भीमसेन ने व्यासजी से कहा — महर्षे! मुझसे व्रत नहीं होता, किन्तु एकादशी व्रत का फल मैं भी पाना चाहता हूँ। व्यासजी ने कहा — पुत्र! ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जल व्रत करो। इस एक व्रत से तुम्हें सभी एकादशियों का फल मिलेगा। इसीलिये इसे पांडव एकादशी या भीम एकादशी भी कहते हैं। भीमसेन ! ज्येष्ठ मासमें शुक्षपक्षकी जो शुभ एकादशी होती है, उसका
निर्जल व्रत करना चाहिये तथा उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको शक्करके साथ जलके
घड़े दान करने चाहिये | ऐसा करनेसे मनुष्य भगवान् विष्णुके समीप पहुँचकर
आनन्दका अनुभव करता है | तत्पश्चात् द्वादशीको ब्राह्मणभोजन करानेके बाद
स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्णरूपसे पापनाशिनी एकादशीका ब्रत
करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो अनामय पदको प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेनने भी इस शुभ एकादशीका ब्रत आरम्भ कर
दिया। तबसे यह लोकमें 'पाण्डव-द्वादशी'के नामसे विख्यात हुई | आषाढ़ मासकी 'योगिनी' ओर 'शयनी' एकादशीका माहात्म्य युथ्चिष्ठिने पूछा--वासुदेव | आषाढ़के कृष्णपक्षमें जो एकादशी
होती है, उसका क्या नाम है ? कृपया उसका वर्णन कीजिये। भगवान् श्रीकृष्ण बोले--नृपश्रेष्ठ। आषाढ़के कृष्णपक्षकी
शकादशीका नाम 'योगिनी' है। यह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली
है। संसारसागरमें डूबे हुए प्राणियोंके लिये यह सनातन नौकाके समान है।
तीनों ल्लेकोंमें यह सारभूत व्रत है।
अध्याय 2 — निर्जल उपवास का फल
अलकापुरीमें राजाधिराज कुबेर रहते हैं। वे सदा भगवान् शिवकी
भक्तिमें तत्पर रहनेवाले हैं। उनके हेममाली नामवाला एक यक्ष सेवक था,
जो पूजाके लिये फूल लाया करता था | हेममालीकी पत्नी बड़ी सुन्दरी थी। उसका नाम विशालाक्षी था। वह यक्ष कामपाशमें आबद्ध होकर सदा अपनी पल्नीमें आसक्त रहता था। एक दिनकी बात है, हेममाली
मानसरोवरसे GO लाकर अपने घरमें ही ठहर गया और पत्नीके प्रेमका रसास्वादन करने लगा; अतः कुबेरके भवनमें न जा सका। इधर कुबेर | AL दान उसका
जलके
के बाद भे कर