युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! कार्तिक कृष्ण एकादशी का क्या नाम और माहात्म्य है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम रमा एकादशी है। यह पापों को नाश करनेवाली उत्तम एकादशी है। राजा मुचुकुन्द की कथा सुनो। आयी, जो हरिपूजापरायण तथा जागरणमें आसक्त बैष्णव मनुष्योंका हर्ष
बढ़ानेवाली थी; परन्तु वही रात्रि शोभनके लिये अत्यन्त दुःखदायिनी PU सूर्योदय होते-होते उनका प्राणान्त हो गया। राजा मुचुकुन्दने राजोचित
काष्ठोंस शोभनका दाह-संस्कार कराया | चन्द्रभागा पतिका पारलौकिक कर्म शर्म करके पिताके ही घर॒पर रहने लगी। नृपश्रेष्ठ ! 'रमा' नामक एकादशीके i.
a ब्रतके प्रभावसे शोभन मन्दराचलके शिखरपर बसे हुए परम रमणीय |
5 देवपुरको प्राप्त हुआ। वहाँ शोभन द्वितीय कुबेरकी भाँति शोभा पाने लगा। i
संत राजा मुचुकुन्दके नगरमें सोमशर्मा नामसे विख्यात एक ब्राह्मण रहते थे, वे | जन पने नने तीर्थयात्राके प्रसड्से घूमते हुए कभी मन्दराचल पर्वतपर गये। वहाँ नी ६६ एकादशी-व्रतका माहात्म्य जे के है हि हे हरे है है की है है है? हद है हैँ हरे हरे है trait t et eet है हि हर है है हि हरे है जद हर है रद कि हि है है हे डरे हे डे की है के की हे डरे हे है की है हे पु ज्ोभन दिखायी दिये। राजाके दामादको पहचानकर वे उनके समीप गये।
an भी उस समय द्विजश्रेष्ठ सोमशर्माको आया जान शीघ्र ही आसनसे
उठकर खड़े हो गये और प्रणाम किया। फिर क्रमशः अपने श्वशुर
राजा मुचुकुन्दका, प्रिय पत्नी चन्द्रभागाका तथा समस्त नगरका कुशल-
समाचार पूछा। सोमशर्माने कहा--राजन् ! वहाँ सबकी कुशल है| यहाँ तो अद्भुत
आश्चर्यकी बात है ! ऐसा सुन्दर और विचित्र नगर तो कहीं किसीने भी नहीं
देखा होगा। बताओ तो सही, तुम्हें इस नगरकी प्राप्ति कैसे हुई ? aie बोले--द्विजेन्द्र ! कार्तिकके कृष्णपक्षमें जो “a नामकी . एकादशी होती है, उसीका व्रत करनेसे मुझे ऐसे नगरकी प्राप्ति हुई है।
ब्रह्मन् ! मैंने श्रद्धाहीन होकर इस उत्तम ब्रतका अनुष्ठान किया था; इसलिये
मैं ऐसा मानता हूँ कि यह नगर सदा स्थिर रहनेवाला नहीं है। आप
मुचुकुन्दकी कन्या चन्द्रभागासे यह सारा वृत्तान्त कहियेगा।
शोभनकी बात सुनकर MAMA ब्राह्मण मुचुकुन्दपुरमें गये ओर वहाँ
चन्द्रभागाके सामने उन्होंने सारा वृत्तान्त कह सुनाया |
सोमशर्मा बोले--शुभे ! मैंने तुम्हारे पतिको प्रत्यक्ष देखा है तथा
Sales समान उनके दुर्धर्ष नगरका भी अवलोकन किया है। वे उसे
अस्थिर बतलाते थे। तुम उसको स्थिर बनाओ।
चन्द्रभागाने कहा--ब्रह्मर्षे ! मेरे मनमें पतिके दर्शनकी लालसा लगी
हुई है। आप मुझे वहाँ ले चलिये। मैं अपने व्रतके पुण्यसे उस नगरको
स्थिर बनाऊँगी।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--राजन् ! चन्द्रभागाकी बात सुनकर
सोमशर्मा उसे साथ ले मन्दराचल पर्वतके निकट वामदेव मुनिके आश्रमपर
गये। वहाँ ऋषिके मन्त्रकी शक्ति तथा एकादशी-सेवनके प्रभावसे
चन्द्रभागाका शरीर दिव्य हो गया तथा उसने दिव्य गति प्राप्त कर ली।
इसके बाद वह पतिके समीप गयी। उस समय उसके नेत्र हर्षोल्लाससे
खिल रहे थे। अपनी प्रिय पत्रीको आयी देख शोभनको बड़ी प्रसन्नता हुई | कार्ति की है हरि है हरे # उन्होंने
चन्द्रभा
मैं हित्
अवस्थ
एकादः
उसके मनोवा' रूप 3
शिखर
एकादः
मनोरथे
माहात्स्
हे; उनः
दोनोंका
फल दे;
पापोंसे
उसकी होती है
मैं तुम्हे न
भगवान ब्र
पुण्यकी
गये।
पनसे
शल- आप
वहाँ
तथा लगी