अध्याय 1 — सुमेधा ब्राह्मण की कथा
अर्जुनने पूछा — हे कमलनयन ! अब आप लौंद, अर्थात् अधिक मासके कृष्ण पक्षकी एकादशीका नाम तथा उसके व्रतका विधान बताने की कृपा करें। इसमें किस देवताका पूजन किया जाता है तथा इसके व्रतसे किस फलकी प्राप्ति होती है ?
भगवान् श्रीकृष्ण बोले — हे अर्जुन ! इस एकादशीका नाम 'परमा' है। इसके व्रतसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं तथा मनुष्यको इहलोकमें सुख तथा परलोकमें सद्गति प्राप्त होती है। इसका व्रत पूर्वमें कहे विधानानुसार करना चाहिये तथा भगवान् विष्णुका धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदिसे पूजन करना चाहिये।
इस एकादशीकी पावन कथा, जो कि महर्षियोंके साथ काम्पिल्य नगरीमें हुयी थी, वह मैं तुमसे कहता हूँ। ध्यानपूर्वक श्रवण करो —
काम्पिल्य नगरीमें सुमेधा नामका एक अत्यन्त धर्मात्मा ब्राह्मण रहता था। उसकी स्त्री अत्यन्त पवित्र तथा पतिव्रता थी। किसी पूर्व पापके कारण वह दम्पति अत्यन्त दरिद्रताका जीवन व्यतीत कर रहे थे।
ब्राह्मणको भिक्षा माँगनेपर भी भिक्षा नहीं मिलती थी। उस ब्राह्मणकी पत्नी वस्त्रोंसे रहित होते हुये भी अपने पतिकी सेवा करती थी तथा अतिथिको अन्न देकर स्वयं भूखी रह जाती थी। वह पतिसे कभी किसी वस्तुकी माँग नहीं करती थी। दोनों पति-पत्नी घोर निर्धनताका जीवन व्यतीत कर रहे थे।
एक दिन ब्राह्मण अपनी स्त्रीसे बोला — हे प्रिय ! जब मैं धनवानोंसे धनकी याचना करता हूँ तो वे मुझे मना कर देते हैं। गृहस्थी धनके बिना नहीं चलती, इसीलिये यदि तुम्हारी सहमति हो, तो मैं परदेश जाकर कुछ कार्य करूँ, क्योंकि विद्वानोंने कर्मकी प्रशंसा की है।
ब्राह्मणकी पत्नीने विनीत भावसे कहा — हे स्वामी ! मैं आपकी दासी हूँ। पति भला व बुरा जो कुछ भी कहे, पत्नीको वही करना चाहिये। मनुष्यको पूर्व जन्ममें किये कर्मोंका फल मिलता है। सुमेरु पर्वतपर रहते हुये भी मनुष्यको बिना भाग्यके स्वर्ण नहीं मिलता। पूर्व जन्ममें जो मनुष्य विद्या एवं भूमि दान करते हैं, उन्हें अगले जन्ममें विद्या एवं भूमिकी प्राप्ति होती है। ईश्वरने भाग्यमें जो कुछ लिखा है, उसे टाला नहीं जा सकता।
यदि कोई मनुष्य दान नहीं करता, तो प्रभु उसे केवल अन्न ही देते हैं, इसीलिये आपको इसी स्थानपर रहना चाहिये, क्योंकि मैं आपका विछोह नहीं सह सकती। पतिके बिना स्त्रीकी माता, पिता, भ्राता, श्वसुर तथा सम्बन्धी आदि सभी निन्दा करते हैं, इसीलिये हे स्वामी ! कृपा कर आप कहीं न जायें, जो भाग्यमें होगा, वह यहीं प्राप्त हो जायेगा।
स्त्रीकी सलाह मानकर ब्राह्मण परदेश नहीं गया। इसी प्रकार समय व्यतीत होता रहा। एक समय कौण्डिन्य ऋषि वहाँ पधारे।
ऋषिको देखकर ब्राह्मण सुमेधा एवं उसकी स्त्रीने उन्हें प्रणाम किया और बोले — आज हम धन्य हुये। आपके दर्शनसे आज हमारा जीवन सफल हुआ। ऋषिको उन्होंने आसन तथा भोजन दिया।
भोजन प्रदान करनेके पश्चात् पतिव्रता ब्राह्मणीने कहा — हे ऋषिवर ! कृपा कर आप मुझे दरिद्रताका नाश करनेकी विधि बतलाइये। मैंने अपने पतिको परदेशमें जाकर धन कमानेसे रोका है। मेरे भाग्यसे आपका आगमन हुआ है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अब मेरी दरिद्रता शीघ्र ही नष्ट हो जायेगी, अतः आप हमारी दरिद्रता नष्ट करनेके लिये कोई उपाय बतायें।