अध्याय 1 — विजया एकादशी की कथा
युधिष्ठिर ने पूछा — प्रभो! फाल्गुन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? भगवान ने कहा — राजन्! इसका नाम विजया एकादशी है। स्वयं भगवान राम ने लंका विजय से पहले इस एकादशी का व्रत किया था। अगस्त्य मुनि ने राम को इस व्रत की विधि बताई थी। -सामने जाकर दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ उन्हें प्रणाम किया। उन्हें इस
रूपमें उपस्थित देखकर इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने wi
“बताओ, किस पुण्यके प्रभावसे तुम दोनोंका पिशाचत्व दूर हुआ है। तुम
मेरे शापको प्राप्त हो चुके थे, फिर किस देवताने तुम्हें उससे छुटकारा
दिलाया है ?' है माल्यवान् बोला--स्वामिन् ! भगवान् वासुदेवकी कृपा तथा “जया'
नामक एकादशीके हमारी पिशाचता दूर हुई है। इन्द्रन कहा--तो अब तुम दोनों HEIs सुधापान करो | जो लोग
एकादशीके तत्पर और भगवान् श्रीकृष्णके शरणागत होते हैं, वे हमारे
भी पूजनीय हैं। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--राजन् ! इस कारण एकादशीका व्रत करना
चाहिये | नृपश्रेष्ठ Sen’ ब्रह्महत्याका पाप भी दूर करनेवाली है | जिसने 'जया'
का व्रत किया है, उसने सब प्रकारके दान दे दिये और सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान
कर लिया | इस माहात्यके पढ़ने और सुननेसे SABA यज्ञका फल मिलता है। फाल्गुन मासकी ‘’ तथा आमलकी' एकादशीका माहात्म्य
aes पूछा--वासुदेव ! फाल्गुनके कृष्णपक्षमें किस नामकी _ 'कादशी होती है ? कृपा करके बताइये। भगवान् श्रीकृष्ण बोले--युधिष्ठिर ! एक बार नारदजीने कमलके
आसनपर विराजमान होनेवाले ब्रह्माजीसे प्रश्न॒ किया-- ‘!
फाल्गुनके कृष्णपक्षमें जो 'विजया' नामकी एकादशी होती है, कृपया उसके वर्णन कीजिये |” WANS कहा--नारद | सुनो--'मैं एक उत्तम कथा सुनाता हूँ, जो
TAT अपहरण करनेवाली है। यह व्रत बहुत ही प्राचीन, पवित्र और २४ एकादशी-ब्रतका माहात्म्य हे है कि कै कि ही की के ही की है ही डी है कै की की की ही की कि के हे ही ही ही है की ही है है है भे की के की की औ ही डे की ही डी कि ही डी डी डी की डी औी की औ डी की ही की कह की औ के औ की KS पापनाशक है | यह 'विजया' नामकी एकादशी राजाओंको विजय प्रदान करती है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है | पूर्वकालकी बात है, भगवान् श्रीरामचन्द्रजी चौदह वर्षोके लिये वनमें गये और वहाँ पञ्चवटीमें सीता तथा लक्ष्मणके साथ रहने लगे। वहाँ रहते समय रावणने चपलतावश विजयात्मा श्रीरामकी
तपस्विनी पल्नी सीताको हर लिया | उस दुःखसे श्रीराम व्याकुल हो उठे | उस
समय सीताकी खोज करते हुए वे बनमें घूमने लगे | कुछ दूर जानेपर उन्हें
जयायु मिले, जिनकी आयु समाप्त हो चुकी थी | इसके बाद उन्होंने वनके भीतर
कबन्ध नामक राक्षसका वध किया | फिर सुग्रीवके साथ उनकी मित्रता हुई। तत्पश्चात् श्रीयमके लिये वानरोंकी सेना एकत्रित हुई | हनुमानजीने उद्यानमें जाकर सीताजीका दर्शन किया और उन्हें STAG चिह्स्वरूप मुद्रिका प्रदान की | यह उन्होंने महान् पुरुषार्थका काम किया था | वहाँसे लोटकर वे
श्रीरमचन्रजीसे मिले और VE सारा समाचार उनसे निवेदन किया। हनुमानजीकी बात सुनकर श्रीरामने अनुमति ले OSA प्रस्थान करनेका विचार किया और समुद्रके किनारे पहुँचकर उन्होंने लक्ष्मणसे
कहा-- सुमित्रानन्दन | किस पुण्यसे इस समुद्रको पार किया जा सकता है ?
यह अत्यन्त अगाध और FIR जलजन्तुओंसे भरा हुआ है। मुझे ऐसा कोई
उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे इसको सुगमतासे पार किया जा सके I’
लक्ष्मण बोले--महाराज ! आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष पुरुषोत्तम हैं। आपसे क्या छिपा है ? यहाँ द्वीपके भीतर बकदाल्भ्य नामक
मुनि रहते हैं। यहाँसे आधे योजनकी दूरीपर उनका आश्रम है। रघुनन्दन ! उन ग्राचीन मुनीश्चरके पास जाकर उन्हींसे इसका उपाय पूछिये।
लक्ष्मणकी यह अत्यन्त सुन्दर बात सुनकर श्रीरामंचन्द्रजी महामुनि बकदाल्थ्यसे मिलनेके लिये गये वहाँ पहुँचकर उन्होंने मस्तक झुकाकर ..
