अध्याय 1 — परमा एकादशी — एकादशी व्रत का संकल्प
एकादश्यां निराहार: स्थित्वाहमपरेडहनि |
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरणं मे भवाच्युत ॥
(६४ । ३४)
कमलनयन | भगवान् अच्युत ! मैं एकादशीको निराहार रहकर दूसरे
दिन भोजन करूँगा। आप मुझे शरण दें।'
तत्पश्चात् करनेवाला मनुष्य मन और इन्द्रियोंको बशमें करके
गीत, वाद्य, नृत्य और पुराण-पाठ आदिके द्वारा सत्रिमें भगवान्के समक्ष
जागरण करे। फिर द्वादशीके दिन उठकर स्त्रानके पश्चात् जितेन्द्रियभावसे
विधिपूर्वक श्रीविष्णुकी पूजा करे। एकादशीको पञ्मामृतसे जनार्दनको
TER द्वादशीको केवल दूधमें स्नान करानेसे श्रीहरिका सायुज्य प्राप्त
होता है। पूजा करके भगवानसे इस प्रकार प्रार्थना करे--
अज्ञानतिमिरान्थस्य ata केशव |
प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ।॥ (६४३९)
केशव ! मैं अज्ञानरूपी रतौंधीसे अंधा हो गया हूँ। आप इस ब्रतसे
प्रसन्न हों और प्रसन्न होकर मुझे ज्ञानदृष्टि प्रदान करें।'
इस SR देवताओंके स्वामी देवाधिदेव भगवान् गदाधरसे निवेदन
करके भत्तिपूर्वक ब्राह्मणॉंको भोजन कराये तथा उन्हें दक्षिणा दे। उसके
जाद भगवान् नारायणके शरणागत होकर बलिवैश्वदेवकी विधिसे
TEAC अनुष्ठान करके स्वयं मौन हो अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ
: भोजन करे। इस प्रकार जो शुद्ध भावसे पुण्यमय एकादशीका व्रत करता
है, वह पुनरावृत्तिसे रहित वैकुण्ठधामको प्राप्त होता है।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--याजन् ! ऐसा कहकर लक्ष्मीदेवी उस
ATRIA वरदान दे अन्तर्धान हो गयीं। फिर वह ब्राह्मण भी धनी होकर
पिताके घरपर आ गया। इस प्रकार जो 'कमला' का उत्तम करता हे पुरुषोत्त क् अरे औ हो मै है तथा ए जाता हे
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१९) . पुरुषोत्तम मासकी 'कमला” और “कामदा' एकादशी ...3है हे औ मी है है हे उे हे है डे की, है डे अरे औ हे हे, के उईे कर फे अए हे हर हे हे हे, को "हे कै है औै ही हे हे कै हे हे. अल en तथा एकादशीके दिन इसका:ःमाहात्य-सुनता है, वह सब ' : जाता & | युथिष्ठिर बोले--जनार्दन ! पापका नाश और पुण्यका दान
करनेवाली एकादशीके माहात्म्यका पुनः वर्णन कीजिये, जिसे इस लोकमें
करके मनुष्य परम पदको प्राप्त होता है। भगवान् श्रीकृष्णने कहा--राजन् ! BE या कृष्णपक्षमें जभी
एकादशी प्राप्त हो, उसका परित्याग न करे, क्योंकि वह मोक्षरूप सुखको
बढ़ानेवाली है। कलियुगमें तो एकादशी ही भव-बन्धनसे मुक्त करनेवाली,
सम्पूर्ण मनोवाज्छित कामनाओंको देनेवाली तथा पापोंका नाश करनेवाली
है। एकादशी रविवारको, किसी मज्जलमय पर्वके समय अथवा संक्रान्तिके
ही दिन क्यों न हो, सदा ही उसका ब्रत करना चाहिये। भगवान् विष्णुके
प्रिय भक्तोंकी एकादशीका त्याग कभी नहीं करना चाहिये। जो शास्त्रोक्त
