युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! चैत्र कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम पापमोचनी एकादशी है। यह सभी पापों से मुक्ति दिलाने वाली है। चित्ररथ नामक वन में ऋषि मेधावी और अप्सरा मंजुघोषा की कथा सुनो। जे हैए है है हे है है है उैदे है हे है हरे है डे के हरे डे डरे पे है डरे है डरे के है की फेज हट कि है के हे 'ह है पे डे है #ए हरे हे अरे हे डरे डे औैे कै है औे और डे औ ही डै हे हे RAKKHKKK मेधावी बोले--देवी | जबतक सबेरेकी सन्ध्या न हो जाय तबतक
मेरे ही पास ठहरो। अप्सराने कहा--विप्रवर | अबतक न जाने कितनी सन्ध्या चली
गयी ! मुझपर कृपा करके बीते हुए समयका विचार तो कीजिये। लोमशजी कहते हैं--राजन् ! अप्सराकी बात सुनकर मेधावीके नेत्र
आश्चर्यसे चकित हो उठे। उस समय उन्होंने बीते हुए समयका हिसाब
लगाया तो मालूम हुआ कि उसके साथ रहते सत्तावन वर्ष हो गये। उसे
अपनी तपस्याका विनाश करनेवाली जानकर मुनिको उसपर बड़ा क्रोध -
हुआ। उन्होंने शाप देते हुए कहा--'पापिनी ! तू पिशाची हो जा ।' मुनिके
शापसे दग्ध होकर वह विनयसे नतमस्तक हो बोली--'विप्रवर ! मेरे
शापका उद्धार कीजिये। सात वाक्य बोलने या सात पद साथ-साथ चलने
मात्रसे ही सत्पुरुषोंके साथ हो जाती है। ब्रह्मन् ! मैंने तो आपके साथ
अनेक वर्ष व्यतीत किये हैं; अतः स्वामिन् ! मुझपर कृपा कीजिये ।' मुनि बोले--भद्ने ! मेरी बात सुनो--यह शापसे उद्धार करनेवाली
है। क्या करूँ ? तुमने मेरी बहुत बड़ी तपस्या नष्ट कर डाली है। चैत्र
कृष्णपक्षमें जो शुभ एकादशी आती है उसका नाम है 'पापमोचनी' | वह
सब पापोंका क्षय करनेवाली है। सुन्दरी ! उसीका व्रत करनेपर तुम्हारी
पिशाचता दूर होगी। ऐसा कहकर मेधावी अपने पिता मुनिवर च्यवनके आश्रमपर गये।
उन्हें आया देख च्यवनने पूछा-- 'बेटा ! यह क्या किया ? तुमने तो अपने
PAH नाश कर डाला |’ मेधावी बोले--पिताजी | मैंने अप्सरके साथ रमण करनेका पातक
किया है। कोई ऐसा प्रायश्चित्त बताइये, जिससे पापका नाश हो जाय। च्यवनने कहा--बेटा ! चैत्र कृष्णपक्षमें जो पापमोचनी एकादशी
होती है, उसका ब्रत करनेपर पापराशिका विनाश हो जायगा। पिताका यह कथन सुनकर मेधावीने उस अनुष्ठान किया।
इससे उनका पाप नष्ट हो गया और वे पुनः तपस्यासे परिपूर्ण हो गये। इसी ३४ एकादशी-ब्रतका माहात्म्य SR III है हे हे के कै IIR है मै हे हि के है औ हे है है हे कै मे मे मै मे IIIA मी मै है है कै मे है कै मे मे है IA औ जे IOI मे हे |
जे मे प्रकार मझुघोषाने भी इस उत्तम ब्रतका पालन किया। “पापमोचनी'का व्रत |
करनेके कारण वह पिशाच-योनिसे मुक्त हुई और दिव्य रूपधारिणी श्रेष्ठ.
SR होकर चली गयी। राजन् ! जो श्रेष्ठ मनुष्य पापमोचनी
एकादशीका करते हैं, उनका सारा पाप नष्ट हो जाता है। इसको पढ़ने
और सुननेसे मिलता है | ब्रह्महत्या, सुवर्णकी चोरी,
अध्याय 2 — ऋषि मेधावी और अप्सरा मंजुघोषा
सुरापान और गुरुपल्रीगणन करनेवाले महापातकी भी इस करनेसे
पापमुक्त हो जाते हैं। यह व्रत बहुत पुण्यमय है। ater पूछा--वासुदेव |! आपको नमस्कार है। अब मेरे सामने | यह बताइये कि शुकृपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है 2 - भगवान् श्रीकृष्ण बोले--राजन् | एकाग्रचित्त होकर यह पुरातन | कथा सुनो, जिसे वसिष्ठजीने दिलीपके पूछनेपर कहा था। दिलीपने पूछा--भगवन् | मैं एक बात सुनना चाहता हूँ। चैत्रमासके | शुक्कपक्षमें किस नामकी एकादशी होती है ? attest बोले--राजन् ! चैत्र शुकृपक्षमें 'कामदा' नामकी एकादशी । होती है। वह परम पुण्यमयी है। पापरूपी ईंधनके लिये तो वह दावानल ही है। प्राचीन कालकी बात है, नागपुर नामका एक सुन्दर नगर था, जहाँ ..
सोनेके महल बने हुए थे। उस नगरमें पुष्डीक आदि महा sa नाग |
निवास करते थे। पुण्डरीक नामका नाग उन दिनों वहाँ राज्य करता था।
गश्धर्व, किन्नर और अप्सराएँ भी उस नगरीका सेवन करती थीं। वहाँ एक |
श्रेष्ठ अप्सरा थी, जिसका नाम ललिता था। उसके साथ ललित नामवाला
गन्धर्व भी. था। वे दोनों पति-पत्नीके रूपमें रहते थे। दोनों ही परस्पर कामसे | पीड़ित रहा करते थे। ललिताके हृदयमें सदा पतिकी ही मूर्ति बसी रहती | थी और ललितके हृदयमें सुन्दरी ललिताका नित्य निवास था| एक दिनकी 3-०० न>०क ३. क-७०>-+क७