युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! भाद्रपद शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम परिवर्तिनी एकादशी है। इस दिन शयन कर रहे भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसीलिये इसे परिवर्तिनी कहते हैं। सूर्यवंश के चक्रवर्ती राजा मान्धाता की कथा सुनो। के है है है मै हे है मे है मे अप के मजे औ के के है औ जे जे कै जे हे कै के है के जे कै कै कै कह आफ आओ के सूर्यवंशमें मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्य-प्रतिज्ञ और प्रतापी
राजर्षि हो गये हैं। वे प्रजाका अपने औरस पुत्रोंकी भाँति धर्मपूर्वक पालन
किया करते थे। उनके राज्यमें अकाल नहीं पड़ता था, मानसिक चिन्ताएँ
नहीं सताती थीं और व्याधियोंका प्रकोप भी नहीं होता था। उनकी प्रजा
निर्भय तथा धन-धान्यसे समृद्ध थी। महाराजके कोषमें केवल न्यायोपार्जित
धनका ही संग्रह था। उनके राज्यमें समस्त वर्णों और आश्रमोंके लोग
अपने-अपने धर्ममें लगे रहते थे। मान्धाताके राज्यकी भूमि कामधेनुके
समान फल देनेवाली थी। उनके राज्य करते समय प्रजाको बहुत सुख प्राप्त
होता था। एक समय किसी कर्मका फलभोग प्राप्त होनेपर राजाके राज्यमें
तीन वर्षोतक वर्षा नहीं हुई । इससे उनकी प्रजा भूखसे पीड़ित हो नष्ट होने
लगी; तब सम्पूर्ण प्रजाने महाराजके पास आकर इस प्रकार कहा-- प्रजा बोली--नृपश्रेष्ठ/ आपको प्रजाकी बात सुननी चाहिये।
पुराणोंमें मनीषी पुरुषोंने जलको AR’ कहा है; वह नारा ही भगवानका
अयन--निवासस्थान है; इसलिये वे नारायण कहलाते हैं। नारायणस्वरूप
भगवान् विष्णु सर्वत्र व्यापकरूपमें विराजमान हैं। वे ही मेघस्वरूप होकर
वर्षा करते हैं, वर्षासे अन्न पैदा होता है और अन्नसे प्रजा जीवन धारण
करती है । FINS | ! इस समय अन्नके बिना प्रजाका नाश हो रहा है; अतः
ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे हमारे योगक्षेमका निर्वाह हो। राजाने कहा--आपलोगोंका कथन सत्य है, क्योंकि अन्नको ब्रह्म
कहा गया है। अन्नसे प्राणी उत्पन्न होते हैं और अन्नसे ही जगत् जीवन
धारण करता है। लोकमें बहुधा ऐसा सुना जाता है तथा पुराणमें भी बहुत
विस्तारके साथ ऐसा वर्णन है कि राजाओंके STARA प्रजाको पीड़ा होती
है; किन्तु जब मैं बुद्धिसे विचार करता हूँ तो मुझे अपना किया हुआ कोई
अपराध नहीं दिखायी देता। फिर भी मैं प्रजाका हित करनेके लिये पूर्ण
प्रयत्न करूँगा। ऐसा निश्चय करके राजा मान्धाता इने-गिने व्यक्तियोंकी साथ ले
विधाताको प्रणाम करके सघन वनकी ओर चल दिये। वहाँ जाकर मुख्य- uc एकादशी-ब्रतका माहात्म्य PHA है ही है हर डेट IIIA डे अरे अर हरि डे डरे डे फैट डरे हि AAI AAI #ैद अरे हर हे हरे हे हर हरे एफ रे हरे मै रे अरे AAI AIA IAAI मुख्य मुनियों और तपस्वियोंके आश्रमोंपर घूमते फिरे। एक दिन उन्हें
ब्रह्मपुत्र SA ऋषिका दर्शन हुआ | उनपर दृष्टि पड़ते ही राजा हर्षमें
भरकर अपने वाहनसे उतर पड़े ओर इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए दोनों हाथ
जोड़कर उन्होंने मुनिके चरणोंमें प्रणम किया। मुनिने भी 'स्वस्ति' कहकर
राजाका अभिनन्दन किया और उनके राज्यके सातों अज्ञोंकी कुशल FET |
राजाने अपनी कुशल बताकर मुनिके स्वास्थ्यका समाचार पूछा। मुनिने राजाको आसन और are दिया। SS ग्रहण करके जब वे मुनिके समीप बैठे तो उन्होंने इनके आगमनका कारण पूछा।
तब राजाने कहा--भगवन् ! मैं धर्मानुकूल प्रणालीसे पृथ्वीका
पालन कर रहा था। फिर भी मेरे राज्यमें वर्षाका अभाव हो गया। इसका
क्या कारण है इस बातको मैं नहीं जानता।
ऋषि बोले--राजन् ! यह सब युगोंमें उत्तम सत्ययुग है। इसमें सब
लोग परमात्माके चिन्तनमें लगे रहते हैं। तथा इस समय धर्म अपने चारों
चरणोंसे युक्त होता है। इस युगमें केवल ब्राह्मण ही तपस्वी होते हैं, दूसरे
लोग नहीं | किन्तु महाराज ! तुम्हारे राज्यमें यह शूद्र तपस्या करता है; इसी
कारण मेघ पानी नहीं बरसाते। तुम इसके प्रतीकारका यत्न करो; जिससे
यह अनावृष्टिका दोष शान्त हो जाय |
राजाने कहा--मुनिवर ! एक तो यह TM लगा है, दूसरे
निरपराध है; अतः मैं इसका अनिष्ट नहीं करूँगा। आप उक्त दोषको शान्त
करनेवाले किसी धर्मका उपदेश कीजिये।
ऋषि बोले--राजन् ! यदि ऐसी बात है तो एकादशीका व्रत करो।
भाद्रपद मासके शुहृपक्षमें जो 'पद्मा' नामसे विख्यात एकादशी होती है,
उसके व्रतके प्रभावसे निश्चय ही उत्तम वृष्टि होगी। नरेश | तुम अपनी प्रजा
और परिजनोंके साथं इसका व्रत करो।
ऋषिका यह वचन सुनकर राजा अपने घर आये। उन्होंने चारों
वर्णोको समस्त प्रजाओंके साथ भादोंके शुक्ृपक्षकी 'पद्मा' एकादशीका व्रत
किया। इस प्रकार व्रत करनेपर मेघ पानी बरसाने लंगे। पृथ्वी जलसे कैफ है है हर है अनुष्टा
शड़ेको
चाहिये
नर बुद्धश्रव
प्रदान
सुखदाः आश्िन नामकी
जाता है
तरीका
पका सब
चारों
दूसरे ससे दूसरे रो |
है| प्रजा