विधिसे इस लोकमें एकादशीका ad करते हैं, वे stage देखे जाते हैं,
इसमें तनिक भी नहीं है। युथिष्ठिरने पूछा--श्रीकृष्ण ! वे जीवन्मुक्त कैसे हैं ? तथा विष्णुरूप
कैसे होते हैं ? मुझे इस विषयको जाननेके लिये बड़ी उत्सुकता हो रही है । भगवान् श्रीकृष्ण बोले--राजन्! जो कलियुगमें भक्तिपूर्वक
शास्त्रीय विधिके अनुसार निर्जल रहकर एकादशीका उत्तम करते हैं, वे
विष्णुरूप तथा जीवन्मुक्त क्यों नहीं हो सकते हैं ? एकादशीव्रतके समान
सब पापोंको ATT तथा मनुष्योंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाला
पवित्र ब्रत दूसरा कोई नहीं है। दशमीको एक बार भोजन, एकादशीको
निर्जल ब्रत तथा द्वादशीको पारण करके मनुष्य श्रीविष्णुके समान हो जाते
हैं। पुरुषोत्तम मासके द्वितीय पक्षकी एकादशीका नाम 'कामदा' है। जो
श्रद्धापूर्वक 'कामदा'के शुभ ACH अनुष्ठान करता है, वह इस लोक और भी मनोवाज्छित वस्तुको पाता है। यह 'कामदा' पवित्र, पावन,
महापातकनाशिनी तथा व्रत करनेवालोंको भोग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाली
है। नृपश्रेष्ठ | 'कामदा' एकादशीको विधिपूर्वक पुष्प, धूप, नैवेद्य तथा फल . देष्णव पुरुष दशमी तिथिको काँसके बर्तन, उड़द, मसूर, चना, कोदो SM, मधु, पराया अन्न, दो बार भोजन तथा मैथुन--इन दसोंका परित्याग करे। इसी प्रकार एकादशीको जूआ, निद्रा, पान, दाँतुन, wet fre
अध्याय 2 — कामदा एकादशी की विधि और महिमा
चुगली, चोरी, हिंसा, मैथुन, क्रोध और असत्य-भाषण--इन ग्यारह दोषोंको त्याग दे तथा द्वादशीके दिन काँसका बर्तन, उड़द, मसूर, तेल, असत्य-भाषण, व्यायाम, परदेशगमन, दो बार भोजन, मैथुन, बैलकी zZ पीठपर सवारी, अन्न तथा साग---इन बारह वस्तुओंका त्याग करे। राजन् ! जिन्होंने इस विधिसे 'कामदा' एकादशीका ब्रत किया और रात्रिमें जागरण करके श्रीपुरुषोत्तमकी पूजा की है, वे सब पापोंसे मुक्त हो परम > प्राप्त होते हैं। इसके पढ़ने और सुननेसे सहस््न गोदानका फल
मिलता है। कल ला- गोविन्दभवन-कार्यालय ©( ०३३) ICEL EY: ७ 848, महात्मा गाँधीरोड २३८०४६५१
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३. प्टना- THAT, गोरखपुरकी पुस्तक-दूकाने; (0(०६१२) EL HOE
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पिंत-२०८००१ २४/५५, विरहानता रोड 00
५. वासणसी- ' गीताप्रेस, गोरखपुरकी पुस्तक-दूकान; (0(४५६४२) ३५३४५१
पिन-२२१००१. ५९/९, नीचीबाग जा
६. हरिद्वार- गीताप्रेस, गोरखपुरकी पुस्तक-दूकान; ((०१३३) ४२२६५७ | पिन-२४९४०१ सब्जीमण्डी, मोतीबाजार | “४ '- SS TTI, पो०':स्वर्गाश्रमः OGERRY) on | hi 57 ६ "दिल्ली, जंक्शन (प्लेटफार्म to १२);.नयी दिल्ली (नं० ८-8 );
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कानपुर (नं० १); गोरखपुर (Ho 2 ) वाराणसी' (नं० | );
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