे ऐसे मनुष्य भी सद्तिको प्राप्त होते हैं | जब सूर्य मकर राशिपर स्थित हों, उस समय प्रयागमें स्नान
करनेवाले मनुष्योंको जो पुण्य होता है, काशीमें शिवरात्रिका व्रत करनेसे जो
PASTE होता है, गयामें पिण्डदान करके पितरोंको तृप्ति प्रदान करनेवाला
पुरुष जिस पुण्यका भागी होता है, बृहस्पतिके सिंहराशिपर स्थित होनेपर
स्नान wearer मानव जिस फलको प्राप्त करता है,
नेदरिकाश्रमकी यात्राके समय भगवान् केदारके दर्शनसे तथा बदरीतीर्थके
सेवनसे जो पुण्य-फल उपलब्ध होता है तथा सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमे
. दक्षिणासहित यज्ञ करके हाथी, घोड़ा और सुवर्ण-दान करनेसे जिस फलकी
OR होती है; अपरा एकादशीके सेवनसे भी मनुष्य वैसे ही. फल प्राप्त | BR एकादशी-ब्रतका माहात्म्य ज ny करता है। 'अपरा' को उपवास करके भगवान् वामनकी पूजा करनेसे मनुष्य | केशवव्
। सब पापोंसे मुक्त हो श्रीविष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। इसको पढ़ने और | भोजन
i GRA AES गोदानका फल मिलता है। ti gare कहा--जनार्दन ! 'अपरा'का सारा माहात्म्य मैंने सुन य
। | लिया, अब ज्येष्ठके शुक्ृपक्षमें जो एकादशी हो उसका वर्णन कीजिये। | बात स् | भगवान् श्रीकृष्ण बोले--राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा | सहदेव
i सत्यवतीनन्दन व्यासजी करेंगे; क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ और | यही क
वेद-वेदाज्लोंके पारज्गत विद्वान् हैं । तब वेद॒व्यासजी कहने लगे--दोनों ही पक्षोंकी एकादशियोंको भ
भोजन न करे। द्वादशीको स्नान आदिसे पवित्र हो फूलोंसे भगवान् प्राप्ति <
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