मुनिको प्रणाम किया। मुनि उनको देखते ही पहचान गये कि ये |
पुराणपुरुषोत्तम श्रीराम हैं, जो किसी कारणवज्ञ मानव-रशरीरमें अवतीर्ण हुए,
हैं। उनके आनेसे महर्षिको बड़ी प्रसन्नता हुईं। उन्होंने पूछा--'श्रीराम ! आपका कैसे यहाँ आगमन हुआ ?' फाल जीतने
मी ओओी डओओओ न करती
पचन्द्रजी
के साथ
ग्रीरामकी
3 । उस
पर उन्हें
के भीतर
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कि ये fot हुए | हे औ मे औ है # है के औ है है कै के की कै 7 मे ही है औ है? की कै कै डे औै हे हे हे हे है के की की कै भे कै ही
मै मे की डी औी आड़ डे है है के हे श्रीराम बोले--ब्रह्मम्! आपकी कृपासे राक्षसोंसहित
जीतनेके लिये सेनाके साथ समुद्रके किनारे आया हूँ। मुने ! अब जिस
अध्याय 2 — भगवान राम का व्रत और लंका विजय
TOR समुद्र पार किया जा सके, वह उपाय बताइये | मुझपर कृपा कीजिये | बकदाल्भ्यने कहा--श्रीरम ! फाल्गुनके कृष्णपक्षमें जो 'विजया' एकादशी होती है, उसका व्रत करनेसे आपकी विजय होगी । निश्चय
ही आप अपनी वानरसेनाके साथ समुद्रको पार कर लेंगे। राजन् ! अब
रस त्रतकी फलदायक विधि सुनिये। दशमीका दिन आनेपर एक कलश
स्थापित करे। वह सोने, चाँदी, ताँबे अथवा मिट्टीका भी हो सकता है। उस FORA जलसे भरकर उसमें पल्लव डाल दे। उसके ऊपर भगवान् 25 एकादशी-ब्रतका माहात्म्य PPT के के के के हे कै है है कै TELL के की जो हो है मै औ के के औ ही है औे की ॥ थे है मे औ औै औे मे हे # हे औ की ही के डे हे के हे ही भ मे है थे के है हे ATOR, . नारायणके सुवर्णमय विग्रहकी स्थापना करे | फिर एकादशीके दिन प्रातःकाल SAR करे । कलशको पुनः स्थिरतापूर्वक स्थापित करे | माला, चन्दन, सुपारी तथा नारियल आदिके द्वारा विशेषरूपसे उसका पूजन करे | कलशके ऊपर . सप्तधान्य और जौ रखे। TRY, धूप, दीप ओर भाँति-भाँतिके नेवेद्यसे पूजन
करे | कलशके सामने बैठकर वह सारा दिन उत्तम कथा-वार्ता आदिके द्वारा व्यतीत करे तथा रातमें भी वहाँ जागरण करे | अखण्ड सिद्धिके लिये घीका दीपक जलाये। फिर द्वादशीके दिन सूर्योदय होनेपर उस कलशको
किसी जलाशयके समीप--नदी, झरने या पोखरेके तटपर ले जाकर स्थापित
करें ओर उसकी विधिवत् पूजा करके देव-प्रतिमासहित उस कलशको ब्राह्मणके लिये दान कर दे | महाराज ! कलशके साथ ही और भी
बड़े-बड़े दान देने चाहिये। श्रीराम ! आप अपने यूथपतियोंके साथ इसी
विधिसे प्रयल्रपूर्वक 'विजया'का व्रत कीजिये | इससे आपकी विजय होगी | west कहते हैं--नारद ! यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुनिके | कथनानुसार उस समय 'विजया' एकादशीका किया | उस ब्रतके करनेसे
श्रीरामचन्द्रजी विजयी हुए। उन्होंने संग्राममें रावणको मारा, लट््भापर विजय पायी और सीताको प्राप्त किया | बेटा | जो मनुष्य इस विधिसे व्रत करते हैं, उन्हें इस लोकमें विजय प्राप्त होती है और उनका परलोक भी अक्षय बना रहता है | भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--युधिष्ठिर ! इस कारण 'विजया'का व्रत करना चाहिये। इस TIAA पढ़ने और सुननेसे वाजपेय यज्ञका फल
मिलता है। युथिष्टिरने कहा--श्रीकृष्ण | मैंने विजया एकादशीका माहात्म्य, जो |
महान् फल देनेवाला है, सुन लिया। अब फाल्गुन शुकृपक्षकी एकादशीका नाम ओर TET बतानेकी कृपा कीजिये। भगवान् श्रीकृष्ण बोले--महाभाग धर्मनन्दन | सुनो--तुम्हें इस
समय वह sy सुनाता हूँ, जिसे राजा मान्थाताके पूछनेपर महात्मा SAE
कहा था। फाल्गुन शुक्पक्षकी एकादशीका नाम 'आमलकी' है। इसकी पवित्र व्रत विष्णुल्लेककी प्राप्ति करानेवाला है। वृक्षक इसके
फल |
आम भगवा
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साथ इसी
पर होगी | ने मुनिके के करनेसे
पर विजय हता है | प्रा'का व्रत फल क्रादशीका ॥ वसिष्ठने