अध्याय 1 — पापांकुशा एकादशी की विधि
युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! आश्विन शुक्ल एकादशी का क्या माहात्म्य है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम पापांकुशा एकादशी है। यह एकादशी पापों का नाश करने में उसी प्रकार समर्थ है जैसे अंकुश हाथी को वश में करता है। इस व्रत से मनुष्य भगवान विष्णु के लोक को प्राप्त होता है। Fre] करता है, वह भगवान् विष्णुके लोकमें स्थान नहीं पाता; उसे निश्चय
ही नरकमें गिरना पड़ता है। इसी प्रकार यदि कोई या पाशुपत होकर
भगवान् विष्णुकी निन्दा करता है तो वह घोर रौरव नरकमें डालकर तबतक . पकाया जाता है, जबतक कि चौदह इन्द्रोंकी आयु पूरी नहीं हो जाती। यह एकादशी स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली, शरीरको नीरोग बनानेवाली
तथा सुन्दर स्त्री, धन एवं मित्र देनेवाली है। राजन् ! एकादशीको दिनमें
उपवास और रात्रिमें जागरण करनेसे अनायास ही विष्णुधामकी प्राप्ति हो
जाती है। राजेन्द्र ! वह पुरुष मातृ-पक्षकी दस, पिताके पक्षकी दस तथा
wis पक्षकी भी दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। एकादशी करनेवाले मनुष्य दिव्यरूपधारी, चतुर्भुज, गरुड़की ध्वजासे युक्त, हारसे
सुशोभित और पीताम्बरधारी होकर भगवान् विष्णुके धामको जाते हैं। आश्विनके शुहृतपक्षमें पापाड्डुशाका ब्रत करनेमात्रसे ही मानव सब पापोंसे मुक्त हो श्रीहरिके लोकमें जाता है। जो पुरुष सुवर्ण, तिल, भूमि, गौ, अन्न,
जल, जूते और छातेका दान करता है, वह कभी यमराजको नहीं देखता |
नृपश्रेष्ठ ! दरिद्र पुरुषको भी चाहिये कि वह यथाशक्ति आदि क्रिया करके अपने प्रत्येक दिनको सफल बनावे |* जो होम, स्नान, जप, ध्यान ©